समलैंगिकता अपराध है या नहीं, अब संविधान पीठ करेगी फैसला
अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस मसले पर फैसला करेगी कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे में रखा जाए या नहीं। समलैंगिकता को अपराध केदायरे में रखने के फैसले के खिलाफ दाखिल सुधारात्मक याचिकाओं को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर, न्यायमूर्ति एआर दवे और न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने सुधारात्मक याचिकाओं पर सुनवाई के बाद कहा कि इस मसले में कुछ संवैधानिक बिंदु सामने आए हैं लिहाजा उचित यह होगा कि इससे संविधान पीठ केपास भेज दिया जाए।
शीर्ष अदालत ने यह भी भरोसा दिया कि इस मसले पर सुनवाई के लिए जल्द ही संविधान पीठ का गठन किया जाएगा। 11 दिसंबर 2013 को शीर्ष अदालत द्वारा समलैंगिकता को अपराध के दायरे में लाने के खिलाफ नाज फाउंडेशन समेत आठ सुधारात्मक याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
हालांकि, अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि मेथोडिकल चर्च और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने केखिलाफ हैं।
मालूम हो कि 2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा-377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) को अपराध केदायरे से बाहर कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था। बाद में पुनर्विचार याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
अब संविधान पीठ करेगी फैसला
मंगलवार को सुनवाई केदौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि धारा-377 को अपराधमुक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मामले में कई अहम संवैधानिक पहलू हैं। यह मसला चारदीवारी के भीतर होने वाले लोगों के जीवन केनिजी और महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़ा हुआ है, जिसे असंवैधानिक करार दे दिया गया है। इससे वर्तमान पीढ़ी और भविष्य की पीढ़ी को कलंक केसाये में रहना होगा। उन्होंने कहा कि मानवीय लैंगिकता पर धब्बा नहीं लगना चाहिए। पीठ को यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार ने चुनौती नहीं दी थी।
सरकार ने यह मामला शीर्ष अदालत पर छोड़ दिया था। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट केफैसले को पलट दिया था तब केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जो खारिज कर दी गई थी।
गौरतलब है कि सुधारात्मक याचिका कानूनी लड़ाई लड़ने का आखिरी पड़ाव होता है। सुधारात्मक याचिका का निपटारा आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठतम जज अपने चैंबर में करते हैं लेकिन कुछ मामलों में ओपन कोर्ट में सुनवाई होती है। इस मामले में दाखिल सुधारात्मक याचिकाओं पर मंगलवार को ओपन कोर्ट में सुनवाई हुई।
सरकार का इस पर कोई नजरिया नहीं
केंद्रीय मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि समलैंगिता एक मानवीय मसला था और सरकार ने इस पर अपना कोई नजरिया नहीं बनाया था। उन्होंने कहा कि इसके विभिन्न पहलुओं पर गौर करने के बाद ही हम कोई अंतिम राय रख सकते हैं। इस पर चर्चा जारी है।
मामला अब कोर्ट के समक्ष है, हमें इंतजार कर देखना चाहिए कि क्या होता है। इस मसले पर व्यक्ति राय के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा उनका कोई व्यक्तिगत विचार नहीं है क्योंकि किसी मंत्री को अपने व्यक्तिगत विचारों की बात नहीं करनी चाहिए।
चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का किया स्वागत
पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने समलैंगिकता पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पांच जजों वाले संविधान पीठ के पास भेजे जाने का स्वागत किया।
उन्होंने कहा, ‘मुझे खुशी है कि एक गलती को सुधारा जा रहा है। यह सिर्फ पहला कदम है। मुझे उस दिन का इंतजार है जब सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखेगा।’