मोदी के सपने के लिए भी नहीं हो रहा पूरा पैसा खर्च
ऐसा करने का कारण यह हो सकता है कि सरकार ने हर मंत्रालय को प्राइओरिटी में रखा है। जिन क्षेत्रों में खर्च औसत से कम किया गया है उनमें वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से में अधिक खर्च किया जा सकता है। ऐसे मंत्रालयों की लिस्ट से मोदी का स्वच्छता अभियान भी लड़खड़ाता सा नजर आ रहा है।
आपको बता दें कि स्वच्छ भारत को जोरों शोरों से बढ़ावा देने के बावजूद भी पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने इसके लिए काफी कम बजट खर्च किया है। जितने बजट की योजना इस मंत्रालय ने बनाई थी, पहले 6 महीनों में उसका सिर्फ 29 प्रतिशत ही खर्च किया गया है।
मोदी का सपना कैसे होगा पूरा?
भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से को विकसित करने के वादों के बावजूद उत्तर-पूर्वी हिस्से के विकास के लिए जिम्मेदार मंत्रालय ने शुरुआती 6 महीनों में इसके लिए निर्धारित बजट का एक चौथाई से भी कम हिस्सा खर्च किया है।
क्या दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का मोदी के डिजिटल इंडिया मिशन के लिए 6 महीनों में निर्धारित बजट का सिर्फ 25 प्रतिशत खर्च करना काफी है?
क्या मोदी का मेक इन इंडिया प्रोग्राम छोटे उद्योगों के लिए बनाए गए बजट से सफल हो सकता है, जबकि 6 महीनों में इसके लिए कुल बजट का सिर्फ 24 प्रतिशत ही खर्च किया गया है?
(फोटो साभार- मिन्ट)