गुजरात का वाडिया: गंदे धंधे से उभरती औरतें
गुजरात में बनासकांठा ज़िले का वाडिया गाँव यौनकर्मियों के गाँव के तौर पर बदनाम है। यह गांव जबसे अस्तित्व में है, वहाँ दो तरह की औरतें रहती हैं। एक वे जिन्हें उनके ही परिवार के मर्दों ने फंसा लिया और दूसरी वे जो अब उम्रदराज़ हो चुकी हैं और कई बीमारियों की वजह से अपने ही घरों में क़ैद हैं।
ये बीमारियाँ इन औरतों को तब मिलीं जब वे सेक्स वर्कर की ज़िंदगी जी रही थीं और अब ये ताउम्र उनके साथ रहेंगी। लेकिन गुजरात का कोठा के नाम से जाने जाने वाले इस गाँव ने पिछले 60 बरस में विकास के नाम पर कुछ नहीं देखा है, हालांकि वहाँ भी बदलाव की बयार के झोंके महसूस किए जा सकते हैं।
वैसे तो ये बयार अभी थोड़ी मंद है लेकिन उम्मीद की एक किरण दिखाई देती है कि वाडिया की औरतों और लड़कियों के लिए सारी उम्र तवायफ़ रहने की बजाय ज़िंदगी के मायने शायद कुछ बदल जाएं। रानी, विक्रम और उनके तीन बच्चों की पहली तस्वीर फलते फूलते देह व्यापार के अड्डे के तौर पर मशहूर रहे गुजरात के वाडिया गाँव के एक आदर्श परिवार की झलक पेश करती है।
सेक्स वर्कर से शादी
रानी इस गाँव की पहली लड़की है जिसकी शादी हुई, उस वाडिया गाँव की जहाँ एक वक़्त ऐसा भी था जब यहाँ हर घर तक़रबीन एक कोठे में बदल चुका था और विक्रम एकमात्र ऐसा ख़रीदार है जिसने वाडिया के किसी सेक्स वर्कर से शादी की। रानी को अपनाने के लिए विक्रम ने दलाल को तीन लाख रुपए दिए ताकि वो उसे देह व्यापार से छुटकारा दिला सके।
विक्रम ने रानी को उस पेशे से छुटकारा दिलाया जो बीते कई दशकों से इस गाँव की लड़कियों कि क़िस्मत में पैदा होते ही लिख दिया जाता है। आज ये जोड़ा वाडिया में ही रहता है, साथ में चार पीढ़ियों की औरतें भी रहती हैं जो किसी ज़माने में यौनकर्मी थीं।
रानी वाडिया की उन सात महिलाओं में से हैं जिनकी शादी हो पाई लेकिन इस गाँव की 360 औरतों में से ज़्यादातर के बच्चे हैं लेकिन बच्चों के पिता का पता नहीं। इनमें से भी कई सारी लड़कियाँ हैं, एक 15 साल की लड़की जो कि दो या तीन बच्चों की माँ हो, का दिखाई पड़ना वाडिया में एक आम बात है।
बदलाव की बयार
ऐसा नहीं है कि वाडिया में कुछ बदल नहीं रहा है, यहाँ चीज़ें बदली हैं लेकिन लड़कियों के पैदा होते ही वे क़िस्मत की लिखी उस इबारत की जाल में फंस जाती हैं जो उन्हें देह की मंडी में बिकने के लिए खड़ा कर देता है। बदलाव की जो बयार यहां बह रही है, वो इतनी कमज़ोर है कि यहाँ की सभी औरतों को आज़ादी दिलाने के लिए नाकाफ़ी है।
गांव की औरतों के लिए सामाजिक कार्यकर्ता मित्तल पटेल और उनकी सहयोगी शारदाबेन भाटी उम्मीद की इकलौती किरण हैं। इन्होंने यहां की औरतों की आंखों में बेहतर ज़िंदगी के उनके सपने ज़िंदा रखा है। मित्तल पहले पत्रकारिता में थी और अब 'विचर्त समुदाय समर्पण मंच' नाम से एक ग़ैर सरकारी संगठन चलाती हैं।
वाडिया की औरतों की बेहतर ज़िंदगी के लिए वह साल 2005 से ही काम कर रही हैं। साल 2012 में उन्होंने वाडिया की कुछ औरतों के लिए सामूहिक शादी कार्यक्रम का आयोजन किया। यह पहली बार हुआ कि वाडिया की किसी लड़की की शादी हो पाई। शारदाबेन और उनके पति रमेश गहलोतर वाडिया में पटेलों के लिए काम करते हैं। इस बहादुर जोड़े ने तमाम मुश्किलों का सामना किया।
यहां बेटियां बिकती हैं
शारदाबेन बताती हैं, "देह व्यापार के धंधे में शामिल दलालों और कई ताक़तवर लोगों ने लगातार हमें जान की धमकी देते रहे। लेकिन मैंने वाडिया की औरतों को एक बेहतर ज़िंदगी देने की क़सम ली थी, वो ज़िंदगी जिसकी वो हक़दार थीं। यहाँ की औरतें बाहर की दुनिया तभी देख पाती हैं जब उनके ग्राहक उन्हें अपने साथ बाहर घुमाने ले जाते हैं।"
उन्होंने कहा, "इस गाँव में भारत की शायद सबसे जटिल, गंदी और अपवित्र पारिवारिक संरचना देखी जा सकती है। इस गाँव में कोई 50 दलाल होंगे जो लड़कियों के पैदा होते ही भेंड़ियों की तरह लार टपकाने लगते हैं। देश के दूसरे हिस्सों के विपरीत यहाँ लड़कियों के जन्म पर जश्न मनाया जाता है और बेटे के पैदा होने पर मातम।"
शारदाबेन पर कई हमले हुए लेकिन उन्होंने और उनके पति ने वाडिया गाँव में अपना काम जारी रखा। वे गाँव के परिवारों से लड़कियों को देह व्यापार के धंधे से बचाने अपील करते रहे। शारदाबेन कहती हैं, "हमारे पास ऐसी भी ख़बरें हैं कि वाडिया की लड़कियाँ मुंबई, अहमदाबाद और सूरत जैसे शहरों में बेची जाती रही हैं।"
सरकारी सहानुभूति
उन्होंने कहा, "हमने कई बार पुलिस को शिकायत दर्ज कराई कि पालनपुर के एक घर से इस गोरखधंधे को अंजाम दिया जाता है, यहाँ जवान लड़कियाँ रखी जाती हैं उन्हें देह व्यापार के धंधे में यहीं से धकेला जाता है।" पिछले नौ बरसों में मित्तल और उनकी टीम ने गाँव के 15 परिवारों को समझाने में कामयाब रहीं। मितल की टीम ने उनसे वादा लिया है कि वे अपनी बेटियों को सेक्स वर्कर नहीं बनने देंगी।
मित्तल कहती हैं, "हम उन्हें कहते हैं कि वे अपनी बेटियों की दलाली न करें लेकिन तब वे पूछते हैं कि वे गुजारे के लिए क्या करें, वाडिया के लोगों को कोई नौकरी नहीं देता है। इसलिए हमने उन लोगों की मदद करना शुरू किया है जिन्होंने अपना गराज, दुकान या ढाबा कुछ भी लेकिन अपना काम शुरू करने की क़सम ली है।"
मितल जानती हैं कि वाडिया के औरतों की क़िस्मत तब तक नहीं बदलेगी जब तक कि राज्य सरकार यहाँ के लोगों के लिए सहानुभूति न दिखाए। भाबाभाई भैहरा भाई वाडिया के बदलते हुए चेहरों में से एक हैं। उन्होंने क़सम ली कि वे अपनी पत्नी और बेटी को दलालों की चंगुल में फंसने की इजाज़त नहीं देंगे।
औरतों की डरावनी ज़िंदगी
वह कहते हैं, "बस एक मेरा भाई है जो अब भी अपनी बेटी की दलाली करता है, मेरे बाक़ी पाँचों भाई खेतों में मज़दूरी करते हैं और सिर उठाकर जीते हैं। हम लड़ते हुए मर जाएंगे लेकिन कभी भी अपनी औरतों को देह व्यापार के धंधे में जाने नहीं देंगे। हमने अपनी माँ को और उनकी माँ को बेहद डरावनी ज़िंदगी जीते हुए देखा है। हम अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं होने देंगे।"
वाडिया से बीते कुछ वर्षों में कोई 20 परिवारों ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए गाँव छोड़ दिया है। लेकिन आज वे पालनपुर की सड़क किनारे बनी झुग्गियों में रहने के लिए मजबूर हैं। पालनपुर हीरे के धनाढ्य कारोबारियों की वजह से जाना जाता है। ये परिवार यहाँ भीख माँग कर गुज़ारा करने के लिए मजबूर है।
हालांकि उन्होंने क़सम खाई है कि वे अगर भूख से मरने भी लगे तो भी अपनी बेटियों को इसे पेशे से नहीं जाने देंगे लेकिन इसके बावजूद समुदाय की औरतों पर ख़तरा बरक़रार है। वैसे यहाँ की आबोहवा में प्रेम कहानियाँ बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों की तर्ज़ पर मिल जाती हैं। कई ऐसे मर्द हैं जो वाडिया में सालों तक ग्राहक बनकर आते रहे और यौनकर्मियों के इश्क़ में पड़ गए।