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पार्टियों को RTI के फंदे से निकालेगी सरकार

Fri, 25 Oct 2013 01:20 AM IST
संजय मिश्र/दिल्ली
संजय मिश्र/दिल्ली Updated Fri, 25 Oct 2013 01:20 AM IST
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govt will save political parties from rti

राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के तहत लाने की अटार्नी जनरल की राय को सरकार नहीं मानेगी।

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केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल का कहना है कि राजनीतिक दलों को पारदर्शिता की कसौटी पर परखने के लिए कानून के साथ चुनाव आयोग के तमाम नियम-कायदे हैं।

सिब्बल ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि जब सियासी पार्टियां पब्लिक अथॉरिटी ही नहीं हैं तो भला इन्हें आरटीआई के दायरे में कैसे रखा जा सकता है।

कानून मंत्री के रुख से साफ है कि सरकार राजनीतिक दलों को आरटीआई के फंदे में नहीं आने देगी। केंद्रीय सूचना आयोग के इस बारे में फैसले को पलटकर यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार आगामी शीतकालीन सत्र में विधेयक पारित कराएगी।

कानून मंत्री ने अटार्नी जनरल की इस बारे में दी गई राय को कानूनी मुद्दा बताते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियाें को सरकारी प्राधिकार के तौर पर कोई अधिकार हासिल नहीं है। इसलिए किसी तरह का कोई शासकीय अधिकार न होने के कारण सियासी पार्टियों को पब्लिक अथॉरिटी के दायरे में रखना असंवैधानिक होगा।
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सिब्बल ने तर्क दिया कि राजनीतिक दल कानून और जवाबदेही से ऊपर नहीं हैं। पार्टियों को जरूरी जानकारी आयकर विभाग के साथ-साथ चुनाव आयोग को अनिवार्य रूप से मुहैया करानी पड़ती है। विदेश से मिलने वाली रकम का हिसाब गृह मंत्रालय को देना पड़ता है।
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सिब्बल ने राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने पर इसके दुरुपयोग की भी आशंका जताई। उनका कहना था कि सियासी दलों के आरटीआई के दायरे में आने पर लोग 20,000 रुपये से अधिक चंदा देने वालों का नाम जानना चाहेंगे।

चूंकि उद्योगपति सभी दलों को चंदा देते हैं मगर अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते। ऐसे में दलों के लिए चंदा जुटाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इस दौरान कानून मंत्री ने दलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की वकालत की और इसके लिए चुनाव आयोग से विचार विमर्श की सलाह दी।

इस मुद्दे पर सभी पार्टियां साथ
राजनीतिक दलों को आरटीआई के फंदे से बाहर रखने पर सियासी सहमति के सवाल पर सिब्बल ने कहा कि केवल कांग्रेस या सरकार का यह फैसला नहीं है बल्कि भाजपा समेत लगभग सभी पार्टियां इस बारे में कानून बनाने की हिमायती हैं। कानून मंत्री ने कहा कि भाजपा के इसका विरोध करने की गुमराह करने वाली कुछ खबरें आई हैं। मगर सच्चाई यह है कि भाजपा भी पार्टियों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने का समर्थन कर रही है।


सीआईसी के फैसले से सहमत हैं अटार्नी जनरल
सियासी पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने की मांग में अचानक तब तेजी आई जब बीते सोमवार को अटार्नी जनरल ने संसद की स्थायी समिति के समक्ष इससे संबंधित केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के फैसले को उचित ठहराया। इससे पहले सीआईसी के फैसले को पलटने के लिए सर्वसम्मति से लाया गया विधेयक तकनीकी कारणों से बीते मानसून सत्र में संसद में पारित नहीं हो पाया था। फिलहाल इस पर संसद की स्थायी समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है।

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