मोदी और संघ का हनीमून खत्म, खफा है RSS!
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क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन्हें इस पद पर बैठाने का पुरजोर समर्थन करने वाले आरएसएस के बीच हनीमून पीरियड खत्म हो गया है? संघ की तरफ से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है।
एचटी की खबर के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मोदी के काम करने की तानाशाही शैली को लेकर खुश नहीं है। इसके अलावा भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिनको लेकर बीजेपी का वैचारिक संगठन सरकार से असंतुष्ट है। फिलहाल आरएसएस की तरफ से मोदी को पूरा समर्थन जरूर मिल रहा है लेकिन भविष्य के संबंधों को लेकर वो वैट एंड वॉच की स्थिति में है।
मोदी के साथ संघ की बढ़ती खटास के संकेत उस समय ही मिल गए थे जब आरएसएस ने बीजेपी और संघ के बीच समन्वय का काम देखने वाले अपने संयुक्त महासचिव सुरेश सोनी को हटाकर कृष्ण गोपाल को इसका जिम्मा सौंप दिया था। नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले सोनी की कार्यशैली को लेकर भी संघ नेतृत्व खुश नहीं था। नरेंद्र मोदी को पहले बीजेपी चुनाव अभियान का प्रमुख और फिर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के पीछे सुरेश सोनी की मुहिम ही मानी जाती है।
अमित शाह से भी नाराज है संघ!
सूत्रों के मुताबिक संघ अमित शाह को भी बीजेपी का अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज है। संघ का मानना है कि प्रधानमंत्री और पार्टी का अध्यक्ष एक ही प्रदेश से नहीं होना चाहिए। आरएसएस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक जिस तरह संघ के चहेते नितिन गडकरी को महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया से बाहर किया गया उससे भी वो नाराज है।
इससे अलावा आरएसएस के वरिष्ठ नेता और बीजेपी के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को भी कोई भूमिका नहीं दिए जाने से भी वो खफा है। जोशी को न तो संगठन में कोई भूमिका दी गई है और न ही सरकार में।
आरएसएस के सूत्रों का कहना है कि उसके मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में कुछ दिन पहले बंद कमरे में हुई बैठक में मोदी सरकार के कामकाज को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। आरएसएस के एक वरिष्ठ प्रचारक ने बताया कि मार्च 2015 में होने वाली प्रतिनिधि सभा की बैठक में इन सारे मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। आरएसएस के वरिष्ठ नेता इसलिए भी नाराज हैं कि सरकार ने मोहन भागवत के उस बयान का प्रभावी तरीके से समर्थन नहीं किया जिसमें उन्होंने कहा था कि मूलत: सभी भारतीय हिंदू हैं और उन्हें इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। आगरा की बैठक में भागवत ने कहा कि जो लोग सरकार में बैठे हैं उन्हें इस बयान को और अधिक प्रभावी तरीके से समर्थन करना चाहिए था। भागवत की इस नाराजगी के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने अमित शाह को पहले नागपुर और फिर लखनऊ उनसे मुलाकात के लिए भेजा था लेकिन फिलहाल बीजेपी की तरफ से किए गए ये प्रयास सफल होते नजर नहीं आ रहे हैं।