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तो क्या फिर हिंदू राष्ट्र बनेगा नेपाल?

Tue, 20 Jan 2015 04:08 PM IST
सीके लाल, नेपाल मामलों के जानकार
सीके लाल, नेपाल मामलों के जानकार Updated Tue, 20 Jan 2015 04:08 PM IST
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ज्यादातर सार्वजनिक अवकाश हिंदू त्यौहारों दशहरा, दिवाली और रामनवमी पर होते हैं। सरकारी विभाग नियमित रूप से कई मंदिरों और पारंपरिक अनुष्ठानों के लिए बजट जारी करते हैं।

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गाय को मारना अब भी कानूनन अपराध है और धर्मांतरण पर न सिर्फ ऐतराज किया जाता है बल्कि सरकार सक्रिय रूप से इसे हतोत्साहित भी करती है।

इस तरह नेपाल नाम के अलावा हर तरह से हिंदू बना हुआ है। और कुछ समूह ऐसे हैं जो नए संविधान में इसे नाम में भी फिर से स्थापित करना चाहते हैं। देश के इतिहास में पहली संविधान सभा बिना सर्वोच्च कानून की घोषणा किए 2012 में भंग हो गई जिससे अंतरिम व्यवस्था में दी गई मूलभूत आजादी व्यवस्थागत नहीं हो पाई।
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देश के मुख्य न्यायाधीश की देखरेख में अतिरिक्त-संवैधानिक प्रबंध के तहत जनादेश के लिए नवंबर 2013 में चुनाव करवाए गए।
इसके परिणाम काफी मजेदार निकले। हिंदू राजशाही के तहत काम कर चुकी पार्टियों को दो तिहाई बहुमत मिला। ऐसी पार्टी जिसने खुलकर हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना का वादा किया था और जिसका चुनाव चिन्ह पवित्र गाय था, वह दूसरे संविधान सभा चुनाव में तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इसने हिंदूवादी शक्तियों को प्रोत्साहित किया और भारत में उग्र हिंदुत्ववादी पार्टी के नरेंद्र भाई मोदी की जीत से यह उत्साह बना रहा।

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हिंदुत्व की स्वीकार्यता

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भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने एक साल के अंदर नेपाल की दो बार यात्रा की है- जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली बार किया है। नेपाल की एकमात्र हिंदू राष्ट्र की चमक जून 2001 के नारायणहिती नरसंहार के बाद खोने लगी थी जब राजमहल में हुए गोलीगांड में राजशाही के तत्कालीन शासक और उसके प्रत्यक्ष उत्तराधिकारियों की हत्या कर दी गई थी। ऐसा लगा कि शाह राजवंश ने दैवीय शक्ति खो दी थी। राजशाही उसके बाद कुछ ही सालों तक चल सकी।

अप्रैल 2006 में लोगों की इच्छा के अनुसार राजा की शक्तियों को सीमित कर दिया। साल 2007 में लागू अंतरिम संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को मूलभूत सिद्धांत के रूप में स्थापित किया। इसके बाद 2008 में चुनी गई संविधान सभा ने राजशाही को समूल समाप्त कर दिया। हिंदू धर्म ने शाह साम्राज्य को पैदा किया था, राजनीति पर इसके एकाधिकार की समाप्ति ने राजतंत्र को खत्म कर दिया।

राजपरिवार के विश्वासपात्रों के बहुत छोटे से समूह (जिसमें गोरखा सरदार, महल के दरबारी, शाही पुजारी और गुरू और शाह-राणा वंश के नाते-रिश्तेदार थे) के अलावा बहुत ही कम लोगों को उम्मीद या डर था कि पूरी तरह आप्रसांगिक हो चुके राजतंत्र की पुनर्स्थापना हो सकती है।

हालांकि देश की धार्मिक पहचान के रूप में हिंदुत्व की बहाली की अब भी व्यापक स्वीकार्यता बनी हुई है। नेपाल के इतिहास पर सरसरी नजर मारने से इस हिमालयी देश पर हिंदू धर्म के प्रभाव को समझा जा सकता है।

इतिहास के पन्नों में नेपाल

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हिंदू राज्य के रूप में नेपाल के उद्भव और क्षरण को शाह राजशाही (1768-2008) के उत्थान और पतन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राजा पृथ्वी नारायण शाह (1723-1775) काठमांडू घाटी के थोड़ा पश्चिम में महाभारत पहाड़ियों की एक छोटी सी सियासत के शासक थे।

साल 1750 में मंचु चीनियों ने ल्हासा पर कब्ज़ा कर लिया था लेकिन तिब्बत पर उनका नियंत्रण मजबूत नहीं था। साल 1801 में तख्त पर बैठे महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख योद्धाओं की ताकत का असर अभी नजर आना बाकी था।

जब 1757 की प्लासी की जंग में रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब को हरा दिया तो ईस्ट इंडिया कंपनी गंगा घाटी के बड़े इलाक़े की स्वाभाविक शासक बन गई। उधर उत्तरी और मध्य भारत में मुगलों का प्रभाव कम होने के बावजूद मराठों को उनके इलाके में ही रोक दिया गया था।

हिंदुस्थान (हिंदुओं का असली घर)

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राजा पृथ्वी या मुख्यतः उनके ब्राह्मण पुजारियों और शिक्षकों (जो काशी, प्रयाग, उज्जैन और हरिद्वार जैसे तीर्थस्थलों की अनगिनत बार यात्रा करते रहते थे) ने यह सटीक अनुमान लगा लिया था कि अगर वह मध्य पहाड़ों पर हमला करें तो उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम से प्रतिरोध का खतरा बहुत कम था।

फिर भी सुरक्षात्मक प्रबंध के तहत गोरखा शासक ने खुद को सनातन धर्म का रक्षक घोषित कर दिया जिससे उन्हें भ्रमणकारी साधुओं का विश्वास प्राप्त हो गया जिनका हिंदू क्षेत्र के करोड़ों लोगों में खासा प्रभाव था।

जब पृथ्वी ने 1768 में काठमांडू घाटी के मल्ला राजाओं को हरा दिया और अपना राजदरबार बसंतपुर के मनोहर दरबार चौक में स्थानांतरित किया तो उन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी कि उनका राज्य ही असली हिंदुस्थान (हिंदुओं का असली घर) है। ऐसा करीब ढाई सदी तक चलता रहा।

इस क्षेत्र में पहले भी हिंदू राजा हुए थे लेकिन शासन का मूल आधार धर्म को बनाया जाना शाह राजाओं और सेनापतियों का ही काम था और उन्होंने नेपाल पर करीब-करीब पूरे इतिहास में शासन किया।

गांधी या गोडसे

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हाल की राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद पांच शक्तियां- गोरखा सेना, काठमांडू के व्यापारी, मंदारिन व्यापारी, हिंदू भिक्षुक और देश के अंदर और बाहर लोगों के बीच संबंधों में मध्यस्थता करने वाले- ही देश के स्थायी ढांचे (पीईओएएन) का निर्माण करती हैं और हमेशा से सरकारी मामलों में महत्वपूर्ण रही हैं।

नारायणहिती नरसंहार के बाद इन शक्तियों को लगा कि राजतंत्र का आकर्षण ख़त्म हो गया है। संभवतः इन्हें लगता हो कि हिंदुत्व के बिना यह देश की राजनीतिक और सामाजिक ढांचे पर अपनी पकड़ खो देंगी।

हालांकि पीईओएन को धर्मनिरपेक्षता को झटके से हिला देने के ख़तरे का भी अहसास हो गया। नेपाल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बाहर से (ख़ासकर इस्लामिक देशों से) भेजा गया पैसा है।

नेपाल गांधी के हिंदुत्व को अपनाएगा या गोडसे के

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विदेशी सहायता प्रदान करने वाले मुख्यतः पश्चिमी देश हैं। नेपाली सेना को संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों से काफी सहायता मिलती है। हिंदुत्व को फिर स्वीकार करने की घोषणा का अंतरराष्ट्रीय समुदाय में स्वागत होने की आशंका कम ही है।

और तो और भारतीय जनता पार्टी के मुख्य तत्व होने के बावजूद भारत सरकार भी नेपाल पर हिंदुत्व को लेकर बहुत अधिक दबाव नहीं बनाएगी क्योंकि इससे पहाड़ों की जनजातीय आबादी के नाराज होने का ख़तरा है और बड़ी संख्या में गोरखा लड़ाके भारतीय सेना में भी हैं।

ऐसा लगता है कि नया संविधान बनाने को लेकर पीईओएन की मुख्य रणनीति मिश्रित भावनाओं की ही रहेगी। अंतरिम व्यवस्था के विपरीत संभवतः धर्मनिरपेक्षता सर्वोच्च कानून के मूलभूत आधारों में शामिल न रहे। यह भी हो सकता है कि प्रस्तावना में हिंदू शब्द का प्रयोग न हो। इस खामोशी का मतलब यह निकलेगा कि मौजूदा व्यवस्था के उलट वाला भाव विजयी हुआ है। इस तरह नेपाल एक हिंदू राष्ट्र बना रहेगा- इसका ऐलान किए बग़ैर।

जब धर्म की जड़ें हिंदुत्व की तरह गहरी और फैली हुई हैं तो राजनीति के वृक्ष की टहनियों और पत्तियों को धर्मनिरपेक्षता की ऊपरी मृदा पर फलने के लिए छोड़ देना चाहिए।

भारतीय संविधान के निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने सही कहा था, "हिंदू समाज 'वास्तव में अलोकतांत्रिक' है और असली धर्मनिरपेक्ष परंपराओं से विवाहित भी है।"

ऐसे में सिर्फ एक ही सवाल पैदा होता है कि नेपाल महात्मा गांधी के हिंदुत्व को अपनाएगा या उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के हिंदुत्व को स्वीकार करेगा। राजनीति के धर्म के बजाय धर्म की राजनीति के चलते सर्वोत्कृष्ट के लिए उम्मीद, प्रार्थना और तैयारी ही की जा सकती है।

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