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आखिर हिंदी भाषा बोलने में शर्म क्यों आनी चाहिए?

Sat, 12 Sep 2015 09:11 AM IST
Updated Sat, 12 Sep 2015 09:11 AM IST
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Hindi Conference ib bhopal

हिंदी आगे कैसे बढ़े? सितंबर के महीने में लोग अक्सर यह सवाल पूछते मिल जाते हैं। आखिर सितंबर हिंदी की रस्मी सरकारी याद का महीना जो है।

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इस बार तो यह सितंबर कुछ और भी खास हो गया है क्योंकि भोपाल में हो रहा विश्व हिंदी सम्मेलन इसी सवाल पर विचार कर रहा है कि हिंदी के विस्तार की संभावनाएं क्या हैं?
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लेकिन क्या सवाल सचमुच इतना कठिन है? किसे पता नहीं है कि हिंदी को समाज में इज्जत क्यों नहीं मिली? और सरकारी कामकाज में हिंदी अब तक आगे क्यों नहीं बढ़ पाई?
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पहले दूसरा सवाल। हिंदी की पहली बाधा तो सरकारी हिंदी ही है। जिन लोगों ने यह हिंदी गढ़ी, वह जाने किस दुनिया से ऐसी कठिन और अबूझ हिंदी ढूंढ़कर लाए, जिसे हिंदी के प्रकांड विद्वान भी तब तक नहीं समझ सकते, जब तक साथ में मूल अंग्रेजी का प्रयोग न दिया गया हो। तो जिस हिंदी को समझने के लिए आपको साथ में अंग्रेजी की जरूरत पड़े, वह हिंदी कैसे आगे बढ़ सकती है?

मौलिक तौर पर विकसित नहीं की गई हिंदी

Hindi Conference ib bhopal

कारण यह कि यह सरकारी हिंदी मौलिक तौर पर विकसित नहीं की गई, बल्कि अनुवाद से गढ़ी गई। और जब आप प्रयोग के बजाय अनुवाद से भाषा गढ़ेंगे तो वह हमेशा ही अबूझ हो जाएगी,

क्योंकि जब तक आपको यह पता न हो कि हिंदी का अमुक शब्द अंग्रेजी के किस शब्द का अनुवाद है और किस अर्थ को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया गया है, तब तक वास्तविक अर्थ समझ में ही नहीं आएगा।

अनुवाद की हिंदी का एक उदाहरण अभी एक जगह देखा, 'कम्प्यूटर और मोबाइल को हिंदी से सक्षम किया जाएगा।' सक्षम यानी Enable! समस्या यही है।

क्योंकि इस प्रक्रिया को आप अंग्रेजी में ही जानते, समझते और सोचते हैं— To Enable, और फिर उसकी हिंदी ढूंढ़ने चलते हैं तो डिक्शनरी में 'सक्षम' मिलता है, उसे वहां रख देते हैं!

हालांकि यह उदाहरण सरकारी हिंदी का नहीं है, बल्कि एक निजी वेबसाइट का है, लेकिन मानसिकता वही है। पूरी सरकारी हिंदी इसी अनुवाद और डिक्शनरी की प्रक्रिया से तैयार हुई।

इसे बनाने वाले लोग यह भूल गए कि शब्द व्यवहार से डिक्शनरी में पहुंचते हैं, डिक्शनरी से व्यवहार में नहीं आते। इसीलिए यह हिंदी आज तक व्यवहार में नहीं आ सकी। और क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि हिंदी के किसी अखबार, किसी न्यूज़ चैनल में आपको ऐसी हिंदी के प्रयोग क्यों नहीं मिलते?

इसलिए कि उन्हें बाज़ार में सफल होना है, इसलिए वह उस सरकारी, अनुवादी, पारिभाषिक हिंदी को आसानी से ऐसी आसान हिंदी में बदल कर अपनी खबर देते हैं, जो सबको बिना अटके समझ में आ जाए। ऐसी हिंदी चलाना उनके लिए बाजार की मांग है।

बाजार का प्रभाव

Hindi Conference ib bhopal

हिंदी जो कुछ आगे बढ़ी है, इसी बाज़ार के कारण आगे बढ़ी है। पहले सिनेमा, फिर टीवी और अब इंटरनेट ने हिंदी के अथाह बाजार के कारण उसे 'पैसा कमाऊ भाषा' तो बना ही दिया है। हिंदी सिनेमा के बाद अब हिंदी के टीवी चैनल और अख़बार भी विज्ञापनों के जरिए अरबों रुपए सालाना कमा रहे हैं।

अब मोबाइल पर इंटरनेट के लगातार प्रसार के कारण हिंदी और भी मज़बूत होगी क्योंकि जो भी विशाल हिंदी भाषी बाजार से पैसा कमाना चाहेगा, उसे हिंदी को अपनाना ही पड़ेगा।

हिंदी को अपनाना बाजार की मजबूरी तो है, लेकिन हिंदी को सही जगह तभी मिल पाएगी, जब उसे समाज में अंग्रेजी से ज्यादा नहीं तो कम से कम बराबरी का दर्जा मिले। यह कैसे होगा?

अंग्रेजी बनाम हिंदी

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हिंदी बोलने में ही लोगों को शर्म महसूस होती है। लोग टूटी-फूटी, ऊटपटांग अंग्रेजी बोल कर भी गर्व महसूस करते हैं। स्कूलों में सारा जार अंग्रेजी पर है, हिंदी की पढ़ाई बस रस्म-अदायगी की तरह होती है। नई पीढ़ी के लोगों को तो वाकई हिंदी बोलने तक में बड़ी दिक्कत होती है। ठीक है कि अच्छी अंग्रेजी आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

अंग्रेजी सीखिए, पढ़िए और बोलिए, लेकिन हिंदी बोलने में शर्म क्यों आनी चाहिए? हिंदी का विस्तार तो खैर कोई रोक नहीं सकता, लेकिन समस्या केवल दो हैं कि हिंदी को इज्जत कैसे मिले और वह सरकारी चलन में कैसे आए?

हिंदी के कुछ पत्रकारों की मदद लीजिए, वह शायद सुझा सकें कि सरकारी हिंदी को आसान कर कैसे इस लायक बनाया जाए कि वह लोगों की समझ में आ सके। और हिंदी को इज्जत भी तभी मिल पाएगी, जब सरकारी अमला उसे इज्जत देने लगे। ये दोनों ही काम सरकार को करने हैं।

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