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बिन इंटरनेट 'धरती पर स्वर्ग' कैसा?

Thu, 15 Oct 2015 06:44 PM IST
महापारा परवेज़
महापारा परवेज़ Updated Thu, 15 Oct 2015 06:44 PM IST
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How heaven remain heaven without Internet?

मेरे मोबाइल की खाली स्क्रीन ने मेरी ओर घूर के देखा। फिर इंटरनेट पर बैन वाला दिन, फिर एक बार किसी द्वीप पर फंसे रह जाने वाला वो अहसास। ये और बात है कि मैं किसी द्वीप पर नहीं रहती। मैं जहां रहती हूं उसे प्यार से लोग ‘धरती पर स्वर्ग’ कहते हैं।

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पर मेरी जन्नत में मुझे क्या जानकारी मिलती है और मैं किसी और को क्या बता सकती हूं, वो अक्सर इंटरनेट पर बैन लगाकर नियंत्रित किया जाता है। मैं कश्मीर विश्वविद्यालय की छात्रा हूं और श्रीनगर से महज़ 20 किलोमीटर की दूरी पर रहती हूं, पर मैं बाहर जा सकती हूं या नहीं ये रोज का नया फैसला होता है।
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एक रस्म-अदायगी, जिसमें न्यूज की वेबसाइट, फेसबुक और दोस्तों से मेसेज के जरिए ये मालूम किया जाता है कि किसी सरकार या किसी संगठन ने हड़ताल तो नहीं की या किसी इलाके में कर्फ्यू तो नहीं है। दुनिया के बाकि हिस्सों की ही तरह, कश्मीर में भी इंटरनेट आम लोगों और दुनिया के बीच संपर्क का जरिया है। पर बाकि दुनिया से अलग, कश्मीर में टीवी चैनलों के जरिए हमें वो सारी जानकारी नहीं मिलती जो हमें चाहिए होती है।
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साल 2008 के गर्मी के मौसम में जब मेरी उम्र के लड़के सड़कों पर उतरे थे और सुरक्षाबलों के ख्रिलाफ पत्थरों को ढाल बनाया था, उसके बाद ऐसी सभी खबरों के दिखाए जाने पर रोक लगा दी गई थी जिनसे ‘कानून व्यवस्था बिगड़ सकती हो’। राष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल कश्मीर पर खबरें तभी दिखाते हैं जब हिंसा यहां चरम पर हो।

रोज की जिंदगी तो उन्हीं लोगों का मसला है जो उसे यहां जीते हैं। अखबार तक देर से आते हैं। कश्मीर में जानकारी इंटरनेट के माध्यम से ही सबसे तेजी से चलती है। इस सच्चाई से राजनेता भी रूबरू हैं। वो भी फेसबुक के जरिए ही कर्फ्यू का आह्वान करते हैं।

'अंधेरे युग की ओर'

How heaven remain heaven without Internet?

इंटरनेट पर बैन इतनी जल्दी-जल्दी लगते हैं कि लगता है हम अंधेरे युग में चले गए हैं। हमें पिंजरे में रखा जा रहा है, डर की वजह से या शायद डर पैदा करने के लिए। मेरे दोस्त अक्सर पूछते हैं कि सरकार इन बैन्स के जरिए पूरी आबादी पर नियंत्रण बनाने की कोशिश क्यों करती है?

ये कहना मुश्किल है कि ये रोक सबसे ज्यादा कब चुभती है, आम दिनों में या खास दिनों पर। क्या उस दिन जब मैं अपने दोस्तों के साथ विश्वविद्यालय परीक्षा देनी पहुंची और पता चला कि उसे रद्द कर दिया गया है? इंटरनेट पर बैन था और हमें कहा गया कि जानकारी वेबसाइट पर डाल दी गई थी और हमें देखकर आना चाहिए था।

या वो दिन जो हमारे सबसे प्यारे दिनों में से है, ईद का दिन? सितंबर में ईद के दौरान तीन दिन तक इंटरनेट पर बैन था। ऐसा लगा मानो वेब दुनिया में कर्फ्यू लगा हो। इसका एक अजीब पहलू ये था कि ना चाहते हुए भी हमें विदेश में रह रहे हमारे दोस्तों और रिश्तेदारों को ईद शुरू होने से पहले ही मुबारकबाद देनी पड़ी।

जम्मू में रहने वाले मेरे दोस्तों को अलग-अलग कोर्सिस में ऑनलाइन दाखिले के लिए जालंधर, पठानकोट और लुधियाना जाना पड़ा क्योंकि इसकी समय सीमा नजदीक आ गई थी।इससे भी बुरी बात तो यह थी कि कश्मीर में सैलानी फंसे हुए थे और वे अपने अपने घर लौटने के लिए ऑनलाइन टिकट बुक नहीं करवा पा रहे थे।

बदलाव?

How heaven remain heaven without Internet?

इन ‘नो इंटरनेट’ दिनों पर अपने दोस्तों के साथ बैठे मैंने बार-बार इस रोक के असर की बातें सुनीं। इनकी वजह से युवा मन में बढ़ते निराशावाद की बातें।

छात्र खुद को रोजमर्रा की जानकारी, खबरों और सरोकार के बारे में सजग और कश्मीर के तंत्र की ख़ामियों और कमियों के बारे में सचेत मानते हैं।

पर वो भी बदलाव की क्या उम्मीद करें, जब वो ये जानते हैं कि गणतंत्र दिवस और आज़ादी के दिन जब बाक़ि देश जश्न मनाता है, सेल्फी खींचता है, तब कश्मीर में कई सालों से, सुंबह आठ बजे से दोपहर एक बजे तक इंटरनेट तो दूर मोबाइल सेवाएं भी बंद रहती हैं।

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