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बाबरी पर राजनीति से परेशान हाशिम ने मुकदमे से की तौबा

Wed, 03 Dec 2014 03:55 PM IST
Updated Wed, 03 Dec 2014 03:55 PM IST
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Hashim Ansari Wants ramlala Should be freed - Babri Masjid Case
बाबरी मुकदमे में पक्षकार रहे हाशिम अंसारी ने अब इस केस को और लड़ने से मना कर दिया है। हाशिम अंसारी ने कहा कि अब वे चाहते हैं कि रामलला आजाद हों।
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इसके साथ ही वह 6 दिसंबर को होने वाले मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित किए जा रहे शोक दिवस (यौमे गम) में भी शामिल नहीं होंगे। इस मामले से हटते हुए हाशिम अंसारी ने कहा कि जहां एक तरफ वह मुकदमा लड़ रहे हैं, और दूसरे लोग इसका सियासी फायदा उठा रहे हैं।

क्या है मामला
इस केस में अयोध्या के फैजाबाद जिले में स्थित एक जमीन को लेकर विवाद है, जिस पर बाबरी मस्जिद बनी थी। हिन्दुओं की मान्यता है कि वह जमीन भगवान राम की जन्मभूमि है। इसका निर्माण 1527 में भारत के पहले मुगल शासक बाबर के आदेश पर किया गया था। यह मस्जिद 1992 में गिरा दी गई थी, जब 1.5 लाख लोगों की एक रैली ने दंगे का रूप ले लिया था। इस रैली के संयोजकों ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने वादा किया था कि इनकी वजह से मस्जिद को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होगा। इस दंगे के बाद मुंबई और दिल्ली सहित पूरे देश में दंगे हुए थे।
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लंबे समय से विवाद की पैरवी कर रहे हैं अंसारी

Hashim Ansari Wants ramlala Should be freed - Babri Masjid Case

कौन हैं मोहम्मद हाशिम अंसारी
मोहम्मद हाशिम अंसारी बाबरी मस्जिद केस के सबसे पुराने मुद्दई हैं। 93 साल के हाशिम अंसारी 1949 से ही बाबरी केस की पैरवी कर रहे हैं। अंसारी बहुत ही साधारण तरीके से जीवन बितने वाले व्यक्ति हैं।

इनका परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में ही रह रहा है। हाशिम अंसारी का जन्म 1921 में हुआ था। 1932 में इनके पिता की मृत्यु हो गई, उस समय इनकी उम्र केवल 11 साल थी।

इनकी शादी वहीं पड़ोस के फैजाबाद में हुई। इनके एक बेटा और एक बेटी है। आपको बता दें कि 6 दिसंबर, 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, लेकि‍न अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया।

अहम था साल 2010 का फैसला

Hashim Ansari Wants ramlala Should be freed - Babri Masjid Case
इसके जमीनी हक की लड़ाई को लेकर 2010 में इलाहाबाद कोर्ट ने एक फैसला भी सुनाया था। बाबरी मस्जिद केस में जमीनी हक की लड़ाई में 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था। अपने फैसले में इलाहाबाद कोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने अयोध्या की इस 2.77 एकड़ को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला किया था।

कोर्ट के अनुसार इसका एक तिहाई हिस्सा रामलला के हिस्से में जाना था, जिस पर राम मन्दिर की स्थापना की जानी थी। इसके अलावा एक तिहाई हिस्से को सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाना तय हुआ। बचे हुए एक तिहाई हिस्से को निर्मोही अखाड़े को दिए जाने का निर्णय दिया गया।
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