फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   Getting hold of loose Modi government?

तो क्या ढीली पड़ रही है मोदी सरकार की पकड़?

Wed, 12 Aug 2015 09:26 AM IST
Updated Wed, 12 Aug 2015 09:26 AM IST
विज्ञापन
Getting hold of loose Modi government?

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कभी कहा था कि 'मौजूदा अवधारणाओं और मौजूदा संस्थानों को चुनौती देने से रोकने के लिए सेंसरशिप लाई जाती है।'भारत में एक हालिया विवाद से संकेत मिलता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार कितनी सहमी हुई है।

विज्ञापन


सरकार ने तीन टीवी चैनलों पर उस वक्त प्रसारण के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया जब उन्होंने मुंबई बम धमाकों के दोषी याक़ूब मेमन को पिछले महीने फांसी देने का विरोध करने वाले इंटरव्यू प्रसारित किए। सरकार ने टीवी चैनलों का लाइसेंस तक रद्द करने की धमकी दे डाली।
विज्ञापन


नई बहस

Getting hold of loose Modi government?

मेमन को फांसी देने का मुद्दा ख़ासा विवादित रहा है। ऐसी भी आवाज़ें सुनाई दीं कि मेमन के साथ भारतीय अधिकारियों ने धोखा किया क्योंकि पहले उन्होंने ही याक़ूब को आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया था।

याकूब ने लगभग दो दशक जेल में बिताए क्योंकि उनके मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया चली।उनकी फांसी ने भारत में मौत की सज़ा और 'चुनिंदा तरीक़े से न्याय' पर नई बहस शुरू की है।

राष्ट्रपति ने याक़ूब की दया याचिका को दो बार खारिज किया और मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील करने वाली उनकी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ठुकराया।

उनके मामले पर सुनवाई के लिए रात में सुप्रीम कोर्ट खोला गया और फांसी से चंद घंटों पहले उनकी याचिका को अंतिम बार खारिज किया गया।

लेकिन इस मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से जारी निर्देशों को बहुत से पत्रकार सेंसरशिप के तौर पर देखते हैं, वो भी एक ऐसे देश में जो ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कह रहा है।

'कानूनन हत्या'

Getting hold of loose Modi government?

सरकार की दलील है कि प्रसारित साक्षात्कारों में ऐसी सामग्री थी जो राष्ट्रपति और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है।

इनमें से एक इंटरव्यू में मेमन के एक पूर्व वकील को ये कहते हुए दिखाया गया है कि धमाकों के एक अन्य अभियुक्त को अदालतों ने माफ़ कर दिया जबकि विस्फोटों में उसकी भूमिका याक़ूब मेमन से ज्यादा थी।

वो कहते हैं, "अगर आप भारत से बाहर किसी को ये बात बताएंगे, तो ब्रितानी और अमरीकी अधिकारी या फिर आपराधिक कानून पर दुनिया का कोई भी बड़ा विशेषज्ञ इस पर हंसेगा।"

वकील ने कहा, "वे आप पर हंसेंगे, वे कहेंगे, क्या यही न्याय है?" एक अन्य इंटरव्यू में मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़े एक व्यक्ति से बात की गई जो फ़रार है और उसे धमाकों के मास्टरमाइंडों में से एक माना जाता है।छोटा शकील ने चैनल को फोन किया और याक़ूब मेमन की फांसी को 'कानूनन हत्या' बताया।

विज्ञापन

चैनलों का विरोध

Getting hold of loose Modi government?

चैनलों ने सरकार की तरफ से जारी निर्देशों का विरोध किया और ये कहते हुए सरकार के तर्कों पर सवाल उठाए कि चैनलों ने चरमपंथ से संबंधित घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए खुद नियम बनाए हुए हैं।

भारत के केबल नेटवर्क कानूनों के तहत पहले से ही चरमपंथ विरोधी अभियानों की सीमति मीडिया कवरेज की अनुमति है। ऐसे अभियान खत्म होने तक चैनल कुछ-कुछ अवधि के बाद सरकारी प्रेस अधिकारियों की तरफ से दी जाने वाली जानकारी पर ही निर्भर होते हैं।

जानी-मानी वकील इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जंग सरकार नहीं लड़ सकती है। एक भारतीय वेबसाइट 'द वायर' पर उन्होंने लिखा, "बहुत साल पहले, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रसारण तरंगें हमारी हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रसारण का लाइसेंस न देकर दबाया नहीं जा सकता है।"

'संभव नहीं सेंसरशिप'

Getting hold of loose Modi government?

यहां पर बड़ी विडंबना ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अरुण जेटली चलाते हैं जो वित्त मंत्री भी हैं।उन्हें सरकार का एक उदारवादी चेहरा माना जाता है।

जेटली ने 1970 के दशक में इमरजेंसी के दौरान एक छात्र नेता के तौर पर 19 महीने जेल में बिताए थे। इमरजेंसी में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीडिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमित करते हुए कई कड़े नियम लागू कर दिए थे।

इसी साल जून महीने में जेटली ने इमरजेंसी पर एक कार्यक्रम के दौरान कहा था, "आज के दौर में टेक्नॉलॉजी के कारण मीडिया सेंसरशिप संभव नहीं है।"

तो फिर मोदी सरकार प्रसारण को लेकर इस तरह के दिशानिर्देश क्यों ला रही है? बहुत से लोग कहते हैं कि इस समस्या का बहुत हद तक संबंध खुद प्रधानमंत्री मोदी से है।

किसके नक्शेकदम पर मोदी

Getting hold of loose Modi government?

मोदी के आलोचक कहते हैं कि मोदी खुले और स्वछंद मीडिया इंटरव्यू की बजाय कांट छांट कर और नियंत्रित सोशल मीडिया मैसेजिंग और रेडियो संवाद को कहीं ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। उनके मुताबिक मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन के नक्शेकदम पर चल रहे हैं।

'द न्यू सेंसरशिप: इनसाइड द ग्लोबल बैटल फॉर द मीडिया फ्रीडम' के लेखक जोएल साइमन के मुताबिक पुतिन और एर्दोआन, दोनों ही विशाल जनमत को तानाशाहों की तरह शासन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

मोदी पत्रकारों से बात करने की बजाय आम लोगों से बात करते हैं जिसका उन्हें बहुत फायदा भी हुआ है और इससे वो बहुत युवाओं का दिल जीत पाए।

हाल के समय में मोदी का कार्यालय बहुत की केंद्रीकृत रहा है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "वहीं से चीज़ें खराब हो रही हैं। आप सत्ता का केंद्रीकरण करके भारत जैसे देश को नहीं चला सकते हैं।"

सरकार को असुरक्षा?

Getting hold of loose Modi government?

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता लिखते हैं, "जब सरकार मीडिया को निशाना बनाने लगे या उसे दोष देने लगे तो ये इस बात का पहला संकेत होता है कि उसकी पकड़ ढीली हो रही है।" वो कहते हैं कि सरकार का ये सोचना ही बेतुका है कि वो मीडिया या फिर सोशल मीडिया को नियंत्रित कर सकती है।

उनके मुताबिक, "मीडिया के खिलाफ लड़ाई छेड़ने की किसी भी सरकार को बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।" माना जाता है कि अन्य लोकतांत्रिक देशों के मुक़ाबले भारत में अब भी प्रेस को और आज़ादी देने की ज़रूरत है।

'रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स' संस्था के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को कुल 180 देशों की सूची में 136वें स्थान पर रखा गया है। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य ये है कि भारत में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार क्यों मीडिया पर अपनी ताकत को दिखाना चाहती है? क्या ये असुरक्षा का शुरुआती संकेत हो सकता है?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed