पूर्व जस्टिस ने कहा याकूब के साथ हुए अन्याय को कैसे सुधारें?
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सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश हरजीत सिंह बेदी ने याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के मामले में कहा है कि इसे सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान में लेना चाहिए।
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में एक प्रकाशित लेख के माध्यम से पूर्व जस्टिस बेदी ने कहा है कि मैंने बड़ी बेचैनी के साथ, पूर्व रॉ अधिकारी बी रमन का लेख पढ़ा।
लेख को पढ़ने के दौरान मेरी बेचैनी आक्रोश के भावना में तब्दील हो गई। मैंने इस लेख से संबंधित वो लेख भी पढ़े जो रेडिफ डॉट कॉम पर मौजूद थे।
सरकारी वकीलों की भूमिका पुलिस के एजेंट की तरह?
उन्होंने अपने लेख में लिखा है कि वो याकूब को दी जाने वाली फांसी के खिलाफ नहीं है लेकिन उसे दी गई सजा की समीक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि याकूब को अपने बचाव का पूरा मौका नहीं दिया गया।
पूर्व जस्टिस बेदी ने लिखा है कि बी.रमन के लेख के मुताबिक ''याकूब और उसके परिवार के अन्य लोगों के मामले को अभियोग पक्ष ने कोर्ट के सामने नहीं रखा और न ही अभियोग पक्ष ने कोर्ट को यह सुझाव कि उन परिस्थितियों को भी सजा निर्धारित करने के दौरान ध्यान में रखा जाए, क्योंकि उन्हें मौत की सजा दिलाने की उत्सुकता थी।''
वो आगे कहते हैं कि हमारी जांच एजेंसियों ने इस दौरान जो भी जांच किए उस दौरान की सभी परिस्थितियों से कोर्ट को अवगत कराना चाहिए था।
उन्होंने लिखा है कि ऐसे मामलों में परेशान करने वाली चीज यह है सरकारी वकीलों की भूमिका। बेदी ने लिखा है कि बीते कुछ सालों में एक ऐसी समझ बन गई है जो कुछ सरकारी वकीलों द्वारा खुद प्रोत्साहित की गई है, कि वो पुलिस के एजेंट्स की तरह काम करते हैं जो कि पूर्णतया ही अनुपयुक्त है।
सरकारी वकील से ये उम्मीद नहीं
एक सरकारी वकील कोर्ट का अधिकारी है और किसी ने इसे 'न्याय के एजेंट' के रुप में ढाल दिया है। एक सरकारी वकील राज्य का प्रतिनिधित्व करता है न कि पुलिस का।
इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि अदालत के समक्ष आरोपी के खिलाफ सारे तथ्य रखे जाने चाहिए जिसके बाद निर्णय पर पहुंचा जा सके।
बेदी ने लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने शिव कुमार बनाम हुकुम चंद के मामले में 30 अगस्त 1999 को देखा 'एक सरकारी वकील से यह उम्मीद नहीं की जाती की वह किसी भी मामले में आरोपी को किसी भी तरह से सजा दिलाने के लिए उसकी काम करे।
टीवी प्रेमी हो गए हैं सरकारी वकील?
उसे मामले में शामिल सभी सच्चे तथ्यों को पेश करना चाहिए'। एक सरकारी वकील से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अभियोग के दौरान वो अपनी निष्पक्षता को केवल पुलिस, जांच एजेंसी अथवा न्यायालय तक ही सीमित न रख कर आरोपी के प्रति भी निष्पक्ष रहें।
अगर किसी आरोपी को ट्रायल के दौरान वैध लाभ मिल रहा है तो सरकारी वकील का यह भी दायित्व है कि वो इसे छिपाने की कोशिश न करें।''
लेकिन इसके विपरीत हम देखते हैं कि हमारे टीवी प्रेमी सरकारी वकील खुद अपनी कानूनी जीत को घूरते हुए नजर आते हैं, खुद को संवारते हैं और फिल्मी सितारों की तरह अकड़ में रहते हैं।
विकल्प और समय दोनों कम
आखिर याकूब को मिली सजा को सुधारने के लिए अब क्या किया
जा सकता है?हमारे सामने विकल्प बहुत कम हैं और समय निकलता जा रहा है।
मेरी
सोच से सरकार को बी.रमन के लेख को स्वतः संज्ञान नें लेना चाहिए। यह
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को प्रदत्त शक्ति के अंतर्गत
अभी भी संभव है।
इसका प्रयोग भारत के सर्वाच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा और
गौरव में वृद्धि करेगा। मुझे विश्वास है कि मेमन ने राज्यपाल समक्ष भी
दयायचिका दायर की होगी, वहां भी कार्रवाई की जा सकती है।
जस्टिस
बेदी 2011 सितंबर में सेवानिवृत्त हुए थे। बेदी सर्वोच्च न्यायालय की उस
बेंच का भी हिस्सा थे, जिसमें कानून की छात्रा प्रियदर्शन मट्टू के रेप और
कत्ल के आरोपी संतोष कुमार सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी