गजेंद्र पर घिरी सरकार, अनियमितताओं को उजागर करने में जुटा मंत्रालय
भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को लेकर विवाद में फंसा सूचना और प्रसारण मंत्रालय अब संस्थान की अनियमितताओं को उजागर करने में जुट गया है। मंत्रालय की रिपोर्ट की माने तो संस्थान पर पुराने छात्रों और प्रबंधन मंडल के सदस्यों ने कब्जा कर रखा है।
संस्थान के 55 साल के इतिहास में 39 बार हड़ताल हो चुकी हैं। कई वित्तीय अनियमितताएं सामने आ चुकी हैं और तीन साल से संस्थान में दाखिले नहीं हुए हैं।
2008 में दाखिला लेने वाले छात्र आज भी संस्थान में बने हुए हैं, जबकि तीन साल का पाठ्यक्रम होता है। नए छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पा रहा है।
मंत्रालय का कहना कि इन अनियमितताओं को ध्यान में रखकर ही एक पूर्णकालिक सदस्य को अध्यक्ष बनाने की जरूरत समझी गई थी। मंत्रालय की ओर से बताया जा रहा है कि संस्थान की लोकप्रियता में कमी आ रही है। संस्थान अब राजनीति का अड्डा बन गया है।
सरकार ने रखे तथ्य और आंकड़े
बाजार दर से बेहद कम हॉस्टल फीस को लेकर भी मंत्रालय सख्त है। मंत्रालय का कहना है कि हॉस्टल को लेकर तीन साल के पाठ्यक्रम के बाद कम फीस देनी पड़ती है और उसके बाद जो रहता है, उसे यह फीस भी देनी नहीं पड़ती।
मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार एफटीआईआई में पढ़ने वाले एक छात्र की पढ़ाई पर हर साल सरकार को दस लाख रुपये का खर्च उठाना पड़ता है। ज्यादातर छात्रों ने हॉस्टल फीस सालों से नहीं चुकाई है।
पंच वर्षीय योजना के तहत एफटीआईआई का पूरा ढांचागत खर्च 80 करोड़ है और जबकि हर साल गैर योजनाबद्ध खर्च 20 करोड़ रुपये रहता है। मगर छात्रों से फीस और हॉस्टल के किराये के तौर पर संस्थान को 25 फीसदी की वसूली होती है।
2010-11 में तो सिर्फ 11 फीसदी ही वसूली हो पाई थी। मंत्रालय यह तथ्य और आंकड़े पूर्व वित्त सचिव के पी गीताकृष्णन की अध्यक्षता में गठित कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर बता रहा है। यह कमेटी वर्ष 2000 में बनी थी।