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एक पंड़ित और मौलवी मिलकर बचा रहे कछुए!

Sat, 11 Jan 2014 07:18 PM IST
Updated Sat, 11 Jan 2014 07:18 PM IST
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दक्षिण भारतीय राज्य केरल में धर्मगुरु अपने अनुयायियों से एक अनूठी अपील कर रहे हैं। यह अपील सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर नहीं, बल्कि कछुओं की लुप्तप्राय प्रजाति ओलिव रिडले को बचाने के लिए की जा रही है। केरल के कसरगोड जिले में छित्तारी से लेकर थईक्कडप्पुरम तक 22 किलोमीटर लंबे तटीय इलाक़े में कछुओं को बचाने की ज़रूरत के बारे में लोगों को बताया जा रहा है।

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नमाज के बाद अपील

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जुमा मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष अब्दुल्लाह हाजी मोहम्मद ने बीबीसी को बताया कि नमाज़ के बाद उन्होंने लोगों को कछुओं को बचाने की ज़रूरत के बारे में बताया। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे कछुओं के अंडे न खाएं और कछुओं को न मारें। हाजी मोहम्मद ने कहा कि उन्हें एक ग़ैरसरकारी संगठन नयथाल ने कछुओं को सुरक्षित रखने के तरीकों और अंडों से निकलने वाले बच्चों को समुद्र में छोड़ने के बारे में बताया है।

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समुद्री अदालतें

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श्री कुरुमबा भगवती मंदिर के अध्यक्ष सुरेश अविक्कल ने बताया कि वन विभाग के अधिकारियों ने भी लोगों को कछुओं के संरक्षण की ज़रूरत के बारे में बताया है। बुधवार को मंदिर में हुए एक धार्मिक आयोजन के दौरान भी लोगों को कछुए बचाने के बारे में जागरूक किया गया। नयथाल को धार्मिक संस्थाओं के ज़रिए लोगों से अपील करने का विचार स्थानीय मामले निपटाने के लिए धर्मसंस्थाओं द्वारा संचालित 'समुद्री अदालतों' से आया। इन अदालतों के तहत मस्ज़िदों और मंदिरों की समितियाँ मछुआरों के छोटे-मोटे मामले बातचीत से सुलझाती हैं।

नयथाल से जुड़े सुधीर कुमार कहते हैं कि इन्हीं को देखकर हमने धर्मगुरुओं की मदद लेने के बारे में सोचा। सुधीर के मुताबिक़ अब तक के नतीजे उत्साहजनक रहे हैं। वे कहते हैं कि धार्मिक समुदायों की सलाह के ज़रिए वे कछुओं के अंडे खोजने और उनसे पैदा होने वाले बच्चों को वापस समुद्र में भेजने में कामयाब रहे।

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और जानवर खा जाते हैं

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कछुओं के अंडों को इस इलाक़े के लोग और जानवर खा जाते हैं। ज़्यादातर कछुए जाल में फँस जाते हैं या यहाँ के लोगों का भोजन बन जाते हैं। इन कछुओं को बचाने के लिए एनजीओ को सक्रिय होना पड़ा। मगर क्या धर्मगुरुओं के प्रभाव से कछुओं को बचाने की यह पहल कारगर साबित होगी?

इनाम देने की घोषणा

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टर्टल एक्शन ग्रुप के संस्थापक और जाने माने सरीसृप विशेषज्ञ डॉक्टर कार्तिक शंकर कहते हैं, "जब तक यह लोगों की धार्मिक भावना नहीं बन जाती तब तक यह कारगर रहेगी, एक वैज्ञानिक के बतौर पर मैं भावनात्मक धारणाओं का विरोध करता हूँ।" वे कहते हैं, "यदि इन अपीलों के ज़रिए लोगों को शिक्षित और जागरूक किया जा रहा है, तो यह ठीक है।"

"लेकिन समय के साथ लोगों में पर्यावरण सुरक्षा के प्रति समग्र दृष्टिकोण पैदा किया जाना चाहिए। बदलाव तभी आएगा, जब संरक्षण के अन्य पहलुओं को भी इसमें शामिल किया जाएगा।" कसरगोड के सहायक वन संरक्षक जयामाधवन कहते हैं,"हमने धार्मिक समितियों से बात की है और अंडे देते कछुओं के बारे में जानकारी देने वालों को एक हज़ार रुपए इनाम देने की घोषणा की है। बहुत जल्द ही हमें दो फ़ोन कॉल भी आए।"

फ़ोन कॉल्स की मदद

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इन फ़ोन कॉल्स की मदद से वन विभाग के अधिकारी और ग़ैरसरकारी संगठन के कार्यकर्ता तीन अलग-अलग स्थानों पर 125, 88 और 121 अंडे खोजने में कामयाब रहे। इसके बाद कछुओं के बच्चों को सुरक्षित समुद्र में छोड़ दिया गया। जयमाधवन कहते हैं कि धर्मगुरुओं की मदद लेने का फ़ायदा यह है कि उनका इस इलाक़े में ख़ासा प्रभाव है।

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