जानें, चुपके से कैसे भारत आई मैगी और सब की जुबान पर चढ़ गई
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दो मिनट में बच्चों से लेकर बूढों तक में खुशियां ला देने वाली मैगी आज खुद मुसीबत में है। वो लोग जिनके रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मैगी थी, वो अब उससे दूर हो रहे हैं क्योंकि उन्हें अब ये पता चला कि ये स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
मैगी के शुरु होने के पीछे सबसे दिलचस्प वजह है कि ये फ्रांस की औद्योगिक क्रांति से जुडी़ है। इसलिए लोग ये भी कहते हैं कि ये मजबूरी की वजह से शुरु की गई थी।
लेकिन मैगी की शुरुआत कैसे हुई? आखिर इतने सारे खाद्य पदार्थों को पीछे छोड़कर मैगी आज इतना आगे कैसे पहुंच गई और भारत में इसकी शुरुआत कैसे हुई आईए जानते हैं आगे की स्लाइड्स में।
ऐसे बनने लगी मैगी
इस समस्या से उबरने के लिए स्विस पब्लिक वेलफेयर सोसायटी ने 1872 में जूलियस मैगी से संपर्क किया। उन्होंने जूलियस से ऐसा खाद्य पदार्थ बनाने का कहा जो कम समय में बन सके और और पौष्टिक भी हो।
इसे ध्यान में रखकर जूलियस ने पहले प्रोटीनयुक्त लेग्यूम आहार को बाजार मे लाए और फिर आगे इसी कंपनी ने सूप और नूडल्स जैसे खाद्य पदार्थों की शुरुआत की। जूलियस ने 1863 में फार्मूला तैयार किया था जिससे खाने में टेस्ट लाया जा सके।
भारत में मैगी
भारत में मैगी 1980 के दशक में आई। नेस्ले इंडिया ने मैगी ब्रांड के अंतर्गत नूडल्स बाजार में लाए। शुरुआत में मैगी केवल नाश्ते का विकल्प थी। वह उन लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद थी जो लोग शहरों में रहते थे।
इसी दौर में देश इमरजेंसी से जूझ रहा था, ऐसे में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा अपना प्रॉडक्ट बाजार में उतारना किसी जोखिम से कम नहीं था लेकिन नेस्ले ने ये जोखिम मैगी के लिए उठाया।
वैसे तो नेस्ले के कई प्रॉडक्ट्स भारत में पहले से मौजूद थे। कॉफी, चॉकलेट और मिल्क पाउडर जैसे प्रॉडक्ट लोगों के बीच अपना भरोसा बना चुके थे लेकिन मैगी के लिए लोगों में भरोसा बढ़ा पाना मुश्किल था।
करनी पड़ी मशक्कत
मैगी को भारत में प्रचलित करने के लिए नेस्ले इंडिया को काफी मशक्कत करनी पड़ी। मैगी की शुरुआती दौर में वहीं कंपनी ने वही नूडल्स बाजार में उतारे जो बाकी देशों में प्रचलित थे।
लेकिन इसके साथ कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा था। लोगों की बदलती रोजमर्रा की जिंदगी के साथ खाने की आदतों में भी बदलाव
आ रहा था। 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के दौर में बाजारों के
दरवाजे पूरी दुनिया के लिए खुल गए इससे मैगी को भी लाभ हुआ।
2 मिनट में तैयार हो जाने वाली मैगी घर के किचन की जरुरत कब बन गई किसी को पता भी नहीं चला। नेस्ले ने बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए 1997 में मैगी नूडल्स
को बनाने वाले फार्मूले में बदलाव कर दिया लेकिन उपभोक्ताओं ने बदलाव नकार दिया।
सालाना बिक्री 1000 करोड़ के पार
मैगी की सालाना बिक्री 1000 करोड़ रुपए के पार पहुंच चुकी है। मैगी के अंतर्गत कई और प्रॉडक्ट लांच किया जिनमें, सूप, मैगी कप्पा भुना मसाला, मैनिया इंस्टैंट शामिल हैं।
मैगी के 90 प्रतिशत प्रॉडक्ट भारत की संस्कृति को ध्यान में रखकर उत्पादित किए जाते हैं जो बाकी दुनिया में कहीं नहीं मिलते।
भारत में नेस्ले के पूरे मुनाफे में मैगी करीब 25 प्रतिशत
हिस्सेदार है। अगर इस आंकड़े को सालाना देखे तो ये 1000 करोड़ के पार है।
मैगी के 90 प्रतिशत उत्पाद भारत को केन्द्र में रख कर बनाए जाते हैं। मैगी ब्रांड के तहत कई अन्य ब्रांड भी आए हैं लेकिन उनकी पहुंच उपभोक्ताओं तक उतनी नहीं हो सकी है जितनी कि मैगी की है।
ये है मैगी का कड़वा सच!
यूं तो मैगी बहुतों की पसंद है लेकिन इसका कड़वा सच जानने के बाद अगर आप इसे अभी तक खा रहे हैं तो खाना छोड़ सकते हैं। मैगी में मोनोसोडियम ग्लूमेट (Monosodium glutamate) मिला होता है जो आपके शरीर में खुद बन सकता है। इसे MSG भी कहा जाता है।
लेकिन जो MSG हमारे घर में मैगी की शक्ल में है वो आपके शरीर में कई विकृतियां पैदा कर सकता है जिसमें स्कीन प्रॉब्लम, खुजलाहट, उल्टी, अस्थमा और कई अन्य हृदय संबंधी रोग हो सकते हैं।मैगी के लिए उपयोग में लायी जाने वाली MSG चुकन्दर से बनती है।