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अपराध है गे सेक्स, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 11 Dec 2013 10:24 PM IST
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देश के गे-लेस्बियन समुदाय के लिए यह बड़ा झटका है। सर्वोच्च न्यायालय ने गे सेक्स को गुनाह बताया है, जिसके बाद अब गे सेक्स का समर्थन करने वालों के पास कानून में बदलाव के लिए संसद ही आखिरी उम्मीद बची है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने से जुड़ा जो फैसला सुनाया था, वह संवैधानिक रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता, क्योंकि सिर्फ सरकार ही कानून में बदलाव ला सकती है।
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इसका मतलब यह हुआ कि वयस्कों के बीच गे सेक्स धारा 377 के तहत अपराध माना जाएगा। यह ब्रिटिश साम्राज्य के दौर से चला आ रहा कानून है, जिसमें 'इंटरकोर्स को प्रकृति के खिलाफ' माना गया।
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कानून को ठहराया सही
उच्च न्यायालय ने इस कानून को दरकिनार कर गे सेक्स के पक्ष में फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इस कानून में कोई 'संवैधानिक कमजोरी नहीं है।'
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एस जे मुखोपाध्याय की बेंच में इस मामले में समलैंगिक अधिकार विरोधी कार्यकर्ताओं और कुछ सामाजिक-धार्मिक संगठनों की याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
2009 के एक फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने किसी निजी जगह पर सहमति से बनाए गए समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध नहीं माना था। बुधवार को ही जस्टिस सिंघवी रिटायर हो रहे हैं। इस लिहाज से उनका यह आखिरी फैसला है।
सरकार पर डाला जिम्मा
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सरकार इस कानून में बदलाव कर सकती है और इसके लिए उसे अटॉर्नी जनरल से राय ली जानी चाहिए।
गे लॉबी के अधिवक्ता अरविंद नरायण ने इसे काला दिन करार दिया। उन्होंने कहा, "उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक वादा पूरा करने से इनकार कर दिया है।"
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देश में इसे सामाजिक-सांस्कृतिक लिहाज से अहम फैसले के रूप में देखा गया था, लेकिन तमाम संगठनों ने इसका विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने कहा, "यह चौंकाने वाली बात है कि जो अदालत कई मुद्दों पर न्यायिक समीक्षा करती है, उसने गे-लेस्बियन पर फैसला करने के लिए गेंद कोर्ट के पाले में डाल दी है। लोगों को अधिकारों की रक्षा की उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से रहती है।"
पीछे की ओर उठाया गया कदमः गुहा
जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्वीट के जरिए कहा कि यह आदेश बर्बरता और मध्यकालीन युग की तरफ पीछे उठाया गया कदम है। गे अधिकारों के लिए काम करने वाले एनजीओ नाज फाउंडेशन का कहना है कि वह फैसले की समीक्षा की गुहार लगाएगा।
साल 1890 के इस कानून के तहत अगर दोषी ठहराया जाता है, तो जुर्माना लगाने के आलवा दस साल तक की कैद हो सकती है। गे एक्टिविस्ट का कहना है कि पुलिस इस कानून का इस्तेमाल समलैंगिकों को तंग करने के लिए करती हैं।
सरकार का रुख साफ नहीं
हालांकि, अदालत ने अपने फैसले में समलैंगिकों पर कानून बनाने और धारा 377 को निरस्त करने को लेकर सरकार के पाले में गेंद डाली है, लेकिन अदालत में ही इस विषय पर केंद्र के बार-बार रुख बदलने से कोई खास उत्साहजनक संकेत नहीं मिले थे।
हालिया साल में देश में गे कम्युनिटी ने अपना प्रोफाइल बढ़ाते हुए बड़े शहरों में गे प्राइड परेड का आयोजन किया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे जागरुकता बढ़ाने में मदद मिली है।