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पीएम मोदी चाहते हैं वोट न देने वालों को हो सजा!

Tue, 11 Nov 2014 03:19 PM IST
Updated Tue, 11 Nov 2014 03:19 PM IST
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gujarat compulsory vote law: EC Brahma asks, will you jail those who don't?

गुजराज सरकार के उस आदेश की मुखालफत होने लगी है जिसमें उसमें अनिवार्य वोटिंग को लागू करने का फैसला किया है।

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भारत निवार्चन आयोग के चुनाव आयुक्त एचएस ब्रहमा ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि गुजरात सरकार का निकाय चुनावों में सभी के लिए मतदान अनिवार्य करने को फैसला गलत है।

पिछले कई वर्षों से यह कानून लंबित पड़ा हुआ था पर कमला बेनीवाल के हटते ही नए राज्यपाल ओ पी कोहली ने इस कानून को पास कर दिया है। इसके बाद 5 नवंबर को इस कानून की अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।
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इस कानून के तहत वोटिंग न करने वाले लोगों के खिलाफ पेनाल्टी लगाने की बाद कही है।

गुजरात सरकार के इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मेरी नजर में यह कानून बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर यह कानून केंद्र सरकार भी लागू कर देती है। तब क्या होगा?
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मान लीजिए 83 करोड़ वोटर में 10 फीसदी लोग वोट नहीं देते हैं तो क्या 8 करोड़ लोगों को जेल में डाल दिया जाएगा। क्या इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जेल में रखने के लिए जगह है?

28 करोड़ लोगों ने नहीं दिया था वोट

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उन्होंने कहा कि छह माह पहले हुए लोकसभ चुनावों में पंजीकृत 83.41 करोड़ मतदाताओं में से 53.38 करोड़ लोगों ने ही मतदान किया था। करीब 28 करोड़ लोगों ने वोट ही नहीं डाला था।

भारत के पूर्व सॉलिस्टिर जनरल मोहन पारासरन ने कहा कि गुजरात के इस कानून ने हद पार कर दी है, कोर्ट की तरफ से इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। लोकतंत्र में सभी की अपनी पसंद होती है। लोकतंत्र में सही तस्वीर वही होती है जिसमें मतदाता खुद मतदान करें, न कि उसे मतदान करने के लिए मजबूर कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि गुजरात का यह कानून न्यायिक परीक्षण में टिक पाएगा।

चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को मानना है कि जबरदस्ती वोटिंग को अनिवार्य बनाना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जबरदस्ती किसी को वोटिंग के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। चुनावी प्रक्रिया का मूल मंत्र है कि चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से कराया जाए। यह संभव नहीं कि आप लोगों को जबरदस्ती वोटिंग के लिए पोलिंग स्टेशन तक लेकर आएं।

चुनाव आयोग ने किया अनिवार्य वोटिंग का विरोध

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उन्होंने बताया कि कानून मंत्रालय से साथ हुई पिछली बातचीतों में चुनाव आयोग ने हर बार अनिवार्य वोटिंग को विरोध किया है। एसो‌सिएशन फॉर डेमो‌क्रेटिक रिफॉर्म संस्‍थापक-ट्रस्टी जगदीप एस छोकर ने कहा कि पहले कानून बनाने वालों के लिए वोटिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए, उसके बाद ही ऐसे नियमों को जनता पर थोपना चाहिए।

लोकसभा-राज्यसभा के अंदर कई बार सांसद वोटिंग नहीं करते हैं। ऐसे सांसदों के खिलाफ पहले कानून बनाना चाहिए। इसके बाद ही लोगों के लिए कानून बनाने की घोषणा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कैसे यह कानून बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया? उनके मुख्यमंत्री रहते ही यह कानून पास हुआ था। यह संविधान को कमजोर करने वाला लक्षण है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील गुप्ता ने गुजरात के इस कानून की कड़े शब्दों में निंदा की है। उन्होंने कहा कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और जीवन जीने के अधिकारन के खिलाफ है।

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