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गंगा के पानी का रंग अचानक हुआ लाल, हड़कंप

Thu, 27 Nov 2014 03:44 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद, गजरौला, मथुरा
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद, गजरौला, मथुरा Updated Thu, 27 Nov 2014 03:44 PM IST
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Polluted Ganga Water Turned Red

गंगा-यमुना की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। पिछले दिनों मछलियों और साइबेरियन पक्षियों के मरने की घटना सामने आने के बाद बुधवार को संगम में गंगा जल का रंग अचानक लाल हो जाने से हड़कंप मच गया। सुबह तकरीबन छह बजे के आसपास दारागंज स्थित मोरी गेट से संगम तक गंगा जल का रंग पूरी तरह से लाल हो गया और यमुना में किलाघाट के पास छह सौ मीटर के दायरे में झाग दिखाई देने लगा।

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संगम पर देशभर से श्रद्धालु स्नान के लिए आते हैं। गंगा जल का यह हाल देख काफी श्रद्धालु बिना डुबकी लगाए लौट गए। संगम पर मौजूद पंडा, घाटिया, नाविक भी यह नजारा देख हतप्रभ रह गए। गंगा में दर्जनभर मछलियां भी मरी मिलीं। माघ मेला प्रशासन भी गंगा जल के इस रंग को लेकर परेशान दिखा। मेले का आयोजन बेहद नजदीक है और अफसरों को समझ नहीं आ रहा कि क्या किया जाए।
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बुधवार सुबह संगम स्नान के लिए पहुंचने वाला हर श्रद्धालु गंगा जल की यह स्थिति देख हतप्रभ हो गया। लाल गंगा जल देख घबराए पंडों, घाटियों ने इसकी सूचना समाजसेवी कमलेश सिंह को दी। लंबे समय से गंगा-यमुना की सफाई के मुद्दे को लेकर संघर्ष कर रहे कमलेश तत्काल संगम नोज पहुंचे। इसके बाद उन्होंने कमिश्नर, डीएम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी को इसकी सूचना दी। उन्होंने कमिश्नर और डीएम के कैंप कार्यालयों में भी शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि गंगा में कानपुर की टेनरियों से लगातार प्रदूषित पानी आ रहा है। उधर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी एसबी फ्रैंकलीन का कहना है कि सूचना मिलने के बाद संगम से गंगा जल का नमूना लिया गया है। इसकी रिपोर्ट आने में तीन दिन लगेंगे। बिना रिपोर्ट आए इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
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गंगा की गंदगी से डरे साइबेरियाई पक्षी

Polluted Ganga Water Turned Red

ठंड बढ़ने के साथ ही नवंबर के आखिरी सप्ताह तक यूपी के गजरौला में बृजघाट और उसके आसपास का इलाका साइबेरियाई पक्षियों के कलरव से गूंजने लगता था। पर इस बार ऐसा नहीं है। इसका प्रमुख कारण पर्यावरणीय असंतुलन और गंगा नदी में फैली गंदगी बताई जा रही है। वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी परिंदों को पर्याप्त भोजन और वातावरण नहीं मिल पा रहा है। जिसकी वजह से उनकी आमद में गिरावट हो रही है।

आमतौर पर नवंबर के आखिरी सप्ताह में सर्दी बढ़ने के साथ ही बृजघाट के आसपास साइबेरियन पक्षी दिखने लगते थे, लेकिन घाट के आसपास बढ़ता प्रदूषण उन्हें रास नहीं आ रहा है। पक्षी विशेषज्ञों की मानें तो दिसंबर की शुरुआत तक बिजनौर से लेकर नरौरा घाट तक के क्षेत्र में यह गंगा तट पर बसेरा बना लेते थे, लेकिन खत्म हो रहे जंगल और घाटों के आसपास कट रहे पेड़ों की वजह से इनके छिपने और रहने की जगह सिमट गई है।

पीपुल्स फॉर एनीमल के प्रदेश अध्यक्ष डा. रवींद्र कुमार शुक्ल के मुताबिक गंगा के आसपास प्रदूषण बढ़ने और गंगा में मछलियों के खत्म होने से साइबेरियन पक्षी इस ओर नहीं आ रहे हैं। प्रदूषण बढ़ने के कारण इस क्षेत्र से वन्य प्राणी दूर होते जा रहे हैं। यह न केवल उनके जीवन के लिए खतरा है। बल्कि हमारे जीवन के लिए भी खतरा है। साइबेरियाई पक्षी ऐसे कई कीट पतंगों को खाते हैं जो मनुष्य या उनकी फसलों के लिए घातक है। डीएफओ जीएस खुसारिया ने बताया कि प्रतिवर्ष करीब 10 हजार पक्षी भारत में प्रवास के लिए आते हैं। गंगा के आसपास बृजघाट क्षेत्र में ही करीब 500-1000 पक्षी प्रतिवर्ष आते थे, लेकिन लगातार उनका आना कम हो रहा है। यहां उनके मुताबिक पर्यावरण नहीं मिल रहा है।

प्रमुख कारण
गंगा में बढ़ता प्रदूषण और फैक्ट्रियों से निकला खतरनाक रसायनिक अपशिष्ट।
फैक्ट्रियों से निकलता जहरीला धुआं पर्यावरण को दूषित कर रहा है।
फसलों में प्रयोग होने वाले कीटनाशक।
जंगलों और पेड़ों का अंधाधुंध कटान।

ये भी जानिए-

साइबेरियन क्रेन साइबेरिया देश से प्रवास के लिए भारत आते हैं।
यह 8-12 डिग्री सेल्सियस तापमान में अपना जीवन यापन करते हैं।
यह अक्टूबर से फरवरी तक भारत के विभिन्न इलाकों में प्रवास करते हैं।
उत्तरी भारत के तराई में यह नवंबर से जनवरी के मध्य पाए जाते हैं।
छोटी मछलियां और कीड़े इनका भोजन हैं, जो यह नदियों की दलदली भूमि से निकालते हैं।

साइबेरियन क्रेन
साइबेरियन क्रेन सफेद रंग का साइबेरियाई पक्षी है। इसका वजन 4.9 किलोग्राम से 8.6 किलोग्राम तक होता है। इसकी लंबाई करीब 45-55 इंच होती है। इसके परों की लंबाई 83-91 इंच और चौड़ाई करीब 51 इंच होती है। यह अपनी लंबी चोंच से अपना भोजन तलाश करता है।

राल ड्रेन टूटी, यमुना में गिरा शहर का कचरा

Polluted Ganga Water Turned Red

औद्योगिक क्षेत्र सहित मथुरा शहर के करीब 50 प्रतिशत हिस्से की गंदगी बुधवार को एक बार फिर यमुना में समा गई है। राल ड्रेन टूटने के कारण सुबह मसानी नाले में एकत्रित कूड़ा और सिल्ट तेज बहाव के साथ यमुना में गिरा और पूरे दिन यही स्थिति रही। इससे यमुना जल में प्रदूषण की मात्रा बढ़ने और सर्दी के मौसम में जलचरों के जीवन पर संकट खड़ा हो गया है।

बता दें कि अब तक केवल सीवर का पानी यमुना में गिर रहा था। बुधवार को राल ड्रेन टूटने से मसानी नाले में एकत्रित सिल्ट और कूड़ा भी सीधे यमुना में समा गया। इससे घाट पर गंदगी और कूड़ा एकत्रित होने लगा। पानी से दुर्गंध आने लगी। विश्राम घाट पर नियमित स्नान करने वालों ने यमुना का यह हाल देख हिंदूवादी नेता गोपश्वरनाथ चतुर्वेदी को सूचना दी। उन्होंने मौके पर पहुंचकर स्थिति देखने के बाद सिंचाई अधिकारियों को अवगत कराया। अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि जल्द ही ड्रेन को नियंत्रित कर लिया जाएगा लेकिन पूरे दिन ड्रेन का पानी नाले की गंदगी के साथ सीधे यमुना में जाता रहा। ड्रेन के संचालन में नगर पालिका के ठेकेदारों की लापरवाही बताई गई है। इधर सर्दी के मौसम में आक्सीजन की कमी की समस्या झेलने वाले जलचरों के लिए जीवन का संकट पैदा होने की संभावना है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जल में प्रदूषण और बढ़ने से आक्सीजन का ग्राफ घट जाएगा।

एसटीपी संचालन में लापरवाही
यमुना कार्ययोजना के अंतर्गत स्थापित एसटीपी और एसपीएस के संचालन में पालिका के स्तर से घोर लापरवाही बरती जा रही है। संचालन पर डेढ़ करोड़ से अधिक खर्च होने के बाद भी अधिकांश पंपिंग स्टेशन ओवरफ्लो करते हैं। इससे नालों का पानी यमुना में जाता है। पालिका इस मामले में लापरवाह ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं करती है।

आगरा कैनाल के एक्सईएन अपर शिवकुमार सिंघल ने बताया कि ड्रेन में सिंचाई के लिए पानी आता है। कुछ ओवरफ्लो होने के कारण यह मसानी नाले में आ गया। सूचना मिलने के बाद इसे नियंत्रण कर दिया गया है।

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