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अदालत Vs सरकारः कौन जीतेगा इस बार?

Fri, 27 Sep 2013 04:10 PM IST
अमर उजाला दिल्ली
अमर उजाला दिल्ली Updated Fri, 27 Sep 2013 04:10 PM IST
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govt vs court, who will win finally?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वोटिंग के दौरान राइट टू रिजेक्ट देने का फैसला कर चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। राजनीतिक दलों के बीच इस बात को लेकर हड़कंप मचना भी स्वाभाविक है।

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लेकिन यह ऐतिहासिक फैसला एक बार फिर अदालत और सरकार को आमने-सामने ला सकता है। हाल में एक बार ऐसा हो चुका है और अदालत के आदेश के तोड़ में सरकार ने अध्यादेश का हथियार इस्तेमाल किया।
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सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में आदेश दिया था कि जिन विधायकों और सांसदों को गंभीर अपराध का दोषी माना जाता है और जिन्हें दो साल की सजा सुनाई गई है, उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होगा।
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राजनीतिक दलों की परेशानी बढ़ेगी?
जाहिर है, अदालत का यह आदेश आते ही सियासी दलों के बीच लामबंदी शुरू हो गई और इसका तोड़ अध्यादेश के रूप में निकाला गया। अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर खत्म करने की कोशिश हुई।

हालांकि, ऐसा करने पर यूपीए सरकार को न केवल कुछ विरोधी दलों की नाराजगी का सामना करना पड़ा, बल्कि उसके अपने कुछ नेता ही इस अध्यादेश के खिलाफ खड़े हो गए।

मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस सिलसिले में कड़ा विरोध जताया और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से इस बारे में शिकायत की।

इसके अलावा कांग्रेस के नेता मिलिंद देवड़ा ने ही अध्यादेश के खिलाफ झंडा उठा लिया। उनके अलावा पार्टी के कुछ और नेता भी इस फैसले के विरोध में दिख रहे हैं।

अदालत का बड़ा आदेश
अभी यह मामला ठंडा नहीं हुआ था कि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ा फैसला सुनाया। उसने एनजीओ पीयूसीएल की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मतदान के वक्त मतदाताओं को राइट टू रिजेक्ट देने का फैसला किया।

अगर यह आदेश अमल में आया, तो वोट देते वक्त वोटर को अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवारों की फेहरिस्त के नीचे 'उपरोक्त में से कोई नहीं'का विकल्प भी मिलेगा। उसे अगर कोई उम्मीदवार पसंद नहीं आता, तो वह ईवीएम या बैलेट पेपर में यह विकल्प चुन सकता है।

जाहिर है सुप्रीम कोर्ट का आदेश आते ही राजनीतिक दलों के बीच अजीब से बेचैनी दिखनी शुरू हो गई। हालांकि, जनता दल युनाइटेड और हाल में सियासत में कूदी आम आदमी पार्टी जैसे कुछ दलों ने इस आदेश का स्वागत किया है।

गफलत में हैं नेताजी
लेकिन कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले सावधानी बरतना बेहतर समझा।

भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, "अब तक हमने अदालत का आदेश नहीं देखा है। इसे विस्तार से देखने और विचार-विमर्श करने के बाद ही हम कुछ कह सकते हैं।" दूसरी ओर, खबर लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी।

चुनावी सुधार की जरूरत अरसे से महसूस की जा रही थी और सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाकई बड़े बदलाव की नींव रख सकता है। लेकिन क्या यह वाकई अमल में आएगा?

अध्यादेश बना हथियार
अगर दागी विधायकों और सांसदों से जुड़े फैसले का हश्र देखें, तो यह अंदाजा हो जाता है कि राइट टू रिजेक्ट की राह आसान नहीं है।

सरकार अगर दागियों के मामले में अध्यादेश का दांव खेल सकती है, तो इस मामले में वह कुछ नहीं करेगी, इसकी उम्मीद कम है।

यह कहानी यहीं तक सीमित नहीं। चुनावी सुधारों की दशा में अगर आगे भी कदम इसी तरह बढ़ेंगे, तो राइट टू रिकॉल का मामला भी जोरशोर से उठेगा।

अन्ना हजारे ने इसे खूब हवा देने की कोशिश की, लेकिन आंदोलन की हवा निकलने के बाद इस डिमांड में भी दम नहीं रहा।

राइट टू रिकॉल पर बात बनेगी?
राइट टू रिकॉल के तहत चुने गए नेताओं को वापस बुलाने का अधिकार देना शामिल है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर चुनावों में कोई नेता जीत हासिल करता है, लेकिन उसके चुनावी क्षेत्र को उसका कामकाज पसंद नहीं आता, तो वे उसे वापस भी बुला सकते हैं।

अगर ऐसा हुआ, तो सभी राजनीतिक दल मुश्किल में फंस सकते हैं। राइट टू रिजेक्ट पर कदम बढ़ाने वाली न्यायपालिका अगर राइट टू रिकॉल पर भी संजीदगी से विचार करती है, तो सरकार बनाम अदालत की लड़ाई और तीखी होने की आशंका है।


न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका के अधिकारों को लेकर लड़ाई लंबे वक्त से जारी है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन शीर्ष अदालत के हालिया फैसले यह बता रहे हैं कि वह बड़े फैसले लेने में नहीं हिचक रही। और सरकार ने अध्यादेश का हथियार उठा लिया है।

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