ज्यादा वोटिंग का मतलब 'मोदी लहर' नहीं, असलियत कुछ और है!
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चुनावी मौसम में दो बड़े मुद्दे छाए रहे हैं। पहला, मोदी लहर और उसकी असलियत है। भाजपा का कहना है कि देश में मोदी की लहर है और कांग्रेस का कहना है कि यह मीडिया की बनाई हवा है।
दूसरा मुद्दा है अब तक हुई ज्यादातर लोकसभा सीटों पर रिकॉर्डतोड़ वोटिंग। सभी राज्यों में इस बार 2009 की तुलना में इस बार ज्यादा मतदान हुआ है। कुछ राज्यों में तो कई साल का रिकॉर्ड टूट गया।
भाजपा कह रही है कि ज्यादा वोटिंग मोदी लहर की तस्दीक करती है, लेकिन यह बात हकीकत के कितना करीब है, यह 16 मई को पता चलेगा। लेकिन अगर गौर किया जाए, तो इस मान्यता पर सवाल खड़ा हो सकता है।
पांच 'लहर' वाले चुनावों का विश्लेषण
तो क्या इसका यह मतलब है कि कांग्रेस का दस साल का शासन उन्हें इतना तंग कर चुका है कि वो घरों से निकलकर बड़े पैमाने पर वोटिंग कर रहे हैं? या फिर हम ऐसी घटना को जरूरत से ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, जो असल में चुनावी नतीजों के मोर्चे पर कोई बड़ा अंतर पैदा ही नहीं करती।
टीओआई ने ऐसे पांच चुनावों पर निगाह डाली, जिनमें लहर दिखी। इनमें 1977 का आपातकाल विरोधी चुनाव, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ 1984 का चुनाव, बोफोर्स कांड के बाद हुआ 1989 का चुनाव, वाजपेयी की लहर वाला 1999 का चुनाव और 2004 का भारत उदय वाला चुनाव शामिल है।
1984 में इंदिरा की हत्या से बनी लहर
इस अध्ययन में 12 बडे़ राज्यों पर गौर किया गया, जो 82 फीसदी सीटों की नुमाइंदगी कर रहे थे। उस साल और उससे पिछली बार हुई वोटिंग के बीच तुलना की गई। और सामने आने वाले नतीजे बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाले रहे।
सबसे पहले इनमें यह बात सामने आई है कि 1984 और 1977 को छोड़ दिया जाए, तो तीन अन्य 'लहर वाले चुनावों' में वास्तव में पिछले चुनावों की तुलना में कम मतदान हुआ था।
1977 में आपातकाल के विरोध में वोटिंग हुई थी, ऐसे में उसमें उछाल स्वाभाविक है। इसके अलावा 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में वाकई लहर बनी थी।
वोटर बढ़े और लहर भी बनी
1980 की तुलना में 1984 के चुनावों में वोटर की तादाद में 7 फीसदी का उछाल आया। और अध्ययन में शामिल सभी राज्यों की वोटिंग में इजाफा हुआ।
आपातकाल हटने के बाद जब 1977 में चुनाव हुए, तो पिछले लोकसभा चुनाव (1971) की तुलना में 4.7 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया था। तीन अन्य तथाकथित लहर चुनावों में पिछले चुनावों की तुलना में कम वोटिंग हुई।
सभी चुनावों में वोटर लिस्ट में गजब का बदलाव आया, ऐसे में मतदाताओं की संख्या की तुलना करना सही नहीं होगा। एक और मान्यता यह है कि वोटर का गुस्सा ज्यादा वोटिंग के रूप में सामने आता है और उसे सत्ता विरोधी लहर माना जाता है।
लेकिन बाकी तीन चुनावों में ऐसा नहीं
यहां भी नतीजों से साबित हुआ कि ज्यादा वोटिंग के मायने मौजूदा सांसद का विरोध नहीं है। दोनों के बीच कोई खास ताल्लुक नहीं दिखा। 1999 के चुनावों में जहां ज्यादा वोटिंग हुई, वहां 40 फीसदी मौजूदा सांसद हार गए।
2004 में इनकी तादाद 28 फीसदी और 2009 में इनकी संख्या 30 फीसदी रही। दूसरे शब्दों में कहें, जब ज्यादा वोटिंग हुई या इस मामले में कोई रिकॉर्ड पीछे छूट गया, तो भी 50 फीसदी सांसद भी नहीं हारे।
बातें अलग हैं और सच्चाई अलग
ऐसे में ज्यादा वोटिंग और सत्ता विरोधी लहर के बीच रिश्ते की तलाश करना भी सही नहीं है। सत्ता विरोधी लहर के हिसाब से देखें, तो 12 बड़े राज्यों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।
मसलन, 2004 के चुनावों में बिहार में जब भी वोटिंग ज्यादा हुई, मौजूदा सांसद हार गया। लेकिन मध्य प्रदेश में वोटिंग बढ़ी, तो एक भी मौजूदा सांसद चुनाव नहीं हारा।
इसी तरह 2009 के चुनावों में उड़ीसा में 75 फीसदी मौजूदा सांसद हार गए, लेकिन केरल में एक भी सांसद के साथ ऐसा नहीं हुआ। जाहिर है, ज्यादा वोटिंग और राष्ट्रीय सेंटिमेंट के बजाय सत्ता विरोधी लहर के मामले में स्थानीय संदर्भ ज्यादा जरूरी साबित हुए।