हाजी पीर: अंधेरी रात, बारिश और गोलियों की बौछार
उनके पास खाने के लिए सीले हुए शकरपाले और बिस्कुट थे। तेज बारिश हो रही थी और मेजर रंजीत सिंह दयाल एक (1) पैरा के सैनिकों को लीड करते हुए हैदराबाद नाले की तरफ बढ़ रहे थे। उनका अंतिम लक्ष्य था हाजी पीर पास, जिसको पाकिस्तान और भारत दोनों एक अभेद्य लक्ष्य मानते थे। ये पास एक ऐसी जगह पर था जहां से इसका बहुत कम लोगों के साथ कहीं तगड़े प्रदिद्वंदी के खिलाफ बचाव किया जा सकता था।
हाजी पीर पास की ओर चढ़ाई, धीमी, रपटीली, गहरी और लंबी थी। सिर्फ रात के अंधेरे में ही वहां तक पहुंचने की बात सोची जा सकती थी। मेजर दयाल समय के खिलाफ भी लड़ रहे थे। बारिश के तेज थपेड़ों और घोर अंधेरे के बावजूद उन्हें सुबह तक चोटी तक पहुंचना था वर्ना दिन की रोशनी में चोटी पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों के लिए वो सिटिंग डक (आसानी से शिकार होने वाले सैनिक) साबित होते।
पहाड़ों पर लड़ाई हमेशा चोटियों पर होती है। हर किसी पास पर कब्जा कर भी लिया जाए लेकिन अगर चोटियों पर कब्जा नहीं हैं तो उसका कोई सामरिक महत्व नहीं होता है और उनका बचाव करना भी मुश्किल होता है। हाजी पीर का सामरिक महत्व ये था कि अगर इस दर्रे पर किसी का कब्जा हो तो श्रीनगर और पुंछ की दूरी मात्र 50-55 किलोमीटर रह जाती है।
झोपड़ी में 11 पाकिस्तानी सैनिक
अगर ऐसा न हो तो पुंछ से श्रीनगर जाने के लिए पहले जम्मू जाना पड़ती है, फिर वहाँ से श्रीनगर और वहाँ से ऊड़ी। ये रास्ता करीब 600-650 किलोमीटर का होता है। इस पर कब्जा करने के लिए उस पर दो तरफ से हमला करने की योजना बनाई गई। पश्चिमी तरफ से 1 पैरा को चोटियों पर कब्जा करने के आदेश मिले और पूर्व की ओर से पंजाब रेजिमेंट को हमला करने के लिए कहा गया।
मेजर दयाल का पहला लक्ष्य था संक के ढलानों पर कब्जा करना। इस अभियान में भाग लेने वाले ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं कि इस लक्ष्य को हासिल करने वाले पहले दो हमले असफल हो गए। तगड़ी लड़ाई के बाद अरविंदर सिंह की कंपनी संक पर कब्जा करने में सफल हो गई। उसके बाद उनका वहां काम खत्म था। हाजी पीर पर हमला किसी और कंपनी को बोलना था लेकिन मेजर दयाल ने अनुमति मांगी कि उनकी कंपनी को हाजी पीर पर हमला करने की इजाजत दी जाए।
उनके सामने 1500 फीट की लगभग सीधी चढ़ाई थी। अनुमति मिलने के बाद दयाल के सैनिकों ने ऊपर चढ़ना शुरू किया। ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं, "मौसम बहुत खराब था लेकिन फौज में कहा जाता है कि जितना खराब मौसम हो, आक्रमण करने वालों के लिए उतना ही अच्छा होता है, क्योंकि रक्षण करने वाले थोड़े सुस्त हो जाते हैं। उस इलाके में जमीन दलदली हो चुकी थी।
खाना पड़ा कच्चा मांस
इस पर कब्जा करने के लिए हमे तकरीबन 1500 फीट ऊपर चढ़ना था और चढ़ाई का कोण लगभग 55 से 60 डिग्री था।" अरविंदर सिंह आगे बताते हैं, "रास्ते में हमें एक झोपड़ी दिखाई दी। उसमें से कुछ आवाज आ रही थी जब हमने उसका दरवाजा खटखटाया तो उसमें से 11 पाकिस्तानी सैनिक निकले। हमने उन्हें घेर लिया।" उस अभियान में शामिल लेफ्टिनेंट जिमी राव याद करते हैं, "हमने उन पाकिस्तानी सैनिकों को न सिर्फ बंदी बनाया बल्कि उन्हें अपना भारी सामान उठाने के लिए कुली की तरह इस्तेमाल किया।"
डीआर मनकेकर ने अपनी किताब 22 फेटफुल डेज में लिखा है, "दयाल और उनके सैनिक तड़के साढ़े चार बजे हाजी पीर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए थे। उन्होंने अपने सैनिकों को दो घंटे का विश्राम दिया। उन्होंने फिर ऊपर चढ़ना शुरू किया। जब वो सुबह 8 बजे चोटी पर पहुंचे, तब तक पाकिस्तानी सैनिक भारी गोला बारूद छोड़ कर वहां से भाग चुके थे। अपने पीछे वो इतना खाना छोड़ गए थे जिससे 1000 लोगों को एक महीने तक खाना खिलाया जा सकता था।"
मार्च के दौरान भारतीय सैनिकों को कोई रसद नहीं मिल रही थी। उन्होंने दो पहाड़ी बकरियाँ पकड़ी। संगीन से उन बकरियों को मारा गया और अफसरों ने अधपका मांस खाया। उसमें पाकिस्तानी सैनिकों से छीने गए नमक का इस्तेमाल किया गया। जवानों को तो वो नमक भी नसीब नहीं हुआ। हाजी पीर पर कब्जा करने के बाद दयाल ने मेजर अरविंदर सिंह को पाकिस्तानी सैनिकों के ठिकानों का जायजा लेने के लिए पास की पहाड़ी में भेजा।
नजारा देखकर पैरों तले जमीन खिसक गई
मेजर अरविंदर ने वहाँ जो देखा, उससे उनके पैरों की जमीन निकल गई। वहाँ पर बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक थे जो भारतीय सैनिकों पर जवाबी हमला करने की तैयारी कर रहे थे। अरविंदर ने उसी समय उन पर हमला बोलने का फैसला किया हालांकि उनके पास उस समय सिर्फ 65 सैनिक थे। अरविंदर कहते हैं, "हमारी पाकिस्तानियों से हाथों से लड़ाई हुई। मैंने खुद दो लोगों को संगीन से मारा। अगर में उन्हें नहीं मारता तो वो मुझे मार डालते।
इस हमले में 23 भारतीय सैनिक हताहत हुए लेकिन हमने हाजी पीर पर पूरा नियंत्रण कर लिया। उस समय बाकी बचे हुए सैनिकों में इतना भी दम नहीं था कि वो अपने पैरों पर खड़े हो पाते।" उस मंजर को याद करते हुए 50 साल बाद भी अरविंदर रोमांचित हो उठते हैं। वे कहते हैं, "मेरे ऊपर एक ग्रनेड फेंका गया और मैं नीचे गिर गया। मेरे पैर का एक हिस्सा उड़ गया। लेकिन ताज्जुब की बात थी कि मुझे बिल्कुल दर्द नहीं हो रहा थी जबकि मेरा घाव इतना गहरा था कि मुझे अपनी हड्डी तक दिखाई दे रही थी।"
इसके बाद के अनुभव का जिक्र करते हुए ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं, "दो घंटे बाद मेजर दयाल वहां पहुंचे। उन्होंने मुझे घायल अवस्था में गिरे हुए देखा। वो मुझसे बात ही कर रहे थे कि उनकी दाहिनी तरफ गोलियों का बर्स्ट आया। वो बाल बाल बच गए। बाद में कमांडिंग ऑफिसर होते हुए भी उन्होंने कई घायल सैनिकों को अपने कंधों पर उठा कर सुरक्षित जगह पर पहुंचाया।"
लड़ने के लिए सिर्फ पत्थर
इस अभियान में साहसपूर्ण शौर्य दिखाने के लिए मेजर रंजीत दयाल और ब्रिगेडियर जोरू बख्शी को महावीर चक्र दिया गया। लड़ने के लिए सिर्फ पत्थर सैन्य इतिहासकार फारूख बाजवा का कहना है कि पाकिस्तान के लिए हाजी पीर का बहुत महत्व था क्योंकि युद्ध की स्थिति में यहीं से घाटी में पहुंच चुकी पाकिस्तानी सेना को रसद भेजी जानी थी और इस रास्ते के जरिए ही पाकिस्तान की जिब्राल्टर फोर्स के लोग भारतीय कश्मीर में घुसे थे।
बाद में ब्रिटिश सैनिक रिव्यू ने भारतीय सैनिकों की यह कह कर आलोचना की कि उन्हें हाजी पीर जीतने में चार दिन लगे जबकि पाकिस्तानियों ने पूरी ताक़त से उनका मुक़ाबला नहीं किया था। ब्रिगेडियर जोरू बख्शी हाजी पीर पर भारतीय झंडा फहराने के बाद। फारूख बाजवा कहते हैं कि भारतीय सैनिकों को हाजी पीर जीतने में भले ही चार दिन लगे हों लेकिन ये पाकिस्तानी सेना के लिए एक बहुत बड़ा धक्का था। उसकी वजह से ही जिब्राल्टर बल भारतीय कश्मीर में ही फंसे रह गए और उन्हे वापस अपने देश जाने का रास्ता ही नहीं मिल पाया।
अल्ताफ गौहर ने अयूब पर लिखी अपनी किताब में लिखा है, "जैसे ही हाजी पीर पर भारतीय कब्जे की खबर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल मूसा के पास आई, वो भागते हुए विदेश मंत्री भुट्टो के घर पहुंचे और उन्हें नक्शा खोल कर दिखाया कि किस तरह जिब्राल्टर बल कश्मीर में फंस गया है। उन्होंने भुट्टो से कहा था, "माई व्वॉएज हैव नथिंग बट स्टोंस टू फाइट विद।"(मेरे लड़कों के पास लड़ने के लिए सिर्फ पत्थर बचे हैं)।