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लोकसभा चुनाव में लेफ्ट का भविष्य चौपट?

Wed, 26 Feb 2014 08:08 AM IST
Updated Wed, 26 Feb 2014 08:08 AM IST
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future of left parties in india

भारत में वामपंथी दल, दुनिया भर की साम्यवादी ताकतों में निस्संदेह सबसे बड़े हैं लेकिन 2014 के आम चुनाव में इन्हें काफी चुनौतियों का सामना करना होगा। यह चुनाव एक मायने में यह तय करेगा कि क्या वामपंथी दल वापसी कर पाएंगे या फिर उनकी स्थिति और बदतर होगी।

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वामपंथी दलों के सदस्यों की संख्या कम हो रही है, राजनीतिक प्रभाव कम हो रहा है और सांगठनिक तौर पर पार्टी के अंदर मतभेद भी बढ़ रहे हैं।

इस दौरान साल 2011 में वामपंथी दलों को पश्चिम बंगाल और केरल में अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होना वामपंथी राजनीति के लिए ज़्यादा बड़ा नुकसान साबित हुआ।

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दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी वाम पार्टी

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भारत में वामपंथी दलों का नेतृत्व मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के हाथों में है। यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी है। यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बाद दूसरे नंबर की वामपंथी पार्टी है। साल 2004 से 2009 के बीच लोकसभा में इसकी ताकत 60 फ़ीसदी कम हुई है।

भारत के पांचवें सबसे बड़े राज्य में वामपंथी दलों ने लगातार 34 साल तक शासन किया। लेकिन राज्य की सत्ता गंवाने के बाद उन्हें पंचायती चुनाव और नगर निगम के चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा।

यहां से वामपंथी दलों को और भी नुक़सान उठाना पड़ा तो भारतीय राजनीति और समाज पर इसके गंभीर परिणाम होंगे।

भारतीय राजनीति में भूमिका

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सोवियत संघ में वामपंथी दलों के विघटन के बाद दो दशक तक भारत में वामपंथी दलों की ताकत बढ़ी और उसे दुनिया भर की वामपंथी ताकतों के विघटन के बीच अपवाद के रूप में देखा जाता रहा है।

भारतीय राजनीति में वामपंथी दलों की अपनी भूमिका रही है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और क्षेत्रीय दलों से अलहदा। साल 2004 में वामपंथी दलों ने अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए लोकसभा में 61 सीटें जीतीं थीं।

गरीबों के उत्थान और सामाजिक बदलाव की राजनीति मसलन भूमि सुधार, विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देने वाली आर्थिक नीतियां और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने के मुद्दे पर वामपंथी दलों ने भारत की राजनीति पर हमेशा महत्वपूर्ण असर डाला है। बीते सात दशकों से इसने अपने सात से दस फ़ीसदी वोट शेयर की मदद से देश की नैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान में अहम भूमिका निभाई है।

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रास्ते से भटके वामपंथी

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वामपंथी दल नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के मुखर विरोधी रहे हैं। वामपंथी राजनीति करने वाले हमेशा से दमन करने वाली परंपराओं और चलन का विरोध करते हुए समझदारी, स्वतंत्रता और मुक्ति के पक्ष में खड़े रहे हैं।

वामपंथी दल हमेशा से हिंदुत्व आधारित सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकत्रित करने का काम भी करते रहे हैं। वे शांति की वकालत करते हुए परमाणु सशक्तिकरण का विरोध करते रहे हैं। इन सबके चलते वामपंथी दल हमेशा से प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को आकर्षित करते रहे हैं। लेकिन अब सब कुछ वैसा नहीं है। वामपंथी दल मौजूदा सत्ता के ढांचे को जमीनी स्तर पर लोगों को एकजुट करके चुनौती देने की स्थिति में नहीं है।

अतीत में ऐसी कोशिशें कामयाब हुई थीं और राज्यों में चुनावी सफलता भी मिली थी। लेकिन आज वे लोगों को सक्रिय करने के बजाए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन से अलग वैकल्पिक मंच खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। मगर वैकल्पिक योजनाओं के आधार पर तीसरे मोर्चे का गठन संभव नहीं दिख रहा है।

तीसरे मोर्चे में नहीं है एकजुटता

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चारों प्रमुख वामपंथी दल- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ग्यारह राजनीतिक दलों की एकजुटता में एक साथ शामिल हुए हैं।

इस समूह में क्षेत्रीय राजनीतिक दल एआईअन्नाडीएमके, समाजवादी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) और बीजू जनता दल (ये सभी राजनीतिक दल क्रमश: तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा में सत्ता में हैं) शामिल हैं। इसके अलावा जनता दल (सेक्यूलर), असम गण परिषद और झारखंड विकास मोर्चा भी इस समूह में शामिल हैं।

यह नया मोर्चा मंगलवार को होने वाली बैठक में अपना नाम और घोषणा पत्र तय कर सकता है। निश्चित तौर पर संख्या बल और राजनीतिक ताकत के हिसाब से यह मोर्चा उम्मीद जगाता है लेकिन विचारधारा और नीतियों को लेकर इसमें एकजुटता नहीं हैं। ना ही इस समूह के पास ऐसा कोई मुद्दा है जिससे अपने-अपने राज्यों में इन सबका प्रदर्शन बेहतर हो जाए।

ताकतवर नहीं रहे वाम दल

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संसद के पिछले सत्र में भी यह समूह एकजुटता नहीं दिखा पाया। तेलंगाना के अलग राज्य बनने के मुद्दे पर इनकी राय बंटी हुई थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में वैचारिक तौर पर बेहद कम अंतर होता है लेकिन लेकिन तेलंगाना के मुद्दे पर दोनों की राय अलग-अलग थी। दोनों आंध्र के अंदर लोकसभा चुनाव के दौरान अलग-अलग साझीदार तलाश सकते हैं।

हाल के कुछ चुनावी सर्वेक्षणों का अनुमान है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में वामपंथी दल क्षेत्रीय दलों के साथ समझौते और केरल में वापसी की संभावनाओं के बीच अपनी मौजूदा 24 सीटों की जगह 15-23 सीटें ही हासिल कर पाएंगे। एक ही सर्वेक्षण ने वामपंथी दलों को 27 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है।

ऐसे में तय है कि वामपंथी दल भारतीय चुनावी राजनीति में महज एक प्लेयर बन कर रह जाएंगे। हालांकि दस साल पहले केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का अस्तित्व वामपंथी दलों के बिना संभव नहीं था। वामपंथी दल तब राष्ट्रीय, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को प्रभावित करने की स्थिति में थे।

सामने सिर्फ चुनावी चुनौती नहीं

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वामपंथी दलों के सामने केवल चुनावी चुनौती नहीं है। बल्कि विचारधारा, कार्यक्रम और राजनीतिक रणनीति के लिहाज से भी वामपंथी दलों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

वामपंथी दलों ने अपनी योजनाओं को लंबे समय से अपडेट नहीं किया है, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बीते 14 साल से ऐसा नहीं किया है। वे लगातार नाकामी के बावजूद सोवियत और चीनी साम्यवादी मॉडल को ही अपनाते रहे हैं।

हालांकि अपनी सोच में वे आज भी खुद को जनआंदोलनों का अगुआ मानते हैं लेकिन किसी भी लोकप्रिय आंदोलन के दौरान मोर्चा नहीं बना पाते हैं चाहे वह भूमि अधिग्रहण का मुद्दा हो या फिर विस्थापन का मुद्दा है या फिर विनाशकारी औद्योगिक, खनन, सिंचाई और ऊर्जा परियोजनाओं के विरोध का मुद्दा हो।

नव उदारवादी नीतियों को दिया बढ़ावा

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वामपंथी दल जाति, धर्म और भारत के अंदर सामाजिक उत्पीड़न के मुद्दों को ठीक ढंग से उठा नहीं पाए हैं और ना ही उसे मार्क्स की वर्ग आधारित सिद्धांत से जोड़ पाए हैं। हाल में पार्टी ने पितृसत्ता और जेंडर के मुद्दों पर जरूर उन्होंने अपनी राय व्यक्त की है।

पारिस्थितिकी के मुद्दे पर भी वामपंथी दल कमज़ोर रहे हैं। प्रकृति, समाज, उत्पादन और खपत के आपसी संबंधों पर वामपंथी दल वैसा कोई मॉडल भी विकसित नहीं कर पाए जो सामाजिक तौर पर न्यायसंगत, जलवायु के अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ साबित हो।

हाल के सालों में वामपंथी दल अपनी पारंपरिक सोच से भी हटते नज़र आए हैं जिसमें वे भारत के आर्थिक विकास को देश के अंदर लगातार बढ़ रही आर्थिक असमानता से जोड़ा करते थे। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में सत्ता में रहने की स्थिति में वामपंथी दलों ने भी नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को ही बढ़ावा दिया।

अपने ही गढ़ में विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह

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वामपंथी ताकतों को अपने ही गढ़ पश्चिम बंगाल में साल 2006 से 2008 के दौरान सिंगुर और नंदीग्राम में जिस संघर्ष को देखना पड़ा, वह पीड़ादायक था। इन संघर्षों ने वामपंथी दलों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया और यह साल 2011 की हार की अहम वजह भी बना।

तीसरी दुनिया के सबसे बेहतर मानव विकास सूचकांक जैसी उपलब्धियों के बावजूद केरल में वामपंथी दलों में कलह और नीतियों को लेकर भ्रम देखने को मिला। वामपंथी दल अपनी ग़लतियों से सबक सीख सकते हैं, लेकिन पार्टी के केंद्रीय समूह को इसके लिए पार्टी के अंदर स्वतंत्र बहस, आलोचना और सिद्धांतों में सुधार को जगह देनी होगी।

जबतक वामपंथी दल अपनी वैचारिक स्थिति और नीतियों में बदलाव नहीं लाएंगे, जमीनी स्तर पर संघर्ष से नहीं जुड़ेंगे और नई राजनीतिक रणनीति नहीं बनाएंगे, तब तक इनका संकट से निकलना मुमकिन नहीं दिख रहा। ऐसा सोचना भी पीड़ा देने वाला है, लेकिन इसका कोई विकल्प भी तो नहीं है।

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