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जर्मनी की युवती यूपी में सीख रही है खेती करना
बांदा/ब्यूरो
Updated Sat, 27 Oct 2012 03:48 PM IST
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किसानों को खेती के उन तरीकों को खोजना चाहिए, जिसमें ज्यादा आमदनी हो और उनकी जरूरतें पूरी हो सकें। जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाया जा सके। बढ़ती उम्र में सुविधाओं का अभाव न रहे। यह कहना है जर्मनी की स्नातक किसान स्टफनी का। वह इन दिनों भारतीय खेती-बाड़ी के गुर सीखने यहां आई हुई हैं।
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प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह अपने बड़ोखर खुर्द स्थित कृषि फार्म में उन्हें खेती-किसानी के गुर सिखा रहे हैं। जर्मनी के उल्म शहर की रहने वाली स्टफनी भारतीय खेती सीखने को दो माह के लिए यहां आई हुई हैं। एक पखवारे से हर वो काम सीख रही हैं जो आमतौर पर भारतीय किसानों की दिनचर्या है।
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25 वर्षीय स्टफनी का कहना है कि बढ़ती उम्र में शरीर कमजोर होने लगता है। जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं। इन हालात में ज्ञान काम आता है। किसानों को ऐसे तरीके खोजने चाहिए, जिसमें आमदनी ज्यादा हो और उनकी जरूरतें पूरी हो सकें।
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स्टफनी ने बेबाकी से कहा कि आर्गेनिक खेती से जरूरतें पूरी हो सकती हैं। जर्मन युवती का कहना है कि बुंदेलखंड के युवाओं को दूसरे शहरों में पलायन करने के बजाय उन्हें खेती को चुनना चाहिए। खेती में शोध करना चाहिए। चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। यह बेहतरीन व्यवसाय है।
खेती किसानी के साथ-साथ हिंदी भी
स्टफनी पहली बार भारत आई हैं। उन्होंने किसान प्रेम सिंह के बारे में सुन रखा था, इसीलिए यहां आकर प्रेम सिंह की मेहमान बन गई। हिंदी बोलना भी सीख रही हैं। कृषि फार्म में रहने वाली सात वर्षीय बालिका खुशी से स्टफनी की काफी दोस्ती हो गई है। स्टफनी रोजाना सुबह गाय, भैंस का दूध दुहती हैं। खेतों की गुड़ाई के अलावा पेंटिंग करती हैं। दिन भर खेती के बारे में बातचीत में समय बिताती हैं।
उन्हें टूटी-फूटी हिंदी बोलना आ गया है। स्टफनी ने अपनी बात ‘बुंदेलखंड आच्छा है, नमस्ते’ कहकर खत्म की। प्रेम सिंह ने बताया कि स्टफनी को भारतीय खेती के तौर-तरीके बहुत सुहा रहे हैं। वह आर्गेनिक खेती को व्यवसाय के रूप में चुनना चाहती हैं।