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नए लोकपाल बिल को कैबिनेट की मिली मंजूरी
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Fri, 01 Feb 2013 12:51 AM IST
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भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माने जा रहे लोकपाल बिल के नए मसौदे को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक में संशोधित बिल को हरी झंडी दिखा दी गई।
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बिल पर राज्यसभा की सलेक्ट कमेटी की 16 में से 14 सिफारिशों को मान लिया गया है। इसमें लोकायुक्त के गठन का मामला अब राज्यों पर छोड़ दिया गया है। मगर सरकार ने सेलेक्ट कमिटी की यह सिफारिश नहीं मानी है कि भ्रष्टाचार के मामले में लोकपाल जांच के दायरे में आए सरकारी अधिकारी को प्रारंभिक स्तर पर सुनवाई का मौका नहीं दिया जाना चाहिए। नए बिल के अनुसार सीबीआई लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी। सरकार अब संशोधित लोकपाल बिल को आगामी बजट सत्र में पारित कराने की कोशिश करेगी।
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समाजसेवी अन्ना हजारे की फिर बढ़ी सक्रियता के मद्देनजर सरकार लोकपाल विधेयक को लोकसभा चुनाव से पहले हर हालत में पारित कराना चाहती है। इससे उसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा और संरक्षण देने संबंधी आरोपों से बचने का रास्ता मिल जाएगा। बहरहाल, सरकार ने लोकायुक्त का मामला राज्यों पर छोड़ दिया है।
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गौरतलब है कि लोकायुक्त थोपने के केंद्र के बिल के प्रस्ताव को लेकर तमाम राजनीतिक दलों को गहरा एतराज था। उनका तर्क था कि यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण है। नए बिल के अनुसार राज्यों को लोकपाल कानून बनने के एक साल के भीतर लोकायुक्त कानून बनाना होगा।
संशोधित लोकपाल विधेयक के अनुसार अब पांच सदस्यीय पैनल लोकपाल का करेगा चयन करेगा। जबकि राजनीतिक दल लोकपाल के दायरे में नहीं आएंगे। वहीं सरकारी और तय सीमा से ज्यादा विदेशी आर्थिक सहायता लेने वाले एनजीओ इसके दायरे में रहेंगे। समिति ने लोकपाल की सिफारिश पर मामलों की जांच करने वाले अफसरों का तबादला लोकपाल की मंजूरी से ही करने सिफारिश की थी, लेकिन इसे नहीं माना गया।
गौरतलब है कि लोकपाल को लोकसभा से 27 दिसंबर, 2011 को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन अब इन संशोधनों को भी लोकसभा से पारित करना होगा। राज्यसभा से विधेयक को हरी झंडी मिलनी बाकी है। राज्यसभा में यह विधेयक पारित नहीं हो पाया था और इसे सलेक्ट कमेटी के हवाले कर दिया था।
सेलेक्ट कमेटी की भ्रष्टाचार को लेकर लोकपाल के दायरे में आए अफसर को प्राथमिक जांच के स्तर पर सुनवाई का मौका नहीं देने के सुझाव नहीं मानने के सरकार के फैसले को कार्मिक राज्यमंत्री नारायण सामी ने सही ठहराया। उनका कहना था कि सरकार न्याय के सिद्धांत और काम करने के लिए संरक्षण देने के लिहाज से सुनवाई का मौका देने को तार्किक मानती है।
इधर संशोधित लोकपाल विधेयक को कैबिनेट की हरी झंडी मिल जाने के बावजूद भाजपा खुश नहीं है। पार्टी ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि सीबीआई को स्वायत्त बनाने को लेकर उसके दिए सुझावों को सरकार ने खारिज कर दिया। भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं कि वह भ्रष्टाचार खत्म करने को लेकर गंभीर नहीं है।
पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि लोकपाल को प्रभावी बनाने के लिए भाजपा ने सीबीआई को स्वतंत्र निकाय बनाने का सुझाव दिया था। यह भी कहा था कि सीबीआई निदेशक के कार्यकाल की अवधि तय की जाए और रिटायरमेंट के बाद उसकी कहीं और नियुक्ति न की जाए। इससे वह निष्पक्ष होकर काम करेगा। लेकिन सरकार ने यह सुझाव नहीं माना।
उन्होंने कहा कि सीबीआई के जांच अधिकारी का तबादला लोकपाल की अनुमति से ही करने का सुझाव दिया गया था। इसे भी नहीं माना। लोकपाल की नियुक्ति पारदर्शी होनी चाहिए व उसे सरकार के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए। अब संसद में भाजपा इस बिल के आने पर अपनी बात पुरजोर तरीके से रखेगी।
लोकपाल: संशोधन के बाद
- लोकपाल का चयन करने वाले पांच सदस्यीय पैनल में पीएम, स्पीकर, नेता विपक्ष, देश के चीफ जस्टिस और एक अन्य प्रमुख न्यायाधीश शामिल होंगे।
- लोकपाल की नियुक्ति को आखिरी मंजूरी राष्ट्रपति देंगे।
- लोकपाल के सदस्य किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होंगे। उनका कार्यकाल दो साल का होगा।
- कुछ शर्तों के साथ पीएम लोकायुक्त के दायरे में। आंतरिक और विदेशी सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरराष्ट्रीय संबंध और लोक व्यवस्था के मुद्दों पर पीएम लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे।
- सीबीआई लोकपाल के दायरे से बाहर। सीबीआई निदेशक का चुनाव प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस द्वारा किया जाएगा।
- सरकार से आर्थिक अनुदान पाने वाले और विदेश से साल में दस लाख रुपये से ज्यादा अनुदान पाने वाले एनजीओ लोकपाल के दायरे में होंगे।
- राजनीतिक दल, शिक्षण संस्थाएं, सरकार से जमीन पाने वाली चैरिटेबल संस्थाएं, अस्पताल और धार्मिक संगठन लोकपाल के दायरे में नहीं।
- बिल पारित होने पर राज्यों में एक साल में लोकायुक्त। राज्य खुद लोकपाल का चयन करेंगे। राज्यों में नियुक्त लोकायुक्त लोकपाल से अलग होंगे।
- लोकपाल को भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का खुद संज्ञान लेने का हक होगा।
- प्राथमिक शिकायत के बाद और जांच से पहले सरकारी अधिकारी लोकपाल के सामने अपना पक्ष रख सकेंगे।
- लोकपाल अधिकतम एक साल जेल और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा दे सकेगा।
जो संशोधन नहीं हुए स्वीकार
- सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति में लोकपाल किसी तरह का बदलाव नहीं कर सकेगा। साथ ही जांच के लिए प्रस्तुत केस से जुड़े सीबीआई अधिकारियों का तबादला लोकपाल नहीं कर सकेगा।
- जिन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ पहले ही जांच जारी है उन्हें बिल पारित होने की स्थिति में लोकपाल अपने अधिकार के तहत लेकर जांच नहीं कर सकेगा।
क्या ऐसा कहीं होता है
- एक कमजोर बिल से सरकार देश को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है। यह बिल उल्टे भ्रष्टाचारियों की मदद करेगा। यह लोकपाल भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के बजाय पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजेगा। ऐसा कहीं होता है क्या?- अरविंद केजरीवाल
लोकपाल: अब तक
5 अप्रैल, 2011 : जन लोकपाल विधेयक लाने की मांग को लेकर अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे।
केंद्र सरकार ने 9 अप्रैल को बिल को लेकर अधिसूचना जारी की, 98 घंटे बाद अन्ना ने अनशन खत्म किया।
21 जून, 2011 : अंतिम बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला, 16 अगस्त से अनशन पर बैठने की घोषणा की
28 जुलाई, 2011 : कैबिनेट ने विधेयक को मंजूरी दी, पीएम, न्यायपालिका, संसद के भीतर सांसदों के आचरण दायरे से बाहर
16 अगस्त, 2011 : पुन: अनशन शुरू करने के दौरान अन्ना गिरफ्तार, रिहाई के बाद रामलीला मैदान में अनशन शुरू किए
27 अगस्त, 2011 : सिटीजन चार्टर, लोकायुक्त, निचली श्रेणी की नौकरशाही को दायरे में लाने को संसद की सैद्घांतिक सहमति
28 अगस्त, 2011 : अन्ना हजारे ने 13वें दिन अपना अनशन समाप्त किया
9 दिसंबर, 2011 : विधेयक पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट पेश, जन लोकपाल के प्रमुख तीन मुद्दों को नकार दिया गया
20 दिसंबर, 2011 : कैबिनेट ने संशोधित लोकपाल विधेयक को मंजूरी दी। सीबीआई को लोकपाल के नियंत्रण से बाहर रखने का फैसला, प्रधानमंत्री को कुछ शर्तों के साथ दायरे में रखा गया
27 दिसंबर, 2011 : लोकसभा में बिल पास
29 दिसंबर, 2011 : हंगामे की वजह से राज्यसभा आधी रात को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, बिल एक बार फिर लटकी
मई 2012 : बिल सिलेक्ट कमेटी को सौंपा गया। सितंबर 2012 में सिलेक्ट कमेटी ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट।