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गलत केस में फंसे मुस्लिमों को बाहर निकालने की योजना लटकी

Mon, 21 Sep 2015 09:14 AM IST
Updated Mon, 21 Sep 2015 09:14 AM IST
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Govt scheme to free illigally arrested muslim youth under controversy

आतंकवाद के कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसे मुस्लिम लड़कों की पहचान करने और उन्हें केस से बाहर निकालने की केंद्र सरकार की योजना चार कदम का फासला भी नहीं तय कर पाई।

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यूपीए सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में अति गोपनीय तरीके से शुरू की गई यह कोशिश केंद्र और राज्य के संबंधों की तकनीकी व कानूनी जटिलता में फंस कर रह गई। इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ, मुंबई की एटीएस, गुजरात पुलिस और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल जैसे राज्यों के विशेष पुलिस दस्ते ने इस योजना पर सहयोग नहीं करने का संकेत शुरू में ही दे दिया था।
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इस काम की जिम्मेदारी निभा रहे खुफिया विभाग आईबी के शीर्षस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि आतंकी घटना के केस निपटाने के दबाव में कई राज्यों की पुलिस ने उन लड़कों को आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर रखा है, जिनका वारदात से कोई लेना-देना नहीं है।
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केंद्र के अल्पसंख्यक मंत्रालय को देश के कई हिस्सों से इसकी शिकायत लंबे समय से मिल रही थी। इस समुदाय में उभर रहे असंतोष के मद्देनजर यूपीए सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री रहमान खान ने तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से इस दिशा में गंभीर कदम उठाने की सिफारिश की थी।

सूत्रों के मुताबिक इस बातचीत में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर, मुंबई के सीरियल ट्रेन धमाके, मालेगांव, अजमेर शरीफ धमाका और मुंबई तथा दिल्ली में हुए कई धमाकों की पुलिस जांच को उदाहरण के तौर पर उठाया गया।

सालों बाद भी नहीं मिला न्याय

Govt scheme to free illigally arrested muslim youth under controversy

गौरतलब है कि अक्षरधाम में फंसे अहमदाबाद के पांच आरोपियों को सालों की मशक्कत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है।

वहीं मालेगांव और अजमेर शरीफ धमाके में हिन्दू संगठनों से जुड़े उग्र लोगों के शामिल होने के पुख्ता सबूत सामने आए, जबकि इनमें फंसे मुस्लिम लड़के अब भी केस से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

सूत्रों के मुताबिक एक बार एफआईआर दर्ज होने और चार्जशीट दायर हो जाने के बाद कानून मामला खत्म करने का अख्तियार राज्य सरकार के पास है। जिस राज्य की पुलिस ने यह काम किया है, वह अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है।

अगर पूरे मामले की जांच सही तरह से की जाए तो कानूनन इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी जेल तक जा सकते हैं।

आईबी ने शुरुआती कोशिश की तो राज्य सरकार और पुलिस की तरफ से सहयोग का कोई संकेत नहीं मिला। मामले की जटिलता और संवेदनशीलता को देखते हुए यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई।

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