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सियाचिन: नहाने-दाढ़ी बनाने तक में जवानों को खतरा

Wed, 10 Feb 2016 06:00 AM IST
Updated Wed, 10 Feb 2016 06:00 AM IST
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hardship life of Soldier in siachen

जमीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊंचे कि सिर्फ पक्के दोस्त और कट्टर दुश्मन ही वहां तक पहुंच सकते हैं। ये है सियाचिन, दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र। अगर नाम के मतलब पर जाएं तो सिया मतलब गुलाब और चिन मतलब जगह यानी गुलाबों की घाटी।

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मगर भारत-पाकिस्तान के सैनिकों के लिए इस गुलाब के कांटे काफी चुभने वाले साबित हुए हैं। वहां जाना भारतीय सेना के साथ ही संभव है और मुझे ये मौका मिला था कुछ साल पहले।
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सियाचिन में ठंड में तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुंच जाता है। बेस कैंप से भारत की जो चौकी सबसे दूर है उसका नाम इंद्रा कॉल है और सैनिकों को वहां तक पैदल जाने में लगभग 20 से 22 दिन का समय लग जाता है। चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी कमर में बंधी होती है।
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कमर में रस्सी इसलिए बांधी जाती है क्योंकि बर्फ कहां धंस जाए इसका पता नहीं रहता और अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें।

ऑक्सीजन की कमी होने की वजह से उन्हें धीमे-धीमे चलना पड़ता है और रास्ता कई हिस्सों में बंटा होता है। साथ ही ये भी तय होता है कि एक निश्चित स्थान पर उन्हें किस समय तक पहुंच जाना है और फिर वहा कुछ समय रुककर आगे बढ़ जाना है। हजारों फ़ुट ऊंचे पहाड़ या हजारों फुट गहरी खाइयां, न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी।

आंखों की रोशनी जाने का रहता है खतरा

hardship life of Soldier in siachen

इतनी बर्फ कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ पर पड़ने के बाद आंखों में जाए तो आंखों की रोशनी जाने का खतरा और अगर तेज चलती हवाओं के बीच रात में बाहर हों तो चेहरे पर हजारों सुइयों की तरह चुभते, हवा में मिलकर उड़ रहे बर्फ के अंश।

इन हालात में सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे "स्नो कोट" कहते हैं। इस तरह उन मुश्किल हालात में कपड़ों का भी भार सैनिकों को उठाना पड़ना है।

वहां टेंट को गर्म रखने के लिए एक खास तरह की अंगीठी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में बुखारी कहते हैं। इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं। इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है।

सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर खतरा सोते समय भी मंडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से कभी-कभी सैनिकों की सोते समय ही जान चली जाती है।

इस स्थिति से बचाने के लिए वहां खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं। वैसे उस ऊँचाई पर ठीक से नींद भी नहीं आती।

नहाना और दाढ़ी बनाने से किया जाता है मना

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वहां नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहां त्वचा इतनी नाजुक हो जाती है कि उसके कटने का खतरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफी समय लगता है।

वहां लगभग तीन महीने सैनिक तैनात रहते हैं और उस दौरान वो बहुत ही सीमित दायरे में घूम फिर सकते हैं। संघर्ष विराम होने के कारण सैनिकों के पास वहाँ ज्यादा काम भी नहीं रहता और उन्हें बस समय गुजारना होता है।

इसलिए जब हर तरफ सिर्फ बर्फ ही बर्फ या खाइयां हों तो ऊबना भी स्वाभाविक हो जाता है। सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहां वायु सेना।

सिर्फ 'चीता' पहुंचता है यहां

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उन चौकियों पर जो हेलिकॉप्टर उतरता है उसे चीता का नाम दिया गया है। सेना का कहना है कि उन्हें जिन ऊंचाइयों पर रहना होता है वहां सिर्फ वही हेलिकॉप्टर काम कर सकता है। सबसे ऊंचाई तक जाने और सबसे ऊंचाई पर बने हेलिपैड पर लैंड करने वाले हेलिकॉप्टर का रिकॉर्ड इसी के नाम है।

संघर्ष विराम से पहले सीमा के नजदीक बनी चौकियों तक हेलिकॉप्टर ले जाने में काफी सावधानी बरतनी होती थी। चीता हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है। संघर्ष विराम से पहले ये इसलिए किया जाता था जिससे विरोधी पक्ष जब तक निशाना साधेगा तब तक हेलिकॉप्टर उड़ जाएगा।

सियाचिन के लिए सैनिकों को किया जाता है तैयार

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मगर अब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिससे सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहे। सैनिकों को दूसरी जगहों से लाकर जब सियाचिन पर तैनात किया जाता है तो उससे पहले उन्हें इतने ठंडे मौसम के अनुरूप खुद को ढालने के लिए तैयार किया जाता है।

सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ एक सैनिक ही न होकर इन परिस्थितियों में एक पर्वतारोही की तरह काम करें। मनोरंजन का भी वहां कोई साधन नहीं है। यानी पहाड़ों के बीच पहाड़ सी मुश्किलों के साथ चल रहा है सैनिकों का जीवन।

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