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'मोदी ने पटना में कुछ गलत नहीं कहा'

Fri, 08 Nov 2013 12:40 PM IST
प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप/ पांचजन्य के पूर्व संपादक
प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप/ पांचजन्य के पूर्व संपादक Updated Fri, 08 Nov 2013 12:40 PM IST
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historian devendra swaroop told about modi speech in patna

राजनीति इतिहास के बिना नहीं चलती। एक स्थापित मान्यता है कि आज की राजनीति कल का इतिहास है और बीते हुए कल की राजनीति आज का इतिहास है। इसलिए राजनीति और इतिहास का चोली-दामन का साथ है।

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विपिनचंद्र पाल ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि कोई देश अपने इतिहास का बार-बार स्मरण नहीं करता तो वो रास्ता भटक जाता है।

कोई राजनेता अपने श्रोताओं के सामने इतिहास का उपयोग करे तो मुझे इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लगता।

ध्यान देने की बात यह है कि वो इतिहास के जिन तथ्यों को प्रस्तुत कर रहा है वो सही हैं या ग़लत।

इसलिए नरेंद्र मोदी के पटना भाषण का भी इसी आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए।

'मोदी का परिप्रेक्ष्य सही'
जहाँ तक नरेंद्र मोदी द्वारा अपने भाषण में ग़लत तथ्यों के इस्तेमाल की बात है तो यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सिकन्दर पोरस से युद्ध के बाद वापस नहीं गया था, झेलम नदी के तट पर कई विकट युद्धों और नदियों को पार करने के बाद वो व्यास नदी तक पहुँचा था। यह बात सत्य है कि वो बिहार कभी नहीं गया।
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लेकिन जो मोदी का भाषण है उसमें इस प्रसंग को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है उसे इतिहास के तथ्यों के आलोक में समझने की आवश्यकता है। सिकंदर व्यास नदी के पार जाना चाहता था, लेकिन उसके सेनापतियों ने विद्रोह कर दिया था। उसके सैनिकों ने कहा था कि व्यास नदी तक पहुँचने में हमें बहुत संघर्ष करना पड़ा। व्यास नदी के उस पार नंदों का साम्राज्य है।
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'राजनेता बोलने से पहले इतिहास समझें'
ग्रीक इतिहासकारों के मुताबिक सिकंदर प्रतिरोध के बाद शिविर में चला गया और उसने खाना-पीना छोड़ दिया। फिर उसे मनाया गया, उससे कहा गया कि विजेता वही होता है जो विजय के क्षणों को पहचानकर पराजय को टालने के लिए वापस लौटे।

नंद का जो साम्राज्य था उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, बिहार की शक्ति उसके पीछे थी।

इसलिए मोदी का बिहार की जनता के सामने यह कहना कि बिहार के लोगों ने सिकंदर को भगा दिया, एक इतिहासकार की दृष्टि से मुझे इसमें कुछ असत्य नहीं लगता।

भाषणों में निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है न कि इतिहास की पूरी जानकारी दी जाती है। मोदी ने भी अपने भाषण में यही किया।

इतिहास का सत्य यही है कि नंद वंश की शक्ति से भयभीत होकर सिकंदर भारत से वापस लौटा। इसके बाद वह पिछले रास्ते से न लौटकर दक्षिण यानी सिंध से होकर वापस लौटा।

लोकमानस और इतिहास
इतिहास लोकमानस से विच्छिन्न होकर खड़ा नहीं रह सकता। यह निर्णय करना बहुत कठिन है कि कहाँ पर माइथॉलजी है और कहाँ इतिहास है।

डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की ये बात ज़्यादा उचित है कि, ''मुझे इससे संबंध नहीं है कि राम पैदा हुए या नहीं या कृष्ण पैदा हुए या नहीं। मैं ये जानता हूँ कि भारत की वर्तमान चेतना के निर्माण में जितना योगदान राम और कृष्ण का है उतना और किसी का नहीं है। राम ने भारत को उत्तर से दक्षिण को जोड़ा और कृष्ण ने पूर्व से पश्चिम को जोड़ा।'' इतिहास और माइथॉलजी को देखने की ये भी एक दृष्टि है।

मैं समझता हूँ कि कौटिल्य के काल को शोषणकारी राज्य कहना भी गलत है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में करनीति के अध्याय-दो, प्रकरण-17 में लिखा है कि मौर्य काल में किसानों को किस प्रकार प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

इस अध्याय में लिखा है, "किसान ने अगर स्वयं मेहनत करके ऊसर या बंजर ज़मीन को खेती योग्य बनाया है तो राजा को चाहिए कि ऐसी जमीन को कभी वापस न ले, ऐसी जमीनों पर किसानों का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। यदि कोई किसान खेती योग्य भूमि को बिना जोते परती ही रखता है तो राजा को चाहिए ऐसी भूमि को उस किसान से लेकर किसी ज़रूरतमंद किसान को दे दे और ऐसे किसी ज़रूरतमंद किसान के न मिलने पर उसे उस गाँव के मुखिया या व्यापारी को खेती करने के लिए दे दे।"

मैं नहीं मानता कि कोई शोषक राज्य ऐसा करेगा।

'अर्थशास्त्र'
प्रोफ़ेसर डीएन झा ने कौटिल्य के काल को स्वर्णकाल कहे जाने पर एतराज़ जताया है और इसके प्रमाण के तौर पर कहा है कि उस युग में किसानों से उनकी उपज का एक चौथाई हिस्सा कर के रूप में ले लिया जाता था। इसके प्रमाण के तौर पर वो सम्राट अशोक की उस घोषणा का ज़िक्र करते हैं जिसमें किसानों की उपज पर टैक्स एक चौथाई से कम करके एक बटा छह कर दिया गया था।

सम्राट अशोक बौद्ध संघ की दीक्षा लेने के बाद तीर्थयात्रा के लिए लुम्बिनी गए थे और इसी खुशी में उन्होंने ये घोषणा की थी।

तीर्थयात्रा पर जाने पर वहाँ के लोगों को कुछ राहत देना उनकी अध्यात्मिक चेतना की अभिव्यक्ति थी, इसे राज्य की नीति से जोड़ना अन्याय है। अगर ये राज्य की नीति का अंग होता तो पूरे राज्य के अन्दर वो नई नीति की घोषणा करते।

प्रोफ़ेसर झा ये भी कहते हैं कि कौटिल्य ने गाँवों में शूद्रों की बड़ी संख्या को ये कहते हुए अच्छा बताया है कि उनसे काम लेना आसान होता है।

कौटिल्य अर्थशास्त्र के सबसे बड़े जानकार आर.पी. कांगले के अनुसार नए जनपद को बसाने के लिए पर्याप्त संख्या में किसान और शूद्र होने चाहिए। लेकिन इसमें कहीं भी शोषण शब्द या उस भावना का संकेत नहीं मिलता।

देवेन्द्र स्वरूप, इतिहासका के मुताबिक "ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जो पक्षपात पूर्ण प्रतिपादन है ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और वामपंथी इतिहासकारों ने इसमें बहुत अनर्थ किया है उन्होंने पुराने पीढ़ी के इतिहासकार जैसे जैसे आर.सी.मजूमदार, के.एन. शास्त्री उन सबको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।"

कौटिल्य ने शूद्र की जो व्याख्या की है उसके अनुसार शिल्प का काम करने वालों को शूद्र कहा जाता था। जो लोग खेती और शिल्प का काम करते थे उन्हें नए जनपद के लिए बसाना ज़रूरी बताया गया था।

इतिहास दृष्टि

जहाँ तक राजनेताओं की ओर से ऐतिहासिक तथ्यों के इस्तेमाल की बात है, ख़ासकर चुनावी परिप्रेक्ष्य में, तो इतिहासकार इसे अलग-अलग दृष्टि से देखते हैं।

अगर नरेंद्र मोदी वामपंथी पार्टी से जुड़े नेता होते तो डीएन झा इन्हीं तथ्यों का समर्थन करते।

ये बात मेरे बारे में भी कही जा सकती है पर मेरे तर्क का आधार ऐतिहासिक तथ्य हैं और कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। तथ्यों के आधार पर मैं इस मुद्दे पर डीएन झा से बात करने को तैयार हूँ।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के नौवें अधिकरण में पूरे भारत, उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक की एकता की व्याख्या की है।

वास्तव में जो स्वप्न कौटिल्य ने प्रस्तुत किया उसी की पूर्ति चन्द्रगुप्त मौर्य ने की, न कि अशोक ने।

ऐतिहासिक तथ्यों का पक्षपात पूर्ण प्रतिपादन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और वामपंथी इतिहासकारों ने इसमें बहुत अनर्थ किया है।

वामपंथियों ने आरसी मजूमदार, केएन शास्त्री जैसे पुराने पीढ़ी के इतिहासकारों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

(प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप इतिहास के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के पूर्व संपादक हैं। ये लेख बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी के साथ हुई बातचीत पर आधारित है।)

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