पढ़िए, तोगड़िया-मोदी के रिश्तों की चौंकाने वाली कहानी
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प्रणीण तोगड़िया की जुबानी 'लपट' में भाजपा को झुलसता देख नरेंद्र मोदी को खुद सामने आना पड़ा।
नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को ट्विटर पर कहा कि भाजपा के शुभचिंतक होने का दावा कर रहे लोग घटिया बयान देकर विकास और सुशासन जैसे मुद्दों से ध्यान भटका रहे हैं। मोदी ने कहा, 'मैं ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयानों से सहमति नहीं रखता और अपील करता हूं कि ऐसे बातों से बचा जाए।'
गुजरात की राजनीति में नरेंद्र मोदी के विरोधी खेमें में गिने जाने वाले प्रवीण तोगड़िया ने अब तक इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन मोदी और तोगड़िया के राजनीतिक रिश्तों का ये पड़ाव आरएसएस की हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए अहम जरूर है।
तोगड़िया और मोदी: दोस्त हैं या दुश्मन
आरएसएस के दो अनुषांगिक संगठनों भाजपा और विहिप के शीर्ष पर बैठे नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया आज विरोधी खेमों में है। माना जाता है में गुजरात की राजनीति में तोगड़िया को रीढ़विहीन बनाने में नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका रही है।
तोगड़िया ने भी विहिप के भीतर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के लिए होने वाली बहसों का हमेशा विरोध किया।
लेकिन ये 'दुश्मन' किसी जमाने में गहरे दोस्त भी थे। सियासत की ये दोस्ती कुछ वैसी ही रही है, जैसे सिनेमा में जय और वीरू की दोस्ती।
एक ही बाइक पर घूमते थे तोगडिया-मोदी
नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया गुजरात में हिंदुत्व की राजनीति के पर्याय रहे हैं। गुजरात में हिंदुत्व की पौध को सींचने में मोदी और तोगड़िया की एक जैसी भूमिका रही है।
80 दशक में उन्हें संघ के उभरते तेजतर्रार नेताओं में गिना जाता था। संघ की शाखाओं में वे एक साथ शामिल होते। मणिनगर स्थित संघ कार्यालय 'हेडगेवार भवन' में भी उन्हें साथ ही देखा जाता।
अहमदाबाद की मणिनगर विधानसभा से ही नरेंद्र मोदी विधायक हैं। मणिनगर में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो ये बताएं कि तोगड़िया और मोदी एक ही बाइक या स्कूटर पर बैठकर शहर में घूमा करते थे। तोगडिया बाइक चलाते और मोदी पीछे बैठे रहते।
'84 में मोदी बना दिए गए संघ प्रचारक
पेशे से कैंसर सर्जन तोगड़िया को 1983 में विहिप में शामिल कर लिया गया और 1984 में मोदी को संघ में पूर्णकालिक प्रचारक बना दिया गया। अलग-अलग संगठनों की जिम्मेदारियां संभालने के बाद भी इनकी दोस्ती वैसी ही बनी रही।
संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाने में दोनों ने सक्रिय भूमिका निभाई। उनके रिश्ते ऐसे थे कि एक योजना बनाता और दूसरा उसे पूरा करता। संघ के ऐसे कई प्रचारकों की योजनाओं और प्रचार की बदौलत भाजपा 1995 में गुजरात में सत्ता पाने में कामयाब रही।
बघेला के खिलाफ मिलकर खोला मोर्चा
1995 में गुजरात में भाजपा सत्ता में आई और केशुभाई पटेल राज्य के मुख्यमंत्री बने। मोदी और तोगड़िया को सरकार को सलाह देने के लिए बनाई गई कोर कमेटी का सदस्य बनाया गया।
भाजपा के भीतरी कलह और शंकर सिंह बघेला की बगावत के कारण जब केशुभाई की सरकार अस्थिर हो गई, मोदी और तोगड़िया ने मिलकर सरकार को मुश्किल से उबारने की कोशिश की।
बघेला के विरोध में दोनों साथ रहे। आज बघेला भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।
तोगड़िया की गिरफ्तारी का मोदी ने किया विरोध
बघेला ने जब तोगड़िया को जेल में डलवा दिया, मोदी ने सड़क पर उतर कर उस कृत्य का विरोध किया। 1995 में राज्य की भाजपा इकाई ने मोदी को सरकार के लिए खतरा मानकर राज्य बदर कर दिया। गुजरात में भाजपा की राजनीति में उनका हस्तक्षेप न हो, इसलिए उन्हें दूसरे राज्यों में संगठन की जिम्मेदारी थमा दी गई।
उन्हीं दिनों तोगड़िया केशुभाई पटेल के करीब आए और गुजरात सरकार में उनका हस्तक्षेप बढ़ा। 1995 में मोदी की स्थिति ऐसी थी कि भाजपा की गुजरात इकाई के नेता उनके साथ दिखना भी नहीं चाहते थे।
अहमदाबाद स्थित भाजपा कार्यालय में मोदी के प्रवेश पर पाबंदी थी, इसलिए वे जब शहर में होते विहिप कार्यालय में जाकर बैठा करते।
मोदी के सीएम बनने की खबर तोगड़िया को थी
भाजपा आलाकमान ने अक्टूबर, 2001 में जब मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया, तोगड़िया उन चंद नेताओं में थे, जिन्हें इस बारे में जानकारी दी गई।
तोगड़िया ने मोदी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले का स्वागत किया था। वे मोदी मंत्रीमंडल में अपने करीबी गोर्धन झड़पिया को मंत्री बनाने में भी कामयाब रहे थे।
तोगड़िया ने गुजरात पुलिस में संघ के करीबी पुलिस अधिकारियों को अहम पद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन पुलिस अधिकारियों की गुजरात दंगों के दौरान संदिग्ध भूमिका थी।
मोदी ने तोगड़िया को जमीन पर ला दिया
दंगों के बाद 2002 में गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने में प्रवीण तोगड़िया ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने दो हफ्तों में 100 से अधिक रैलियां की।
राज्य की भाजपा की राजनीति में तोगड़िया उन दिनों सातवें आसमान पर थे। लेकिन मोदी ने सत्ता में वापसी करते ही उन्हें जमीन पर ला दिया। उन्होंने झड़पिया को मंत्रीमंडल से बाहर कर दिया और तोगड़िया को संकेत दे दिया कि सरकार में अब उनका हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मोदी ने संघ और विहिप से भी सरकारी कामकाज में परमर्श लेना बंद कर दिया। उन दिनों तोगड़िया के कई अन्य सहयोंगियों को भी निशाना बनाया गया।
तोगड़िया के सहयोगियों पर भी हुई कारवाई
तोगड़िया के सहयोगी अश्चिन पटेल पर देशद्रोह के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया, जबकि उन्होंने एक एसएमएस भेजा था, जिसमें मोदी के हिंदुत्व को चुनौती दी गई थी।
किसानों के समर्थन में आंदोलन करने के कारण भारतीय किसान संघ को उसके सरकारी कार्यालय से बाहर कर दिया गया। मोदी और तोगड़िया के रिश्ते तब और तल्ख हो गए, जब मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दबाव में गुजरात दंगों के मामलों को दोबारा खोला और विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी करवाई।
मोदी के इशारे पर विहिप के कार्यकर्ताओं को अहमदाबाद में पीटा गया ये कार्यकर्ता जिन्ना प्रकरण में आडवाणी के बयान का विरोध कर रहे थे।
सिंघल ने मोदी की तुलना महमूद गजनी से की
सरकार ने गांधीनगर में 200 मंदिरों को भी ढहा दिया, जिसके बाद अशोक सिंघल ने मोदी की तुलना महमूद गजनी से की थी।
हालांकि, बाद में सिंघल के रिश्ते मोदी से ठीक हो गए, लेकिन तोगड़िया और मोदी के रिश्तों में तनाव बना रहा। तोगड़िया ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने को हमेशा विरोध किया।
तोगड़िया ने 2011 में मोदी की सद्भावना यात्रा का भी मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि मोदी ने अपनी छवि सुधारने के लिए हिंदुत्व के एजेंडे को हाशिए पर डाल दिया।