हिमाचल चुनाव: सरकारी कर्मचारी भी बदलते रहे हैं सत्ता

मुरारी शर्मा/मंडी Updated Thu, 11 Oct 2012 07:42 AM IST
government employees are playing important role in himachal pradesh
हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों का रुख भी सत्ता का मिजाज बदलता रहा है। प्रदेश के ढाई लाख से भी अधिक कर्मचारी सियासी खेल में बराबर की भूमिका निभाते रहे हैं। डॉ. परमार के समय से ही कर्मचारी आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है। यह अलग बात है कि 1998 से 2012 तक प्रदेश में कर्मचारियों का ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं हुआ, जिससे प्रदेश की सत्ता प्रभावित हुई हो। अलबत्ता, कर्मचारियों की एकजुटता के आगे प्रदेश की सरकारों को घुटने टेकने पड़े हैं। हर राजनीतिक दल कर्मचारियों को खुश करने की कवायद में जुटा रहता है।

प्रदेश के हर घर से कर्मचारी होने की वजह से हिमाचल की राजनीति में परोक्ष रूप से उनका दखल रहा है। चुनाव में सभी दल कर्मचारी हितैषी बनने की कोशिश करते हैं। हर पार्टी के घोषणापत्र में कर्मचारियों के लिए लुभावने वायदे शामिल होते हैं। कर्मचारी वर्ग कभी खुलकर तो कभी खामोशी से अपना फैसला देता है। प्रदेश के दर्जनों ऐसे नेता हैं, जो सरकारी नौकरी छोड़कर सियासत के अखाड़े में कूदे हैं।

डॉ. परमार के समय शिक्षक आंदोलन के नेता शास्त्री दीनानाथ गौतम स्वयं राजनीति में उतरे थे। कर्मचारी नेता मधुकर ने भी भाग्य आजमाया था। 1990 में शांता कुमार के नो वर्क, नो पे के सिद्धांत से खफा कर्मचारियों ने 1993 के चुनाव में शांता कुमार को पूरी तरह से नकार दिया। 1998 में कुछ कर्मचारी नेताओं द्वारा चलाए गए तबादला उद्योग से खफा कर्मचारियों की नाराजगी का एहसास वीरभद्र सिंह को भी हुआ था। भाजपा से कांटे की टक्कर में हिविकां ने उनका खेल बिगाड़ दिया था।

प्रदेश में सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या करीब ढाई-तीन लाख बैठती है। पूर्व कर्मचारियों का आंकड़ा इससे आधा है। दिहाड़ीदार और वर्कचार्ज कर्मियों की संख्या भी एक डेढ़ लाख के आसपास बैठती है। प्रदेश में आदर्श शासन व्यवस्था लागू करने का सपना देखने वाले शांता कुमार ने काम नहीं तो वेतन नहीं का नियम लागू कर भले ही देश में दूसरे राज्यों के सामने आदर्श स्थापित किया, मगर इसका खामियाजा उन्हें कर्मचारियों के खुले विरोध के रूप भुगतना पड़ा। 1993 में शांता को सत्ता से दूर रखने में कर्मचारियों का हाथ रहा है। प्रेम कुमार धूमल कर्मचारियों के साथ टकराव से बचते रहे हैं।

-जो सरकार कर्मचारियों के हक-हकूकों की रक्षा नहीं करती, कर्मचारी उसे बदलने में कसर नहीं छोड़ते। वैसे कर्मचारी वर्ग विवेक से फैसला लेता है। इस बार भी कर्मचारी विवेक से फैसला लेते हुए लोकतंत्र के इस महा पर्व में अपनी भागीदारी निभाएंगे।
एनआर ठाकुर, महासचिव अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ

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