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हिमाचल चुनाव: दिग्गजों को हरा चुके हैं वोटर
शिमला/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 28 Oct 2012 10:10 AM IST
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हिमाचल के वोटर दिग्गजों को भी चुनावी बयार में जमीन सुंघा चुके हैं। मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, शांता कुमार, नेता प्रतिपक्ष विद्या स्टोक्स से लेकर केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा और भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री जेपी नड्डा को भी हार का स्वाद चखना पड़ा है।
इनमें मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ही ऐसे हैं, जिन्हें किसी विधानसभा चुनाव में हार नहीं मिली है। इन्हें लोकसभा चुनावों में जनता ने हार दिखाई है। हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार को भी अपने पहले चुनाव में रेणुका सीट से हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें 1951 के चुनावों में पच्छाद से तो जीत मिली, लेकिन रेणुका से हार गए थे। मंडी के दिग्गज नेता कर्मसिंह ठाकुर को दो बार मोती राम ठाकुर के हाथों हाथ मिली थी।
केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने एक बार 1982 में ही विधानसभा चुनावों पूर्व विधायक दौलत राम चौहान के हाथों शिमला सीट से हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा महामंत्री जेपी नड्डा को 2003 के चुनावों में तिलकराज के खिलाफ हार झेलनी पड़ी।
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मंडी के ठाकुरों में गुलाब सिंह ठाकुर और कौल सिंह ठाकुर भी विधानसभा चुनावों में हार का स्वाद चख चुके हैं। चंद्र कुमार, रामलाल ठाकुर और राजन सुशांत को विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा सीटों पर भी हार का सामना करना पड़ा है।
कौन कब किससे हारा?
डा. यशवंत सिंह परमार
1951 में धर्म सिंह रेणुका से हारे, पच्छाद से जीते।
ठाकुर कर्म सिंह
1977 और 1982 में मोती राम ठाकुर से चच्योट निर्वाचन क्षेत्र से हारे।
वीरभद्र सिंह
1990 में पूर्व मुख्यमंत्री राम लाल ठाकुर से जुब्बल कोटखाई से हारे। इन्हीं चुनावों में रोहडू से जीते।
प्रेम कुमार धूमल
1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव हारे, इसके बाद दूसरा लोकसभा चुनाव हारे और 1991 में पहली बार जीत तक सांसद बने।
विद्या स्टोक्स
1993 के विधानसभा चुनाव में विद्या स्टोक्स को राकेश वर्मा के हाथों ठियोग में हार मिली।
आनंद शर्मा
केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा 1982 में पूर्व विधायक दौलत राम चौहान के हाथों हार मिली।
शांता कुमार
1993 के चुनावों में शांता कुमार को सुलह में मानचंद राणा के खिलाफ हार झेलनी पड़ी।
गुलाब सिंह ठाकुर
गुलाब सिंह ठाकुर को 1985 और 2003 में अपने निर्वाचन क्षेत्र से हार का सामना करना पड़ा।
कौल सिंह ठाकुर
कौल सिंह ठाकुर को 1990 के चुनावों में हार झेलनी पड़ी।
जेपी नड्डा
जेपी नड्डा को 2003 के चुनावों में तिलक राज के हाथों हार मिली।
चंद्र कुमार
चंद्र कुमार दो बार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांगड़ा सीट से चुनाव हार चुके हैं।
राम लाल ठाकुर
पूर्व मंत्री से राम लाल ठाकुर 1990 और 2007 के विधानसभा चुनावों में हार चुके हैं।
राजन सुशांत
राजन सुशांत को विधानसभा चुनावों में हार झेल चुके हैं।
महेश्वर सिंह
महेश्वर सिंह 1985 में विधानसभा चुनावों में और मंडी संसदीय सीट से चुनाव हार चुके हैं।
इन्हें कभी नहीं मिली हार
सिरमौर जिले की पच्छाद सीट से कांग्रेस के गंगू राम मुसाफिर आज तक कभी नहीं हारे हैं। मंडी की धर्मपुर सीट से पांच चुनाव पांच अलग अलग चुनाव चिन्हों पर जीत चुके हैं। शिक्षा मंत्री ईश्वर दास धीमान पहले मेवा और अब भोरंज सीट पर लगातार पांच चुनाव नहीं हारे हैं। इनके अलावा हमीरपुर क्षेत्र से स्व. जगदेव चंद ठाकुर 1977 से लेकर 1993 तक कोई भी चुनाव नहीं हारे।
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इनमें मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ही ऐसे हैं, जिन्हें किसी विधानसभा चुनाव में हार नहीं मिली है। इन्हें लोकसभा चुनावों में जनता ने हार दिखाई है। हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार को भी अपने पहले चुनाव में रेणुका सीट से हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें 1951 के चुनावों में पच्छाद से तो जीत मिली, लेकिन रेणुका से हार गए थे। मंडी के दिग्गज नेता कर्मसिंह ठाकुर को दो बार मोती राम ठाकुर के हाथों हाथ मिली थी।
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केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने एक बार 1982 में ही विधानसभा चुनावों पूर्व विधायक दौलत राम चौहान के हाथों शिमला सीट से हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा महामंत्री जेपी नड्डा को 2003 के चुनावों में तिलकराज के खिलाफ हार झेलनी पड़ी।
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मंडी के ठाकुरों में गुलाब सिंह ठाकुर और कौल सिंह ठाकुर भी विधानसभा चुनावों में हार का स्वाद चख चुके हैं। चंद्र कुमार, रामलाल ठाकुर और राजन सुशांत को विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा सीटों पर भी हार का सामना करना पड़ा है।
कौन कब किससे हारा?
डा. यशवंत सिंह परमार
1951 में धर्म सिंह रेणुका से हारे, पच्छाद से जीते।
ठाकुर कर्म सिंह
1977 और 1982 में मोती राम ठाकुर से चच्योट निर्वाचन क्षेत्र से हारे।
वीरभद्र सिंह
1990 में पूर्व मुख्यमंत्री राम लाल ठाकुर से जुब्बल कोटखाई से हारे। इन्हीं चुनावों में रोहडू से जीते।
प्रेम कुमार धूमल
1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव हारे, इसके बाद दूसरा लोकसभा चुनाव हारे और 1991 में पहली बार जीत तक सांसद बने।
विद्या स्टोक्स
1993 के विधानसभा चुनाव में विद्या स्टोक्स को राकेश वर्मा के हाथों ठियोग में हार मिली।
आनंद शर्मा
केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा 1982 में पूर्व विधायक दौलत राम चौहान के हाथों हार मिली।
शांता कुमार
1993 के चुनावों में शांता कुमार को सुलह में मानचंद राणा के खिलाफ हार झेलनी पड़ी।
गुलाब सिंह ठाकुर
गुलाब सिंह ठाकुर को 1985 और 2003 में अपने निर्वाचन क्षेत्र से हार का सामना करना पड़ा।
कौल सिंह ठाकुर
कौल सिंह ठाकुर को 1990 के चुनावों में हार झेलनी पड़ी।
जेपी नड्डा
जेपी नड्डा को 2003 के चुनावों में तिलक राज के हाथों हार मिली।
चंद्र कुमार
चंद्र कुमार दो बार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांगड़ा सीट से चुनाव हार चुके हैं।
राम लाल ठाकुर
पूर्व मंत्री से राम लाल ठाकुर 1990 और 2007 के विधानसभा चुनावों में हार चुके हैं।
राजन सुशांत
राजन सुशांत को विधानसभा चुनावों में हार झेल चुके हैं।
महेश्वर सिंह
महेश्वर सिंह 1985 में विधानसभा चुनावों में और मंडी संसदीय सीट से चुनाव हार चुके हैं।
इन्हें कभी नहीं मिली हार
सिरमौर जिले की पच्छाद सीट से कांग्रेस के गंगू राम मुसाफिर आज तक कभी नहीं हारे हैं। मंडी की धर्मपुर सीट से पांच चुनाव पांच अलग अलग चुनाव चिन्हों पर जीत चुके हैं। शिक्षा मंत्री ईश्वर दास धीमान पहले मेवा और अब भोरंज सीट पर लगातार पांच चुनाव नहीं हारे हैं। इनके अलावा हमीरपुर क्षेत्र से स्व. जगदेव चंद ठाकुर 1977 से लेकर 1993 तक कोई भी चुनाव नहीं हारे।