नेहरू की जान बचाने पर मिला पहला वीरता पुरस्कार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
“ये बच्चे जिन्हें रातों-रात चमकता हुआ सितारा बना दिया जाता है, धूल-बिसरित हो जाते हैं। कोई इन्हें पूछने वाला है?” ये सवाल है 70 साल के हरीश चंद्र मेहरा का उन बच्चों के बारे में, जिन्हें हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर बहादुरी के लिए वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।
साल 1957 में हरीश चंद्र मेहरा के भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जान बचाने के साहसी कारनामे ने नींव रखी बच्चों को दिए जाने वाले वीरता पुरस्कारों की। इस सवाल में न सिर्फ़ इन बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता थी बल्कि हरीश मेहरा की अपने अतीत और वर्तमान की निराशा भी छिपी थी क्योंकि 50 साल से ज़्यादा समय पहले वे भी ऐसे ही एक बच्चे थे।
जब नेहरू की जान बचाई
पुरानी दिल्ली के भीड़-भाड़ वाले चांदनी चौक की एक तंग गली कटरा नील में रहने वाले हरीश मेहरा आज रिटायर्ड ज़िंदगी बिता रहे हैं। वे रुक-रुक कर बात करते हैं और आवाज़ में उम्र झलकती है। लेकिन 56 साल पहले का वाक़या आज भी उन्हें ऐसे याद है जैसे कल की ही बात हो।
वे बताते हैं, “मैं 14 साल का लड़का था और स्काउट्स का ट्रूप लीडर था। मेरी ड्यूटी वीआईपी ब्लॉक में थी। दो अक्तूबर 1957 को भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू आमंत्रित थे। वे वहां विदेशी प्रतिनिधियों के साथ रामलीला देखने आए थे।”
मेहरा के मुताबिक़, “आतिशबाज़ी के कार्यक्रम के दौरान एक पटाखा उस शामियाने पर गिर पड़ा जिसके नीचे नेहरू जी और बाकी लोग थे। थोड़ी देर में ही वहां आग फैल गई, वहां भगदड़ मच गई। नेहरू जी के पास कोई रास्ता नहीं रहा। तब मैं वहां पहुंच कर नेहरू जी का हाथ पकड़ कर उन्हें रामलीला के स्टेज तक लेकर गया।”
नेहरू ने दिया हरीश को वीरता पुरस्कार
नेहरू जी को बचाने के बाद हरीश वापस लौटे और जलते हुए शामियाने को लकड़ी के डंडे से काटकर अलग किया। इस घटना में उन्हें चोट भी आई। लगभग एक महीने बाद बहादुरी के इस कारनामे के लिए बालक हरीश को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हाथों से तीन मूर्ति भवन में पुरस्कार मिला और इंदिरा गांधी ने अगले साल से बच्चों के लिए वीरता पुरस्कार के गठन की घोषणा की।
वो लम्हा याद करते हुए हरीश मेहरा की आवाज़ में आज भी गर्व छलकता है, “प्रधानमंत्री, वो भी पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसी हस्ती के हाथों से जिसको सम्मान मिला हो, उस समय का अंदाज़ा स्वयं ही लगा सकते हैं। पिताजी, परिवार को बधाइयां और मुझे शाबाशी देने वालों का तांता लगा हुआ था। प्रेस वाले आते थे, मुझ पर डॉक्युमेंट्री बनी। जिस तरह का माहौल एकदम बदला, रातोंरात, ऐसा लगा कि एक रात में आसमान में चमकता हुआ सितारा बन गया था।”
पहचान की तलाश
लेकिन बधाइयों और सफलता का वो लम्हा बस वहीं पर रुक गया। मध्यमवर्गीय परिवार के इकलौते बेटे ने परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए सरकारी नौकरी कर ली। लोअर डिविज़न क्लर्क से शुरुआत की और सुपरवाइज़री ऑफ़िसर के पद से रिटायर हो गए।
इन सालों में बचपन के बहादुरी के उस किस्से के लिए राज्य स्तर पर कुछ छोटी-मोटी पहचान मिली। कई अधिकारियों, मंत्रियों, यहां तक कि कई प्रधानमंत्रियों से भी मदद के आश्वासन मिले लेकिन जिस पहचान की तलाश हरीश मेहरा को थी, वो नहीं मिली।
वे बताते हैं, “पहचान? कभी-कभी तो ये प्रतिष्ठा मुझे उलाहना सी महसूस होती है। दो दिन पहले एक पत्रकार यहां आई थीं। उनके आने से पहले मैं अपना पुराना सामान, प्रशस्ति पत्र वगरैह खोल रहा था। मेरी छह साल की पोती ने जब पूछा कि दादू आप क्या कर रहे हो, तो यकायक मेरे मुंह से निकला कि बेटा, बरसी मना रहा हूं।”
हरीश का दर्द
इस घटना को बताते हुए हरीश मेहरा की आंसूओं से भरी आवाज़ से उनके दर्द का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था। इन शब्दों में उनकी निराशा, हताशा, अवसाद और कुंठा साफ़ झलक रहे थे।
उनका परिवार भी उनके दर्द में उनका साक्षी है और उन्होंने भी इसे महसूस किया है। हरीश मेहरा की पत्नी रेणू मेहरा कहती हैं- “हर साल 26 जनवरी को मेरे दिमाग़ पर इतना बोझा हो जाता है। फोन आते हैं कि हम इंटरव्यू लेने आ रहे हैं। उन लोगों के लिए रिकॉर्ड निकालो और फिर दिखाओ। लेकिन होता कुछ नहीं है। अब तो ये हाल हो गया है कि वो (प्रशासन) कार्यक्रम में बुलाने के लिए कार्ड तक नहीं भेजते। इससे इनको टेंशन हो जाती है, नींद उड़ जाती है जिससे परिवार का वातावरण भी ख़राब हो जाता है।”
अपने पति की बहादुरी पर रेणू मेहरा को गर्व है लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ किए जाने पर उन्हें दुख और निराशा भी है। वे कहती हैं, “इस पुरस्कार समारोह में इन्हें बुलाना चाहिए। हम कोई जायदाद या पैसा नहीं मांग रहे। सिर्फ़ इन्हें इनका हक़ मिलना चाहिए।”
बच्चों को पुरस्कार देकर भूल जाती है सरकार
हरीश मेहरा की पहचान की मांग सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं बल्कि पुरस्कार विजेता बच्चों के लिए है।
वे कहते हैं, “ये बच्चे जिन्हें रातों-रात चमकता हुआ सितारा बना दिया जाता है, धूल-बिसरित हो जाते हैं। कोई इन्हें पूछने वाला है? जो हम कर रहे हैं, वो काफ़ी नहीं है। इन वीरता पदक विजेताओं की पढ़ाई-लिखाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए। जिस उम्मीद से सरकार इन्हें सम्मान देती है कि ये सितारे की तरह आसमान में चमकें, इनका भविष्य बने, इस तरह की कार्रवाई होनी चाहिए।”
पिछले 56 सालों में हालात बदले हैं। सरकार इन बहादुर बच्चों को स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक सुविधाएं दे रही है। लेकिन हरीश मेहरा की मानें तो इनके लिए अब भी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है।