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नहीं रहे अप्रतिम कथाकार अमरकांत

Mon, 17 Feb 2014 08:07 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Mon, 17 Feb 2014 08:07 PM IST
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Hindi litterateur Amarkant passes away

हिंदी कथा के अप्रतिम हस्ताक्षर अमरकांत सोमवार को दुनिया को अलविदा कह गए।

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सुबह तकरीबन साढे़ नौ बजे घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने से इलाहाबाद और हिंदी साहित्य जगत को गहरा आघात लगा है।

सूचना मिलते ही लोगों का उनके घर पर जुटने का सिलसिला शुरू हो गया। किसी को भी सहज इस खबर पर यकीन नहीं हो रहा था, सो देश-विदेश से लोगों ने मित्रों, परिचितों के पास फोन करके सुनने का सच जानना चाहा। हर कोई आहत रहा, हर कोई स्तब्ध।

बेटे अरबिंद बिंदु के मुताबिक, मंगलवार को शवयात्रा सुबह दस बजे उनके अशोक नगर के पंचपुष्प अपार्टमेंट स्थित आवास से रसूलाबाद घाट के लिए रवाना होगी जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
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गुड़गांव से बेटे अरुणवर्धन तथा बहू कुमुद शर्मा और पटना से बेटी संध्या आ रहे हैं।

अमरकांत जी के सम्मान में भारतीय ज्ञानपीठ का दफ्तर बंद कर दिया गया तो हिंदुस्तानी एकेडमी सहित कई संस्थाओं ने अपने कार्यक्रम स्थगित कर दिए।

दूरदर्शन के इलाहाबाद केंद्र में भी रिकार्डिंग नहीं हुई।

वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह, यश मालवीय, प्रणय कृष्ण, प्रोफेसर अली अहमद फातमी, प्रोफेसर अनिता गोपेश, सूर्यनारायण, श्लेष गौतम, सुधीर सिंह, शिवनारायण सिंह सहित बड़ी संख्या में रचनाकारों, प्रशंसकों, संस्कृति कर्मियों ने घर पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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जब दोबारा भरी कलम में स्याही...
तमाम संघर्षों के बावजूद अद्भुत जिजीविषा के धनी अमरकांत की रचनाधर्मिता न कभी आहत हुई और न ही उन्होंने दया, सहानुभूति को पास फटकने दिया।

लंबी बीमारी से जूझने के बाद जब दोबारा उन्होंने अपनी कलम में स्याही भरी तो ‘इन्हीं हथियारों से’ जैसा धारदार उपन्यास दिया, जिस पर उन्हें पहले साहित्य अकादमी और फिर व्यास सम्मान से नवाजा गया।

अनेक पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें साहित्य की अप्रतिम सेवा के लिए प्रतिष्ठित ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। यह अमरकांत ही थे, जिनके लिए अपनी परंपरा में संशोधन करते हुए भारतीय ज्ञानपीठ परिवार ने उन्हें उनके गृहनगर में ही सम्मानित किया।

कहानी डिप्टी कलेक्टरी से मिली शोहरत
सोलह कहानी संग्रहों में 128 कहानियों सहित उन्होंने 13 उपन्यास भी लिखे।

उनकी संपूर्ण कहानियां वरिष्ठ कथाकार रवींद्र कालिया के संपादन में भारतीय ज्ञानपीठ से दो खंडों में प्रकाशित हुईं। उनकी डिप्टी कलेक्टरी, दोपहर का भोजन, हत्यारे, जिंदगी और जोंक, कम्युनिस्ट, बहादुर, मूस जैसी कहानियां काफी चर्चित रहीं।


कहानी 'डिप्टी कलेक्टरी' से उन्हें ख्याति मिली, जिसे अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला था। फिलहाल वह पत्रकारिता पर केंद्रित लघु उपन्यास खबरों का सूरज लिखने में व्यस्त थे, जो अब अधूरा रह गया।

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