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पढ़िए हाशिमपुरा नरसंहार की दर्दभरी कहानी, गवाहों की जुबानी

Sun, 22 Mar 2015 09:56 AM IST
आनंद प्रकाश/अमर उजाला, मेरठ
आनंद प्रकाश/अमर उजाला, मेरठ Updated Sun, 22 Mar 2015 09:56 AM IST
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hashimpura massacre case.

फरवरी 1986 में केंद्र सरकार ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया, तो वेस्ट यूपी में माहौल गरमा गया था। इसके बाद 14 अप्रैल 1987 से मेरठ में धार्मिक उन्माद शुरू हुआ। कई लोगों की हत्या हुई, तो दुकानों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया था। हत्या, आगजनी और लूट की वारदातें होने लगीं। इसके बाद भी मेरठ में दंगे की चिंगारी शांत नहीं हुई थी। मई का महीना आते आते कई बार शहर में कर्फ्य जैसे हालात हुए और कर्फ्यू लगाना भी पड़ा।

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जब माहौल शांत नहीं हुआ और दंगाई लगातार वारदात करते रहे, तो शहर को सेना के हवाले कर दिया गया था। इसके साथ ही बलवाइयों को काबू करने के लिए 19 और 20 मई को पुलिस, पीएसी तथा सेना के जवानों ने सर्च अभियान चलाया था। हाशिमपुरा के अलावा शाहपीर गेट, गोला कुआं, इम्लियान सहित अन्य मोहल्लों में पहुंचकर सेना ने मकानों की तलाशी लीं। इस दौरान भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक सामग्री मिली थीं। सर्च अभियान के दौरान हजारों लोगों को पकड़ा गया और गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। इसी दौरान 22 मई की रात हाशिमपुरा कांड हुआ।
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हापुड़ रोड पर गुलमर्ग सिनेमा के सामने हाशिमपुरा मोहल्ले में 22 मई 1987 को पुलिस, पीएसी और मिलिट्री ने सर्च अभियान चलाया था। आरोप है यहां रहने वाले किशोर, युवक और बुजुर्गों सहित कई सौ लोगों को ट्रकों में भरकर पुलिस लाइन ले जाया गया था। एक ट्रक को दिन छिपते ही पीएसी के जवान दिल्ली रोड पर मुरादनगर गंग नहर पर ले गए थे। उस ट्रक में करीब 50 लोग थे। वहां ट्रक से उतारकर लोगों को गोली मारने के बाद एक एक करके गंग नहर में फेंका गया। कुछ लोगों को ट्रक में ही गोलियां बरसाकर ट्रक को गाजियाबाद हिंडन नदी पर ले गए। उन्हें हिंडन नदी में फेंका गया था। इनमें से जुल्फिकार, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान, मोहम्मद उस्मान और नईम गोली लगने के बावजूद सकुशल बच गए थे। बाबूदीन ने ही गाजियाबाद के लिंक रोड थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसके बाद हाशिमपुरा कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बना।
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कांड के बाद 27 साल दस महीने का समय, हर तारीख पर अगली तारीख मिलने का दर्द। अब जाकर पूरा हुआ इंतजार। अमर उजाला टीम ने फैसले के बाद हाशिमपुरा मोहल्ले में पहुंचकर उन लोगों से बातचीत की, जो घटना के पीड़ित हैं और गवाह हैं। लोगों को इस फैसले से निराशा हुई है। लोगों का कहना है कि फैसले के खिलाफ वे अपील करेंगे। इस मामले में गवाह जुल्फिकार का कहना है कि पुलिस के साथ ही प्रदेश सरकार ने भी परेशान किया। कार्रवाई के नाम पर पक्षपात हुआ। मैं खुद इसमें गवाह हूं। पुलिस और सरकार ने हमेशा से इस केस को कमजोर करने की कोशिश की, मगर हमने हिम्मत नहीं हारी और केस लड़ते रहे।

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गवाह जुल्फिकार की जुबानी

hashimpura massacre case.

एक ट्रक को रात करीब साढ़े नौ बजे हमलावर मुरादनगर गंग नहर पर ले गए। मैं उसी ट्रक में था। सबसे पहले ट्रक से उतारकर मोहम्मद यासीन (आरटीओ दफ्तर में कार्यरत चपरासी) को गोली मारी गईं। एक एक करके सबको गोली मारकर नहर में डाल दिया। मेरी दाहिनी बगल में गोली लगी थी, जिस कारण मैं जिंदा रहा और झाड़ियां पकड़कर छिपा रहा। मेरे अलावा मोहम्मद नईम, बाबूद्दीन, मुजीबुर्रहमान और उस्मान भी उसमें बच गए थे, जबकि 42 लोग मारे गए थे। हमलावरों के जाने के बाद मैं मुरादनगर और फिर वहां से गाजियाबाद के तत्कालीन डीएम नसीम जैदी के पास पहुंचा। फिर सांसद शाहबुद्दीन और सुब्रहमण्यम स्वामी से मुलाकात होने के बाद प्रेस वार्ता करके पुलिस की बर्बरता को उजागर किया था।

अशफाक  का कहना है कि मुझे पुलिस वाले पकड़ कर सिविल लाइन थाने ले गए थे। वहां से अन्य लोगों के साथ अब्दुल्लापुर जेल और फिर फतेहगढ़ जेल ट्रांसफर कर दिया गया था। आज भी वह लम्हा याद कर आंख भर आती हैं, जब पुलिस और मिलिट्री वालों ने बेकसूरों को घर से पकड़ा और यातना दीं।

हाजी जहीरुद्दीन ने दावा किया कि मुझे पुलिस वाले पकड़ कर सिविल लाइन थाने ले गए थे। लोहे की रॉड मारकर मेरी टांग और एक बाजू तोड़ दी थी। इसके बाद भी जेल में डाल दिया था। ऐसा कृत्य करने वाले पुलिसकर्मियों को पहले ही सजा मिल जानी चाहिए थी।

आरोपियों को मिलनी चाहिए थी सख्त सजा

hashimpura massacre case.

मृतक सिराज की बहन नसीम बानो और अमीर फातमा का कहना है कि उस घटना ने हमारा घर बर्बाद कर दिया। मैं और मेरी बहनें किस हालात में जिए, कितने सितम उठाए हैं वह किसी को बता नहीं सकते। सिराज हमारा इकलौता भाई था। उसकी हत्या करने वालों को सख्त सजा मिलनी चाहिए थी। मृतक कमरुद्दीन के पिता जमालुद्दीन का कहना है कि इंसाफ पाने के  लिए इतनी लंबी लड़ाई कहीं नहीं देखी, न सुनी। इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी इंसाफ नहीं मिला।

मृतक नईम के भाई शकील का कहना है कि सच्चाई कड़वी होती है, जो सरकार और पुलिस वालों ने दबाकर रखी। न्यायालय के चक्कर लगाते लगाते इतने साल बीत गए। इतने इंतजार के बाद ये फैसला आना दुर्भाग्यपूर्ण है। मृतक कमरुद्दीन के भाई शमशुद्दीन का कहना है कि अब इस फैसले का क्या करना हमें तो आज भी वो दिन याद है। तब से लेकर आज तक हम लोगों ने कितनी परेशानियां झेली, बस हम ही जानते हैं। जहीर अहमद की पत्नी और जावेद की मां जरीना फैसले पर नाराजगी जताती हुई कहती हैं कि ऐसा लगता है वो घटना बस आज की है, एक एक दिन गिन कर काटे हैं। मेरे शौहर और बेटे को पुलिस वालों ने मारा था। तब मेरी गोद में चार दिन का बेटा था। आरोपियों को सजा मिलनी चाहिए थी।

मृतक मोहम्मद यासीन के बेटे इजहार का कहना है कि मेरे वालिद मोहम्मद यासीन तब करीब 55 साल के थे। उनकी हत्या करने वाले पीएसी के जवानों को कतई दर्द नहीं हुआ। आरोपियों को फांसी की सजा होनी चाहिए थी।

सदमे में चल बसे पिता, मां हो गई विक्षिप्त

hashimpura massacre case.

हाशिमपुरा कांड में किसी परिवार से सगे भाईयों, किसी से पिता पुत्र और किसी की इकलौती औलाद की जान गई। हाशिमपुरा के लोग आरोप लगाते हुए कहते हैं कि शब्बीर का इकलौता बेटा सिराज भी पीएसी के जवानों ने मार दिया था। सिराज की बहन नसीम बानो और अमीर फातमा ने बताया कि सिराज की मौत के सदमे में कुछ साल बाद पिता शब्बीर का इंतकाल हो गया, तो सिराज की मां रश्के जहां मानसिक संतुलन खो बैठी थी। काफी उपचार कराने के बाद भी वह ठीक नहीं हुई और वह भी चल बसीं।

इसके बाद परिवार मुसीबतों से घिरा रहा। कोई कमाने वाला नहीं बचा। वह चार बहनें थीं, जिसके चलते सिलाई कढ़ाई का काम करके गुजर बसर की गई। भाई की मौत के बाद बाप और मां का इंतकाल होने पर नसीम बानो को उसके पति ने तलाक दे दिया।

इसके अलावा जमील और उसके बेटे नसीम, जहीर व उसके बेटे जावेद तथा सगे भाई नौशाद और शमशाद की मौत का दर्द हाशिमपुरा कांड के पीड़ितों को हर दिन कराहने पर मजबूर करता है।

दो गोली लगने पर भी बाबूदीन ने नहीं मानी हार

hashimpura massacre case.

हाशिमपुरा कांड की रिपोर्ट दर्ज कराने वाले बाबूदीन मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिले के गांव धमसाहन के रहने वाले हैं। यहां हाशिमपुरा में पावरलूम फैक्ट्री में कारीगर हैं। उनका आरोप है कि मुरादनगर गंग नहर पर हमलावरों ने जब ट्रक में ही गोलियां बरसाई, तो एक गोली उसकी बाईं तरफ बगल में लगी। बाद में हिंडन नदी पर ट्रक में पड़े लोगों को उतारा गया। ट्रक से खींचकर उसे जमीन पर गिराया गया तथा एक और गोली मारी, जो दाहिनी बगल से पार हो गई थी। इसके बाद उसे और अन्य लोगों को हिंडन नदी में फेंक दिया गया था, लेकिन मैं झाड़ी पकड़ कर नदी किनारे आ गया था।

गोलियों की आवाज सुनकर आई थी स्थानीय पुलिस
बाबूदीन के मुताबिक पीएसी के जवान जब लाशों को हिंडन नदी में फेंक कर चले गए, तो कुछ देर बाद लिंक रोड थाने के पुलिसकर्मी गश्त करते आए। नदी किनारे खड़े होकर कहने लगे कि गोलियों की आवाज तो यहीं से आई थी, पर यहां कोई नजर नहीं आ रहा। बाबूदीन ने बताया कि पुलिसकर्मियों को देख कर वह घबरा गया और काफी दूर तक तैरता हुआ आगे बढ़ने लगा। इस पर पुलिस वालों ने कहा कि कौन है बाहर आओ, नहीं तो गोली मार देंगे। बाबूदीन ने बताया कि जब उसे ये भरोसा हो गया कि ये पुलिस वाले दूसरे हैं, तब वह नदी से बाहर निकला और पूरी बात बताई। उन पुलिसकर्मियों ने वायरलेस से अधिकारियों को सूचना दी और उसे मोहननगर स्थित नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाकर भर्ती करा दिया था।

दो महीने में ही विधवा हो गई थी दो महिलाएं

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हाशिमपरा कांड में मारे गए नईम और कमरुद्दीन की शादी दो महीना पूर्व ही हुई थी। जब दोनों की मौत हो गई, तो उनकी पत्नी अपने मायके चली गई। परिजनों ने उनका दूसरा निकाह करा दिया। आज भी इन परिवारों को कमरुद्दीन और नईम की मौत का सदमा है। लोग कहते हैं कि पुलिस ने जो बर्बरता की, उसका दर्द भूलता नहीं है। वहीं, जरीना के पति जहीर अहमद (45) और बेटे जावेद (18) को भी मार दिया गया था। जरीना आज भी सदमे में रहती है।

2002 में ट्रांसफर हुआ था केस
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवारों की याचिका पर सुनवाई के बाद मामला सितंबर 2002 में दिल्ली ट्रांसफर कर दिया था। जिला अदालत ने जुलाई 2006 में इस मामले में हत्या, हत्या का प्रयास, साक्ष्यों से छेड़छाड़ व आपराधिक साजिश की धाराओं में आरोप तय किए थे। मामले में 264 गवाह थे।

19 मई को मेरठ आए थे चिदंबरम
बता दें कि जब मेरठ में दंगे का दौर 14  अप्रैल को गुलमर्ग से शुरू हुआ था। इसके बाद शहर में बवाल होता रहा, जिस कारण मई में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। 19 मई 1987 को तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री पी चिदंबरम, यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह, सांसद मोहसिना किदवई तथा प्रदेश के गृह मंत्री गोपीनाथ दीक्षित मेरठ पहुंचे थे। शहर के हालात का जायजा लेने के बाद उन्होंने शांति बनाने के संबंध में आला अफसरों को निर्देश दिया था। इसके तीन दिन बाद हाशिमपुरा कांड हो गया था।

चिंदबरम के खिलाफ डाली थी याचिका
जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन गृह राज्यमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जांच कराने के लिए तीस हजारी कोर्ट में याचिका डाली थी। अभियोजन पक्ष का तर्क दिया था कि इस मामले में तीन जांच अधिकारी थे। उनसे बहस नहीं हो सकी क्योंकि तीनों की मृत्यु हो चुकी है। विशेष लोक अभियोजक सतीश टमटा ने सुनवाई के दौरान कहा था कि ऐसे आरोपों का कोई आधार नहीं है और इंसाफ के लिए पीड़ितों का इंतजार और लंबा हो जाएगा। इसके चलते सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका खारिज कर दी गई थी।

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