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हरियाणा: मगर भाजपा की राह आसान नहीं

Tue, 14 Oct 2014 07:33 PM IST
Updated Tue, 14 Oct 2014 07:33 PM IST
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Haryana assembly election bjp analysis.

भारतीय जनता पार्टी यहां केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है। राज्य भाजपा इकाई में राजस्थान में वसुंधरा या छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की तरह यहां कोई बड़ा जनाधार वाला नेता नहीं है। भाजपा के चार नेता मुख्यमंत्री की दौड़ में बताए जाते हैं। लेकिन कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़, मनोहर लाल, रामविलास इसके लिए अपनी-अपनी सीटों पर ही जूझ रहे हैं। इन नेताओं का पिछला चुनावी रिकॉर्ड भी बहुत आशान्वित नहीं करता है। कैप्टन अभिमन्यु- नौंद से, ओमप्रकाश धनखड़- बादली, मनोहर लाल- करनाल और रामविलास- महेंद्र गढ़ से अपना भाग्य आजमा रहे हैं। इनमें कैप्टन अभिमन्यु और रामविलास को जीत की तलाश रही है। जबकि मनोहर लाल अपना पहला चुनाव लड़ रहे हैं। ये नेता दूसरे क्षेत्रों में प्रचार में कम ध्यान दे पाए हैं। भाजपा को यही उम्मीद है कि मोदी की ताबड़तोड़ सभाएं उनके लिए क्या गुल खिलाती है।

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बीजेपी की ज्यादा पहुंच शहरी इलाकों तक

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2- भाजपा शहरी इलाकों तक तो पहुंची है लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी उतनी पैठ नहीं बना पा रही है। खासकर सिरसा हिसार के ग्रामीण इलाकों में इनेलो का प्रभाव बना हुआ है। ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में पार्टी ने अपने ढांचे को बदलने की कोशिश की है। बेशक नरेंद्र मोदी ओमप्रकाश चौटाला के जेल में होने पर टिप्पणी कर इनेलो को धराशाई करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अभी कहा नहीं जा सकता कि इसका सीधा असर पड़ेगा या नहीं। जिस तरह इनेलो की सभाओं में लोग आए हैं, उससे नहीं लगता कि भाजपा के हाथ कोई कारगर मुद्दा लगा है।

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सियासी समीकरण साधने की कवायद

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3- भाजपा के मंचों से किसानों के हितों को लेकर बातें तो हुई हैं लेकिन धान और कपास के भाव तय नहीं होने पर अभी असमंजस की स्थिति बनी है। लोकसभा चुनाव में किसानों ने भाजपा का पुरजोर समर्थन किया था, इस बार थोड़ा स्थिति डगमगा रही है। हालांकि कांग्रेस और इनेलो जैसी पार्टियां भी किसानों के लिए बहुत कुछ नहीं कर पाई है और इन पार्टियों के नेता भी परिवारवाद तक सिमट गए। लेकिन फिर भी इनके जरिए किसानों को समझाने बुझाने की कोशिश हुई है। कांग्रेस के लिए आशा जैसी कोई बात नहीं, लेकिन ओमप्रकाश चौटाला ने किसानों को प्रभावित करने की कोशिश की है। वो किसानों को अपने ढंग से याद दिला रहे हैं कि केंद्र और राज्य सरकार ने उनके वायदे पूरे नहीं किए। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में जोर देकर कहते रहे कि भाजपा के सत्ता में आने पर यहां के हालात बदल जाएंगे। लाल बहादुर शास्त्री के 'जय जवान जय किसान' के नारे को उन्होंने काफी शिद्दत के साथ हरियाणा की जनसभाओं में याद किया।

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असली लड़ाई चौटाला के साथ

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4- भाजपा ने महसूस किया कि असली लड़ाई ओमप्रकाश चोटाला के साथ है। इसलिए नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में इनेलो प्रमुख को घेरते हुए दिखे। परिवारवाद के खतरे से भी लोगों को आगाह किया। उन्होंने व्यंग्य की शैली में कहा कि क्या इनकी सरकार जेल से चलेगी। भाजपा महाराष्ट्र में अपने पुराने सहयोगी के लिए आदर भाव दिखाया लेकिन यहां एक समय के सहयोगी या संभावित सहयोगी के प्रति किसी तरह की नरमी नहीं बरती। भाजपा की पहली कोशिश अपने ही दम पर किला जीतने की है। इसलिए इनोलो के जाटलैंड वाले गढ़ों में जमकर हमला बोला गया। हरियाणा के विकास में कांग्रेस के साथ इनेलो को भी जिम्मेदार बताया गया।

डेरा सच्चा सौदा भाजपा के साथ

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5- भाजपा के लिए नैतिक दिक्कत यह भी हुई कि अकाली दल यहां इनेलो के साथ खड़ी दिख रही है। बेशक इसका सांकेतिक असर ही है। लेकिन बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा में जिस तरह सहयोगी पार्टियों से भाजपा का नाता टूटा है और प्रकाश सिंह बादल इनेलो के पक्ष में हरियाणा में आए हैं उससे पार्टी का थोड़ा असमंजस की स्थिति से गुजरना स्वाभाविक है।

6- बेशक डेरा सच्चा सौदा का भाजपा के पक्ष में बयान आया है। लेकिन डेरा सच्चा सौदा पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफदारी करता हुआ दिखा था। वोट अकाली दल ले गया। सामाजिक धार्मिक संगठन अपने कितने भी बड़े आधार पर खड़े हों, लेकिन मतदाता पोलिंग बूथ में अपने मन की कर आता है।

ग्रामीण मतदाताओं का अहम रोल

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7- इनेलो ने पलवल, मेवात, जींद, सिरसा, हिसार, कैथल, भिवानी आदि के ग्रामीण इलाकों में लोगों से जनसंपर्क का अभियान छेड़ा हुआ था। उसकी उम्मीद इन क्षेत्रों में हैं। कई जगह पर इनेलो का विश्वास इस कदर है कि वह क्लीन स्वीप करने की बात कह रही है। वहीं भाजपा अंबाला, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, फरीदाबाद के मजबूत इलाकों पर जोर देती रही। भाजपा के राज्य इकाई के नेता हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी जनसंपर्क नहीं कर पाए। अब भाजपा की पूरी उम्मीद इसी बात पर टिकती है कि हरियाणा का ग्रामीण मतदाता मोदी की बात को किस तरह अहमियत देता है। साथ ही जातीय और स्थानीय आधार भी उसकी जीत का कारण हो सकते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों में ओर गौर करना था।

हजकां फैक्टर का रोल भी खास

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8- भाजपा ने ऐन चुनाव से पहले हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) को भी नाराज कर दिया। भाजपा का आंकलन है कि लोकसभा में उसने इस पार्टी से समझौता करने के चलते सिरसा और हिसार की सीट गंवाई। वरना इनेलो को तभी मात दी जा सकती थी। लिहाजा चुनाव परिणाम आते ही भाजपा ने इस पार्टी से एकदम नाता तोड़ दिया। यहां तक कि मोदी की एक सभा में कुलदीप बिश्नोई मंच में नहीं दिखे। उन्हें भी जल्दी इशारा समझ में आ गया। हालांकि इस बार यह पार्टी आदमपुर और हंसी जैसी कुछ सीटों पर भी उपस्थिति दर्ज कराती हुई दिख रही है। लेकिन दोनों का संयुक्त होना कई जगहों पर इनेलो की समस्या बढ़ा सकता था।

कांग्रेस का क्या होगा?

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9- भाजपा ने लुभावनी बातें जरूर कही है, लेकिन हरियाणा की राजनीति ठेठ अंदाज में चलती है। कहा नहीं जा सकता कि मतदाता क्या रुख करते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि इनेलो ने इस लड़ाई को एकतरफा नहीं रहने दिया। वरना कांग्रेस तो इस समय पूरी तरह पस्त दिखती है। कांग्रेस के दिल्ली के बड़े नेताओं ने यहां रैली प्रचार का कोई बड़ा रुझान नहीं दिखाया। जितनी कोशिश कर रहे हैं मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ही कर रहे हैं। उन्हें हरियाणा में बची हुई कांग्रेस को बचाना है। वो अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं। उनके पास अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए ज्यादा बातें नहीं दिखती। बस यही दोहरा पा रहे हैं कि हरियाणा का बहुत विकास हुआ है।

10- पूर्ण बहुमत नहीं आने पर जोड़ तोड़ का सहारा लेना ही होगा। ऐसी स्थिति में निर्दलियों की पौ बारह रहेगी। गोपाल कांडा भी इसी इरादे से चुनाव में हैं कि किसी को बहुमत नहीं मिला तो उनकी सीट की बड़ी अहमियत होगी। तब लाल बत्ती तो मामूली चीज होगी। आया राम गया राम शायद इस बार इतना हिट न हो जितना कि अपने दम पर चुनाव जीते निर्दलीय।

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