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बिना सर्जरी के भी हो सकता है दिल के छेद का इलाज
लखनऊ/ब्यूरो
Updated Mon, 11 Feb 2013 09:23 AM IST
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बच्चों के दिल में छेद का बिना सर्जरी इलाज संभव है। एंजियोप्लास्टी की तरह ही पैर की नस के सहारे दिल तक पहुंच कर छेद को एक डिवाइस से बंद कर दिया जाता है। इससे बच्चे को जल्द ही फायदा मिलता है और उसे अस्पताल से भी जल्दी छुट्टी मिल जाती है।
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यह जानकारी रविवार को संजय गांधी पीजीआई द्वारा आयोजित 19वीं एनुअल साइंटफिक कॉन्फ्रेंस और कार्डियोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया यूपी चैप्टर कॉर्डिकॉन-2013 में डॉ. आरके सरन ने दी।
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केजीएमयू के कार्डियोलॉजी विभाग के हेड प्रो. आरके सरन ने बताया कि बच्चों के दिल में छेद होना पैदाइशी बीमारी है। अभी तक दिल के छेद को बंद करने के लिए सर्जरी की जाती है, लेकिन अब बिना सर्जरी छेद को बंद करना संभव है।
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उन्होंने बताया कि पैर की नस के सहारे एक तार डालकर दिल तक पहुंचा जाता है। इसके बाद दिल के छेद को एक डिवाइस से ढंक दिया जाता है। इस सर्जरी के परिणाम बहुत अच्छे आ रहे हैं। इसलिए सभी कार्डियोलॉजी सेंटर में इसी तकनीक से बच्चों की सर्जरी को प्राथमिकता दी जा रही है।
कॉर्डिकॉन-2013 के आयोजक डॉ. सत्येंद्र तिवारी ने बताया कि दिल की धड़कन बढ़ने की बीमारी (टैकीकार्डिया) से परेशान मरीजों में रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन भी कारगर तकनीक साबित हो रही है। इससे टैकीकार्डिया के मरीजों को स्थाई इलाज मिल जाता है।
दिल की धड़कनें बढ़ने की बीमारी महीने, दो महीने या चार महीने में होती है और धड़कन 200 से 250 प्रति मिनट हो जाती है। ऐसे में अस्पताल पहुंचने पर मरीज को तुरंत इंजेक्शन से दवा देनी होती है। इसके बाद उसे पूरी उम्र दवा खानी पड़ती है। जबकि रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन में दिल की धड़कन जहां से शुरू होती है, उस नर्व को फ्रीज कर दिया जाता है। इससे धड़कनें बढ़ने की संभावना नहीं होती।
गुर्दे की नर्व को फ्रीज कर ठीक होगा ब्लड प्रेशर
प्रो. आरके सरन ने बताया कि 20 फीसदी शहरी और 10 फीसदी ग्रामीण युवा उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हर 10वां शहरी उच्च रक्तचाप से पीड़ित है। उच्च रक्तचाप से पीड़ित 80 फीसदी मरीज दवाओं से ठीक हो जाते हैं, लेकिन 10 से 15 फीसदी मरीज ऐसे होते हैं जिन पर दवाओं का फायदा नहीं होता है।
ऐसे मरीजों में उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए अब रीनल (गुर्दे) आर्टरी को फ्रीज कर राहत दिलाई जा रही है क्योंकि अधिक दवा खाने से उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगते हैं। ऐसे में मरीजों में रेडियो एब्लेशन तकनीक बहुत कारगर सिद्ध हो रही है। दो साल में कई मरीजों में इस तकनीक से इलाज के अच्छे परिणाम सामने आए हैं।