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फर्जी दवाओं का प्रचार करने वालों पर कानून का शिकंजा

Mon, 02 Feb 2015 09:16 AM IST
प्रियंवदा सहाय/अमर उजाला, नई दिल्ली
प्रियंवदा सहाय/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 02 Feb 2015 09:16 AM IST
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hard punishment for misleading ad of fake medicines.

दवाओं के गलत और भ्रामक प्रचार से जनता को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा करने वाली कंपनियों के खिलाफ भारी-भरकम जुर्माने के साथ जेल की सख्त सजा के प्रावधान तय किए जा सकते हैं। ऐसी दवाओं का प्रचार करने वाली नामी-गिरामी हस्तियों को भी कड़ा दंड भुगतना पड़ सकता है।

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स्वास्थ्य मंत्रालय ने संबंधित कानून की समीक्षा कर इसे सख्त बनाने के लिए एक समिति गठित कर दी है। इस कानून की समीक्षा के लिए गठित समिति ड्रग एंड मैजिक रेमिडिज (ऑब्जेक्शनल एडवर्टिजमेंट)  एक्ट 1954 की समीक्षा कर रही है।
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समिति कानून में संशोधन कर ऐसे मामलों में दवा निर्माता कंपनी, डिस्ट्रीब्यूटर और प्रचारक के लिए भारी-भरकम जुर्माने के साथ जेल जाने तक का प्रावधान करना चाहती है ताकि लोगों को दवा खरीदते समय गुमराह होने से बचाया जाए। वह किसी झांसे या मीडिया में सेलिब्रेटी के प्रचार से प्रभावित होकर दवा खरीदने का निर्णय न लें।
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बदला जाएगा वर्तमान कानून

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स्वास्थ्य मंत्रालय के एक आला अधिकारी ने बताया कि ऐसी कोई भी दवा या उपचार जिसे वैज्ञानिक तरीके से जांच कर प्रमाणित नहीं किया गया है, उसे जादू-टोना माना जाएगा। ऐसी दवाओं से किसी राहत की उम्मीद रखना बेमानी है। उन्होंने कहा कि इस कानून की समीक्षा के लिए सरकार ने संसद में आश्वासन भी दिया था। महत्वपूर्ण यह है कि कानून में संशोधन के बाद मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां या प्रचार का हिस्सा बना मीडिया दवा के बारे में छोटे अक्षरों में चेतावनी या खंडन लिखकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकेगा।

अधिकारी ने कहा कि वर्तमान कानून में ऐसे प्रावधान नहीं हैं, जिससे कोर्ट तक मामलों को पहुंचाने के बाद सजा दिलाई जा सके। संशोधित कानून में मीडिया की भी जवाबदेही तय की जाएगी। मीडिया पर नकेल कसने के लिए समिति ऐसे तंत्र को पेश करने पर विचार कर रही है जिससे किसी दवा या उपचार के बारे में प्रचार करते समय वे अपनी ओर से इसकी प्रमाणिकता भी पेश कर सके। यानी विज्ञापन को पहले सरकार की किसी एजेंसी से स्वीकृति प्रमाण पत्र हासिल करना अनिवार्य बनाया जा सके।

नए कानून की जरूरत क्यों
दवा कंपनियों को क्लीनिकल ट्रायल के जरिए पहले दवा की विशेषताओं का पता लगाना और अपने दावे को प्रमाणित करना होता है। इसके बाद दवाओं को बाजार में उतारा जाता है। लेकिन कई कंपनियां भ्रामक और गलत प्रचार कर रही हैं।इनमें अधिकांश आयुर्वेदिक कंपनियां हैं। इसलिए पुराने कानून की समीक्षा कर नए कानून बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

जिम्मेदारी होगी तय

दवाओं के भ्रामक प्रचार के मामले में ज्यादातर आयुर्वेदिक कंपनियों का नाम सामने आने के कारण गठित कमेटी में स्वास्थ्य मंत्रालय के अलावा आयुष मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, वैज्ञानिक संगठन और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। संशोधित कानून में मीडिया की भी जवाबदेही तय की जाएगी।

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