फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   freedom fighter abdul hamid.

'असल उत्तर' के नायक हवलदार अब्दुल हमीद

Sat, 13 Sep 2014 10:50 AM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 13 Sep 2014 10:50 AM IST
विज्ञापन
freedom fighter abdul hamid.

एक दिन एक महिला भारत-पाकिस्तान सीमा पर आखिरी सैन्य छावनी फिरोजपुर के मॉल पर टहल रही थीं। उनकी नजर 4 ग्रेनेडियर के क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के पोस्टर पर पडी।

विज्ञापन


अब्दुल हमीद को 1965 की भारत-पाकिस्तान लडाई में खेमकरन सेक्टर में पाकिस्तान के कई पैटन टैंक नष्ट करने के लिए परमवीर चक्र मिला था। आश्चर्यजनक बात ये थी कि भारत के बहुत से लोगों को अब्दुल हमीद के कारनामों के बारे में कोई अंदाजा ही नहीं था।
विज्ञापन


उस महिला का नाम है रचना बिष्ट रावत। उन्होंने मन ही मन कहा- ''अब्दुल हमीद, मैं एक दिन तुम्हारी कहानी सारी दुनिया को सुनाउंगी'' और इस तरह एक किताब का जन्म हुआ 'द ब्रेव परमवीर स्टोरीज'।
विज्ञापन
विज्ञापन


अब्दुल हमीद पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहुत ही साधारण परिवार से आते थे लेकिन इसके बावजूद जब उन्हें मौका मिला उन्होंने वीरता और साहस की असाधारण मिसाल कायम की।

अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी 85 वर्ष की हैं लेकिन अब वो सुन नहीं सकतीं हैं। रेहान फजल उनसे, उनके दूसरे परिवारजनों और रचना बिष्ट रावत से बात करने के बाद अब्दुल हमीद के व्यक्तित्व और जीवट पर नजर डाल रहे हैं।

अब्दुल हमीद के बेटे की जुबानी

freedom fighter abdul hamid.

1965 का युद्ध शुरू होने के आसार बन रहे थे। कंपनी क्वार्टर मास्टर अब्दुल हमीद गाजीपुर जिले के अपने गांव धामूपुर आए हुए थे। अचानक उन्हें वापस ड्यूटी पर आने का आदेश मिला।

उनकी पत्नी रसूलन बीबी ने उन्हें कुछ दिन और रोकने की कोशिश की लेकिन हमीद मुस्कराते हुए बोले- देश के लिए उन्हें जाना ही होगा।

अब्दुल हमीद के बेटे जुनैद आलम बताते हैं कि जब वो अपने बिस्तरबंद को बांधने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनकी रस्सी टूट गई और सारा सामान जमीन पर फैल गया।

उसमें रसूलन बीबी का लाया हुआ मफलर भी था जो वो उनके लिए एक मेले से लाईं थीं। रसूलन ने कहा कि ये अपशगुन है। इसलिए वो कम से कम उस दिन यात्रा न करें, लेकिन हमीद ने उनकी एक नहीं सुनी।

'द ब्रेव परमवीर स्टोरीज' की लेखिका रचना बिष्ट रावत कहती हैं, ''इतना ही नहीं जब वो स्टेशन जा रहे थे तो उनकी साइकिल की चेन टूट गई और उनके साथ जा रहे उनके दोस्त ने भी उन्हें नहीं जाने की सलाह दी। लेकिन हमीद ने उनकी भी बात नहीं सुनी।''

जब वो स्टेशन पहुंचे, उनकी ट्रेन भी छूट गई थी। उन्होंने अपने साथ गए सभी लोगों को वापस घर भेजा और देर रात जाने वाली ट्रेन से पंजाब के लिए रवाना हुए। ये उनकी और उनके परिवार वालों और दोस्तों के बीच आखिरी मुलाकात थी।

चार पैटन टैंकों को निशाना बनाया

freedom fighter abdul hamid.

8 सितंबर 1965, समय सुबह के 9 बजे। जगह चीमा गांव का बाहरी इलाका। गन्ने के खेतों के बीच अब्दुल हमीद जीप में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठे हुए थे। अचानक उन्हें दूर आते टैंकों की आवाज सुनाई दी।

थोडी देर में उन्हें वो टैंक दिखाई भी देने लगे। उन्होंने टैकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतजार किया, गन्ने की फसल का कवर लिया और जैसे ही टैंक उनकी आरसीएल की रेंज में आए, फायर कर दिया।

पैटन टैंक धू-धू कर जलने लगा और उसमें सवार पाकिस्तानी सैनिक उसे छोडकर पीछे की ओर भागे। अब्दुल हमीद के पौत्र जमील आलम बताते हैं, ''मैं अपनी दादी के साथ सीमा पर उस जगह गया जहाँ मेरे दादा की मजार है।''

उनकी रेजिमेंट वहाँ हर साल उनके शहादत दिवस पर समारोह आयोजित करती है। वहाँ उनकी एक ऐसे सैनिक से मुलाकात हुई थी जिसका लडाई में हाथ कट गया था। उसने उन्हें बताया था कि अब्दुल हमीद ने उस दिन एक के बाद एक चार पैटन टैंक धराशाई किए थे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बडी टैंक लड़ाई

freedom fighter abdul hamid.

इस लड़ाई को 'असल उत्तर' की लडाई कहा जाता है। रचना बिष्ट रावत कहतीं हैं कि ये जवाब था पाकिस्तान को उनके टैंक आक्रमण का। उनके परमवीर चक्र के आधिकारिक साइटेशन में बताया गया था कि उन्होंने चार पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया था।

हरबख्श सिंह भी अपनी किताब 'वॉर डिस्पेचेज' में लिखते हैं कि हमीद ने चार टैंकों को अपना निशाना बनाया था लेकिन मेजर जनरल इयान कारडोजो ने अपनी किताब में लिखा है कि हमीद को परमवीर चक्र देने की सिफारिश भेजे जाने के बाद अगले दिन उन्होंने तीन और पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए।

जब वो एक और टैंक को अपना निशाना बना रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी टैंक की नजर में आ गए। दोनों ने एक-दूसरे पर एक साथ फायर किया। वो टैंक भी नष्ट हुआ और अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड गए।

इस लडाई में पाकिस्तान की ओर से 300 पैटन और चेफीज टैंकों ने भाग लिया था जबकि भारत की और से 140 सेंचूरियन और शर्मन टैंक मैदान में थे।

कुश्ती के शौकीन अब्दुल हमीद

freedom fighter abdul hamid.

अब्दुल हमीद का पुश्तैनी पेशा दर्जी का था लेकिन इस काम में उनका मन नहीं लगता था। उनके बेटे जुनैद आलम कहते हैं कि वो शुरू से ही सेना में भर्ती होना चाहते थे। जब गाजीपुर में सेना भर्ती का कैंप लगा तो हमीद भी सेना में भर्ती हो गए।

उन्हें 4 ग्रेनेडियर के जबलपुर केंद्र भेजा गया। साल 1962 में चीन के खिलाफ लडाई में भी उन्होंने भाग लिया। उनके पौत्र जमील आलम बताते हैं कि अब्दुल हमीद का कद छह फुट तीन इंच था।

उनका निशाना भी गजब का था। शुरू से ही उन्हें कुश्ती लडने का शौक था। वो न सिर्फ कुश्ती लडते थे बल्कि बच्चों को कुश्ती सिखाते भी थे।

अब्दुल हमीद की मौत और भारत का सबसे बडा वीरता पुरस्कार पाने की खबर उनके परिवार को रेडियो से मिली। उनकी पत्नी रसूलन बीबी इस समय 85 साल की है।

वो अब ठीक से सुन नहीं सकतीं। लेकिन वो दिन अभी तक नहीं भूली हैं जब राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अब्दुल हमीद का जीता हुआ परमवीर चक्र उनके हाथों में दिया था।

रसूलन कहती हैं, ''मुझे बहुत दुख हुआ लेकिन खुशी भी हुई, हमारा आदमी इतना नाम करके इस दुनिया से गया। दुनिया में बहुत से लोग मरते हैं, लेकिन उनका नाम नहीं होता लेकिन हमारे आदमी ने शहीद होकर न सिर्फ अपना बल्कि हमारा नाम भी दुनिया में फैला दिया।''

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed