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किसी पर थोपने की जरूरत नहीं, दिलों पर राज करेगी हिंदी

Tue, 25 Sep 2012 02:03 AM IST
जोहान्सबर्ग से उदय कुमार
जोहान्सबर्ग से उदय कुमार Updated Tue, 25 Sep 2012 02:03 AM IST
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hindi will rule on hearts no need to impose on anyone
विश्व पटल पर हिंदी को गौरव दिलाने और उसे तकनीक की भाषा बनाने की कोशिश के संकल्प के साथ सोमवार को यहां नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन का समापन हो गया। आयोजन के अंतिम दिन पारित संकल्प में कहा गया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा की मान्यता दिलाने के लिए समयबद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। अपने समापन भाषण में विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर ने आयोजन में लिए गए संकल्पों को मिल-जुलकर पूरा करने पर जोर दिया।
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दक्षिण अफ्रीका में हुए इस आयोजन से यह बात साफ हो गई कि भारत का आत्मविश्वास बढ़ने के साथ हिंदी का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। सम्मेलन में दिग्गज विद्वान इस तथ्य पर एकमत थे कि कंप्यूटर ने हिंदी के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे हिंदी किसी पर थोपने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वह खुद दिलों पर राज करेगी। विचार मंथन में पाया गया कि हिंदी का स्वाभाविक विस्तार होने देना चाहिए।
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सांसद मणिशंकर अय्यर ने जोर दिया कि हिंदी के साथ साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी समुचित स्थान मिले तब हिंदी भी सर्वस्वीकार्य होगी। साहित्यकार अशोक चक्रधर हों या तमिलभाषी विदेश सचिव मधुसूदन गणपति, सभी ने अपनी और से यह जताने की कोशिश की कि हिंदी को किसी की दया की जरूरत नहीं है और न ही किसी से कोई टकराव है। विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर ने नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन को हिंदी के रंग बिखरने वाला उत्सव करार दिया।
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इन आयोजनों में दिए जाने वाले सम्मानों को औपचारिक रूप देते हुए आखिरी दिन पारित संकल्प में विश्व हिंदी सम्मान का नाम देने की अनुशंसा की गई। इस बार यह विश्व सम्मान 17 विदेशी और 18 भारतीय हिंदी विद्वानों को विदेश राज्यमंत्री ने प्रदान किया। अफगानिस्तान और चीन के दो विद्वानों का भी सम्मान होना था, लेकिन वे नहीं पहुंच सके। सूरीनाम के हिंदी विद्वान भोलानाथ नारायण की अनुपस्थिति में वहां के राजदूत ने उनका सम्मान ग्रहण किया।

सम्मेलन के तीसरे दिन पारित संकल्प में माना गया कि हिंदी के वैश्विक प्रसार में गांधीजी की भाषा दृष्टि की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इसके साथ ही गांधी के रास्ते पर जाकर दुनिया को नई राह दिखाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के महान स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी नेल्सन मंडेला का आभार व्यक्त किया गया। दक्षिण अफ्रीका में भारत के राजदूत वीरेंद्र गुप्त ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में भी मंडेला का जिक्र किया।

पारित संकल्प में कहा गया है कि दो विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच अधिकतम तीन साल का अंतराल हो। 10वां विश्व हिंदी सम्मेलन भारत में आयोजित करने का संकल्प व्यक्त किया गया। इसके अलावा दो विश्व सम्मेलनों के बीच हिंदी शिक्षण और प्रसार के लिए विषय विशेष पर होने वाले क्षेत्रीय सम्मेलनों का सिलसिला बढ़ाया जाना चाहिए।


संकल्प में पहले हिंदी सम्मेलन के बाद मॉरीशस में स्थापित किए गए विश्व हिंदी सचिवालय को विभिन्न देशों में हिंदी शिक्षण से जुड़े विश्वविद्यालयों, विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से संबद्ध डाटाबेस बनाने के लिए व्यापक स्रोत केंद्र की स्थापना करने के लिए कहा गया है। यह सचिवालय विश्वभर के हिंदी विद्वानों, लेखकों और हिंदी के प्रचार प्रसार से जुड़े लोगों का भी डाटाबेस तैयार करेगा। साथ ही हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी के अनुकूल बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों में हिंदी भाषा के उपयोग वाले उपकरण तैयार करने के लिए हरसंभव सहायता देने पर जोर दिया गया। साथ ही आईटी में देवनागरी लिपि का उपयोग बढ़ाने के लिए पर्याप्त सॉफ्टवेयर बनाने का काम तेज करने का संकल्प लिया गया।
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