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'किसी सरकार को लापता बच्चों की चिंता नहीं'

Tue, 05 Feb 2013 08:46 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Tue, 05 Feb 2013 08:46 PM IST
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government not worry about missing children

सुप्रीम कोर्ट ने लापता बच्चों के मामले पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने में नाकाम रहने पर मंगलवार को केंद्र और राज्य सरकारों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि लगता है कि किसी को भी बच्चों की चिंता नहीं है। शीर्षस्थ अदालत ने अरुणाचल प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु के मुख्य सचिवों के अदालत में अनुपस्थिति रहने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।

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सर्वोच्च अदालत ने राज्यों के अधिकारियों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वे अदालत को मूर्ख बना रहे हैं। न्यायालय इन सभी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर सकती है। चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर, जस्टिस अनिल आर दवे व जस्टिस विक्रमजीत सेन की पीठ ने केंद्र और राज्यों को अंतिम मौका देते हुए मामले की सुनवाई को 19 फरवरी तक के लिए टाल दिया।
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पीठ ने कहा कि लगता है कि लापता बच्चों के बारे में किसी को चिंता ही नहीं है। यह विडंबना है। शीर्षस्थ अदालत ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब बचपन बचाओ आंदोलन नामक एनजीओ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने कहा कि रोजाना सैकड़ों बच्चे लापता हो रहे हैं। इसके बावजूद सरकारें लापरवाह हैं। जबकि इससे पहले पीठ को सूचित किया गया कि न्यायिक आदेश के बावजूद राज्यों के मुख्य सचिव अदालत में पेश नहीं हुए।
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सर्वोच्च अदालत ने गुमशुदा बच्चों की स्थिति के संबंध में पांच राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब किया था लेकिन इनमें से सिर्फ गोवा और ओडिशा के ही मुख्य सचिव कोर्ट में पेश हुए। अरुणाचल प्रदेश के वकील ने मुख्य सचिव को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट देने की गुजारिश की।

इस पर पीठ ने कहा कि वे क्यों नहीं उपस्थिति हुए, क्या हम गैर जमानती वारंट जारी करें। वे अदालत को मूर्ख बना रहे हैं। वे यह नहीं कह सकते कि उपलब्ध नहीं हैं। उनके लिए निर्देश था कि उन्हें यहां उपस्थित होना चाहिए थे। पीठ ने गुजरात और तमिलनाडु के मुख्य सचिवों की अनुपस्थिति के बारे में भी इसी तरह की टिप्पणी की।

याद रहे कि एनजीओ ने याचिका में आरोप लगाया है कि 2008 से 2010 के दौरान देश में एक लाख 70 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हो गए जिनमें से अधिकांश बच्चों को देह व्यापार और बाल मजदूरी में धकेल दिया गया।

पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय, समाज कल्याण मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से इस मामले में प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देने के साथ सुनवाई को टाल दिया। साथ ही इस पर भी संज्ञान लिया कि न सिर्फ केंद्र ने बल्कि हरियाणा, मध्य प्रदेश, मेघालय, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, दिल्ली व अन्य ने प्रगति रिपोर्ट नहीं दाखिल की है।


--1.7 लाख बच्चे जनवरी, 2008 से जनवरी, 2010 के बीच लापता हुए।
--1,17,480 बच्चे देश के 392 जिलों से हुए लापता।
--41,546 बच्चों का अभी तक नहीं चला पता।
--सैकड़ों बच्चे प्रतिदिन हो रहे हैं गायब।
--बच्चों को देह व्यापार और बाल मजदूरी में धकेल जाता है।
--बचपन बचाओ आंदोलन एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की है जनहित याचिका।

कोर्ट ने क्या कहा
कोई भी सरकार लापता बच्चों के बारे में चिंतित नहीं दिखती है। यह एक विडंबना है। राज्यों के अधिकारी कोर्ट में क्यों नहीं उपस्थिति हुए। क्या हम इनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करें। वे कोर्ट को मूर्ख बना रहे हैं। वे यह नहीं कह सकते हैं कि वे उपलब्ध नहीं हैं।

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