फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   high court stays hanging of surendra koli.

सुरेंद्र कोली की फांसी पर हाईकोर्ट की रोक

Sat, 01 Nov 2014 02:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Sat, 01 Nov 2014 02:06 AM IST
विज्ञापन
high court stays hanging of surendra koli.

निठारी कांड में फांसी की सजा पाए सुरेंद्र कोली की सजा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी है। कोली को फांसी देने में हुए विलंब के आधार पर सजा माफ करने के लिए दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश डा. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार से कोली की दया याचिका खारिज करने संबंधी सभी कागजात 21 नवंबर तक तलब कर लिए हैं। मामले की सुनवाई 25 नवंबर को होगी।

विज्ञापन


पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट(पीडीयूआर) ने जनहित याचिका दाखिल कर कोली की फांसी माफ करने की मांग की है। पीडीयूआर ने सजा के क्रियान्वयन में हुए विलंब को मुख्य आधार बनाया है।
विज्ञापन


कहा गया कि फांसी का आदेश दिए जाने के बाद राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति ने दया याचिकाओं के निस्तारण में तीन वर्ष तीन माह का असाधारण विलंब किया है। इतना ही नहीं राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद राष्ट्रपति के पास इसे भेजने में तीन माह का विलंब किया। पीडीयूआर ने दया याचिकाओं के निस्तारण की प्रक्रिया को भी दोषपूर्ण बताया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सुप्रीमकोर्ट द्वारा पूर्व में अत्यधिक विलंब के आधार पर फांसी की सजाएं माफ किए जाने का भी उदाहरण दिया गया। केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलीसिटर जनरल अशोक मेहता ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि इस मामले में जनहित याचिका पोषणीय नहीं है। कोली की दया याचिका 28 जुलाई 2014 को राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दी गई थी। इसके बाद कोली ने चार पेज का पत्र सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखा जिसे पुनरीक्षण याचिका के तौर पर स्वीकार करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने 28 अक्तूबर तक फांसी पर रोक लगा दी थी। 28 अक्तूबर को पुनरीक्षण अर्जी पर खुली अदालत में सुनवाई के बाद इसे खारिज कर दिया।


इसके बाद कोली को फांसी दिए जाने का रास्ता साफ हो गया था। अब पीडीयूआर ने सजा देने में विलंब को आधार बनाते हुए पीआईएल दाखिल कर कहा है राष्ट्रपति के आदेश का न्यायिक पुनरीक्षण हो सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed