सियासत में मस्त सरकार और सांसद, बोस को भूले
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गणतंत्र दिवस समारोह के तमाम तामझाम और लोकसभा चुनाव की सियासत में रमी सरकार देश के महान शहीद नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को ही भुला बैठी।
महान स्वतंत्रता सेनानी की 117वीं जयंती पर न तो सरकार ने उन्हें याद किया और न ही सांसदों को ही उनकी याद आई।
हद तो तब हो गई कि नेताजी की जयंती पर समारोह का आयोजन नहीं करने वाली सरकार ने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित समारोह में भी जाना मुनासिब नहीं समझा। इस समारोह में कोई कैबिनेट मंत्री तो दूर एक राज्यमंत्री ने भी हाजिरी नहीं लगाई।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के अलावा किसी भी राजनीतिक पार्टी का एक सांसद तक इसमें शरीक नहीं हुआ।
अपमानजनक बेरुखी की कहानी
संसद के दोनों सदनों के 790 सांसदों में से इकलौते आडवाणी के साथ नेताजी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने के लिए तीन पूर्व सांसद राम सिंह, शीला गौतम और ब्रतीन सेनगुप्ता जरूर मौजूद थे। चूंकि समारोह में राज्यसभा और लोकसभा के अधिकारियों का रहना अनिवार्य है।
इसलिए इस रस्म अदायगी के लिए राज्यसभा के सभापति और लोकसभा सचिवालय के पांच अधिकारी जरूर इस दौरान नजर आए। यह स्थिति तब है जब तीन साल पहले नेताजी की जयंती पर इसी तरह के हालात पर आडवाणी ने लोकसभा में बेहद कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी।
नेताजी की जयंती पर आयोजित समारोह के प्रति अपमानजनक बेरुखी की कहानी तीन साल बाद ही दोहरा दी गई। आधे किलोमीटर से भी कम के दायरे में नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, कृषि भवन, शास्त्री भवन जैसे सरकारी भवनों में बैठे मंत्रियों ने संसद भवन में नेताजी की जयंती समारोह में शामिल होना जरूरी नहीं समझा।
सरकार के प्रतिनिधियों, सांसदों की अनुपस्थिति में ही नेताजी की जयंती समारोह की रस्म अदायगी कर दी गई। इस दौरान न तो जर्मनी से नेताजी की अस्थियां भारत लाने की मांग करने वाले सांसद दिखे और न ही नेताजी की मौत की जांच की मांग करने वाले।
राजनीति के हानि लाभ
लोकसभा चुनाव की सियासी तैयारी में जुटी सरकार ने नेताजी की जयंती को भी राजनीति के हानि लाभ से देखने से गुरेज नहीं किया। नेताजी के नाम पर सियासत में यह बेरुखी कभी नहीं दिखी।
सियासी हानि लाभ के समीकरण के तहत कभी उनके मौत का रहस्य जानने के लिए जस्टिस बनर्जी आयोग गठित किया गया। तो इसी हानि लाभ के तहत बड़ी मेहनत से तैयार की गई बनर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज करने के साथ ही दबा दिया गया।
तीन साल पहले भी नेताजी की जयंती पर ऐसी ही बेरुखी दिखी थी। उस दौरान भी सरकार ने इस समारोह से दूरी बना ली थी। नेताजी के हर जयंती समारोह में उपस्थिति दर्ज कराने वाले आडवाणी ने तब इस पर बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। उन्होंने सरकार को शहीदों का सम्मान करने या फिर इस तरह के समारोह को हमेशा के लिए बंद कर देने की नसीहत दी थी।
फिर दिखाई बेरुखी
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आयोजित समारोह के प्रति अपमानजनक बेरुखी की कहानी तीन साल बाद ही दोहरा दी गई। आधे किलोमीटर से भी कम के दायरे में नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, कृषि भवन, शास्त्री भवन जैसे सरकारी भवनों में बैठे मंत्रियों ने संसद भवन में नेताजी की जयंती समारोह में शामिल होना जरूरी नहीं समझा।