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गोधरा कांड की 11वीं बरसी पर आंखे हुई नम

Wed, 27 Feb 2013 10:56 AM IST
अहमदाबाद/इंटरनेट डेस्क
अहमदाबाद/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 27 Feb 2013 10:56 AM IST
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godhra riots 11th anniversary today

गुजरात के गोधरा में कारसेवकों के साथ हुई आगजनी की घटना को आज 11 साल पूरे हो गए। वर्ष 2002 में आज ही के दिन गोधरा स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस की एस-6 बोगी में आग लगा दी गई थी। सुबह 7 बजकर 57 मिनट पर हुई इस घटना में अयोध्या से लौट रहे 59 कार सेवकों की जलकर मौत हो गई थी। ट्रेन में लगी आग पूरे गुजरात में फैली और देखते ही देखते दंगों में एक हजार से ज्यादा मासूमों की मौत हो गई थी।

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गोधरा ट्रेन अग्निकांड की 11वीं बरसी पर एक बार फिर से लोगों की आंखें नम हो गई। आज भी पीडितों के जख्म नहीं भर पाए हैं। उन्हें आज भी इंसाफ का इंतजार है। 11 बरस गुजर जाने के बाद भी उस रात के स्याह साए से अब भी हजारों जिंदगियां नहीं उबर पाई हैं। 11 साल बाद भी कहीं इंसाफ न मिलने की मायूसी है, तो कहीं सरकारी मदद के खोखले दावों का दर्द है।
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गुजरात के उन दंगों का भूत आज भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को परेशान कर रहा है। मोदी, उनकी मंत्रिमंडल के सहयोगियों और अन्य सरकारी पदाधिकारियों पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ दंगों के दौरान जानबूझकर निष्क्रियता बरतने के आरोप लगाए गए।
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गोधरा ट्रेन कांड और उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगों का घटनाक्रम इस प्रकार है-

27 फरवरी, 2002 : गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में भीड़ द्वारा आग लगाए जाने के बाद 59 कारसेवकों की मौत हो गई। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

28 फरवरी से 31 मार्च : गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़का जिसमें 1200 से अधिक लोग मारे गए। मारे गए लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे।

03 मार्च : गोधरा ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया।

06 मार्च : गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जाँच के लिए एक आयोग की नियुक्ति की।

09 मार्च : पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भादसं की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) लगाया।
25 मार्च : केंद्र सरकार के दबाव की वजह से सभी आरोपियों पर से पोटो हटाया गया।

27 मार्च : 54 आरोपियों के खिलाफ पहला आरोपपत्र दाखिल किया गया, लेकिन उन पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत आरोप नहीं लगाया गया। (पोटो को उस समय संसद ने पास कर दिया था जिससे वह कानून बन गया)

18 फरवरी, 2003 : गुजरात में भाजपा सरकार के दोबारा चुने जाने पर आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया।

21 नवंबर : उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन जलाए जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगाई।

04 सितंबर, 2004 : राजद नेता लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री रहने के दौरान केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति का गठन किया गया। इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जाँच का काम सौंपा गया।

21 सितंबर : नवगठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।

17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि एस-6 में लगी आग एक ‘दुर्घटना’ थी और इस बात की आशंका को खारिज किया कि आग बाहरी तत्वों द्वारा लगाई गई थी।

16 मई : पोटा समीक्षा समिति ने अपनी राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत आरोप नहीं लगाए जाएँ।

13 अक्टूबर 2006 : गुजरात उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है क्योंकि नानावटी-शाह आयोग पहले ही दंगे से जुड़े सभी मामले की जाँच कर रहा है । उसने यह भी कहा कि बनर्जी की जाँच के परिणाम ‘अमान्य’ हैं।

26 मार्च 2008 : उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन में लगी आग और गोधरा के बाद हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जाँच के लिए विशेष जाँच आयोग बनाया।

18 सितंबर : नानावटी आयोग ने गोधरा कांड की जाँच सौंपी और कहा कि यह पूर्व नियोजित षड्यंत्र था और एस6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया।

12 फरवरी 2009 : उच्च न्यायालय ने पोटा समीक्षा समिति के इस फैसले की पुष्टि की कि कानून को इस मामले में नहीं लागू किया जा सकता है।

20 फरवरी : गोधरा कांड के पीड़ितों के रिश्तेदार ने आरोपियों पर से पोटा कानून हटाए जाने के उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इस मामले पर सुनवाई अभी भी लंबित है।


01 मई : उच्चतम न्यायालय ने गोधरा मामले की सुनवाई पर से प्रतिबंध हटाया और सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाले विशेष जाँच दल ने गोधरा कांड और दंगे से जुड़े आठ अन्य मामलों की जाँच में तेजी आई।

01 जून : गोधरा ट्रेन कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय जेल के अंदर शुरू हुई।

06 मई 2010 : उच्चतम न्यायालय सुनवाई अदालत को गोधरा ट्रेन कांड समेत गुजरात के दंगों से जुड़े नौ संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका।

28 सितंबर : सुनवाई पूरी हुई लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा रोक लगाए जाने के कारण फैसला नहीं सुनाया गया।

18 जनवरी 2011 : उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाने पर से प्रतिबंध हटाया।

22 फरवरी : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जबकि 63 अन्य को बरी किया ।

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