आखिर संघ को क्यों झुकना पड़ा?
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भाजपा के अंदर चौतरफा विरोध को देखते हुए आखिरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नितिन गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाने के फैसले को बदलते हुए राजनाथ सिंह को आगे कर दिया।
भाजपा अध्यक्ष की नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से पहले खबरें चलीं कि आयकर विभाग ने नितिन गडकरी को नोटिस दिया है और 21 जनवरी को तलब किया है। फिर नामांकन से एक दिन पहले पूर्ती समूह में निवेश करने वाली कंपनियों के यहां मंगलवार को आयकर छापे की जो कार्रवाई हुई और जिस तरह मीडिया को पूरा कवरेज दिलाने की कोशिश हुई, उससे भी संघ पर काफी दबाव पड़ा।
गडकरी की उभरती गलत छवि
भाजपा और संघ का नेतृत्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ खड़ा जरूर था, पर देश भर में संघ को लेकर जो छवि बन रही थी, उससे संघ ने अपने कदम वापस खींच लिए। नितिन गडकरी को अध्यक्ष न बनाए जाने की स्थिति में संघ ने पहले भी राजनाथ सिंह का नाम सुझाया था, लेकिन भाजपा में आडवाणी कैंप तैयार नहीं था।
लेकिन जब गडकरी के पीछे संघ को खड़ा देखा तो भाजपा में सभी गुट राजनाथ सिंह के नाम पर तैयार हो गए। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को लेकर जनमानस में उभर रही गलत छवि के कारण संघ को भी अपने फैसले में बदलाव करना पड़ा।
भाजपा के नेता गडकरी के लिए विरोध में किस सीमा तक जा सकते हैं, इस बात का अंदाजा उसी दिन संघ के बड़े अधिकारियों को लग गया था जब दो बड़े नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने गडकरी का प्रस्तावक होने से मना कर दिया था।
राजनाथ पर आम सहमति के कारण
राजनाथ सिंह की राजनीति में उनकी खासियत कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति की है। भाजपा अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह के पहले कार्यकाल में पार्टी के सभी नेताओं को साथ लेकर चलने की उनकी कोशिश और कई राज्यों के चुनाव में सफलता उनके खाते में जाती है। इस वजह से भाजपा के अंदर आम सहमति के तौर पर राजनाथ सिंह नए अध्यक्ष के तौर पर उभरे।
भाजपा में गडकरी के दूसरे कार्यकाल को पार्टी के अंदर आडवाणी कैंप अपना दबदबा घटता हुआ मान रहा था। राजनाथ सिंह मजबूत नेता के तौर पर पार्टी की दिशा और दशा बदलने में संघ के लिए सहूलियत का काम करेंगे। संघ की पकड़ भी तभी ठीक ढंग से बनेंगी। यही वजह है कि संघ ने उनके नाम को आगे किया।
हिन्दुत्व विचारधारा के प्रति समर्पित नेता
चंदौली जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे राजनाथ सिंह का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है। अपने राजनीतिक करियर में उन्होंने यूपी और राष्ट्रीय राजनीति में कई उतार चढ़ाव देखें। राजनीति में उन्होंने लंबी पारी खेली है। यूपी के एक छोटे से गांव से निकलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनकर और फिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक का उनका सफर शानदार रहा है। राजनीति में उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति समर्पित नेता के तौर पर देखा जाता है।
चुनौतियों पर काबू
भाजपा में राजनाथ सिंह को दूसरा कार्यकाल देने के पीछे संघ की सोच यह है कि पार्टी तभी पटरी पर आ सकती है जब उसका वैचारिक आधार बना रहे। भाजपा वैचारिक तौर पर भटक गई है, इसलिए संघ को उसमें हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। गडकरी की जगह राजनाथ सिंह को लाकर संघ ने सभी चुनौतियों पर काबू पा लिया है।
अपने पिछले कार्यकाल के दौरान भी राजनाथ ने बीजेपी की पुरानी नीतियों को लागू करने की कोशिश की थी। अयोध्या में राम मंदिर, धारा-370 जैसे मुद्दों पर वो बीजेपी को वापस लाए थे। एक बार फिर से यही उम्मीद संघ को राजनाथ सिंह से जरूर होगी।
राजनाथ सिंह का सियासी सफर
- राजनाथ सिंह अभी यूपी के गाजियाबाद से सांसद हैं।
- 2005 से 2009 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।
- 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष।
- 1999 में एनडीए सरकार में सड़क परिवहन मंत्री।
- वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री बने।
- 2000-2002 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे।
- आरएसएस और जनता पार्टी में सक्रिय रहे।
- 1977 में मिर्जापुर से विधायक बने।
- उत्तर प्रदेश में भाजपा के यूथ विंग के अध्यक्ष रहे।
- 1988 में भाजपा यूथ विंग के राष्ट्रीय अध्यक्ष।
- 1991 में उत्तर प्रदेश की पहली भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री।
- 1994 में राज्यसभा पहुंचे।
- 1997 में यूपी में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष।