फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   Hanumanthappa Takes challenges in his Life.

खतरों के खिलाड़ी हनुमंथप्पा, खुद ली कठिन पोस्टिंग

Thu, 11 Feb 2016 08:55 PM IST
Updated Thu, 11 Feb 2016 08:55 PM IST
विज्ञापन
Hanumanthappa Takes challenges in his Life.

सियाचिन ग्लेशियर पर हुए हादसे में अद्भुत जीवटता दिखाने वाले लांस नायक हनुमंथप्पा को चुनौतियों को चुनौती देने में मजा आता था। अपने 13 साल के कैरियर में से 10 वर्ष उन्होंने कठिन हालातों वाली जगहों पर बिताए थे, वह भी अपनी मर्जी से।

विज्ञापन


शांतिपूर्ण जगहों पर जाने की बजाय उन्होंने हिंसा प्रभावित इलाकों में तैनाती चुनी। उनके वरिष्ठ अधिकारी भी हनुमंथप्पा के इस साहस और रवैये के कायल भी रहे।
विज्ञापन


सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हनुमंथप्पा ने 25 अक्तूबर 2002 को मद्रास रेजिमेंट की 19वीं बटालियन ज्वाइन की थी। वह बहुत ही प्रेरित और शारीरिक रूप से फिट थे। उन्होंने शुरुआत से ही चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में जाना पसंद किया।
विज्ञापन
विज्ञापन

पिछले साल सियाचिन ग्लेशियर पर हुई थी तैनाती

Hanumanthappa Takes challenges in his Life.

2003 से 2006 तक वह जम्मू-कश्मीर के माहौर में तैनात थे। वहां उन्होंने आतंकियों के खिलाफ अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाई। इसके बाद उन्होंने 54 राष्ट्रीय राइफल्स (मद्रास) में जाना चुना। इसमें वह 2008 से 2010 तक रहे।

इस दौरान उन्होंने आतंकियों के विरुद्ध अद्भुत साहस और वीरता दिखाई। हनुमंथप्पा 2010 से 2012 के बीच पूर्वोत्तर में भी काम कर चुके थे।

वहां उन्होंने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड और यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम के खिलाफ अभियान में हिस्सा लिया था।

पिछले साल अगस्त से वह सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थे। दिसंबर में उन्होंने तय किया था कि वह दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में जाएंगे।

इस अधिकारी के मुताबिक हनुमंथप्पा हर परिस्थितियों में मुस्कुराने वाले शख्स थे। अपने साथियों और सहयोगियों के साथ उनके दोस्ताना संबंध थे।

लगातार कोमा में ही थे हनुमंथप्पा

Hanumanthappa Takes challenges in his Life.

शून्य से 45 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान में लगभग 144 घंटे तक जिंदा रहने वाले हनुमंथप्पा ने सभी को सुखद आश्चर्य में डाल दिया था।

लोग इसे चमत्कार मान रहे थे और इसका कारण यह था कि बर्फीले तूफान में 35 मिनट से अधिक समय तक दबने वालों में से केवल 27 प्रतिशत शख्स ही जीवित निकल पाए थे।

हालांकि हनुमंथप्पा की हालत बेहद गंभीर बनी हुई थी। वह कोमा में थे। लेकिन बृहस्पतिवार को दिन में करीब 11.45 बजे वह अपनी जिंदगी की जंग हार गए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed