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पार्टियों के मुफ्त उपहार के वादे पर कोर्ट का हथौड़ा

Sat, 06 Jul 2013 12:16 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Sat, 06 Jul 2013 12:16 AM IST
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freebies promised by parties vitiate election process says supreme court

चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की ओर से जनता को मुफ्त उपहार देने का वादा किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है।

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कोर्ट ने ऐसे वादे करने वाले राजनीतिक दलों को आड़े हाथों लेते हुए चुनाव आयोग से कहा है कि वह चुनाव घोषणा पत्रों के नियमन के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे।

सर्वोच्च अदालत का मानना है कि चुनाव घोषणा पत्रों में मुफ्त उपहार देने के वादों से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद हिल जाती है। दलों की यह कारगुजारी चुनावी प्रक्रिया को दूषित करती है।
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जस्टिस पी. सदाशिवम व जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने कहा है कि भले ही चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वादों को जनप्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम की धारा 123 के तहत भ्रष्टाचार की गतिविधि में नहीं रखा जा सकता, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि हर कोई इससे प्रभावित होता है। ऐसे वादों से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद हिल जाती है।
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सर्वोच्च अदालत ने कहा कि सीधे तौर पर चुनाव घोषणा पत्रों की सामग्री निर्धारित करने का कोई नियम नहीं है। ऐसे में हम चुनाव आयोग को निदेश देते है कि वह इस संबंध में सभी मान्यता प्राप्त दलों से विचार-विमर्श कर दिशा-निर्देश तैयार करे।

साथ ही पीठ ने कहा कि दलों की ओर से जारी किए जाने वाले चुनाव घोषणा पत्रों को आदर्श आचार संहिता में शामिल किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर व्यापक हो सकता है और राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त लैपटॉप, टीवी, मिक्सर-ग्राइंडर, बिजली के पंखे, चार ग्राम सोना और मुफ्त अनाज देने जैसे वादे किए जाने पर रोक लग सकती है।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि चुनाव घोषणा पत्र चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले प्रकाशित होते हैं। ऐसे में आयोग इसे अपवाद के रूप में आचार संहिता के दायरे में ला सकता है।

इस मुद्दे पर अलग से संसद में कानून बनाया जाना चाहिए, क्योंकि मुफ्त उपहार देने के राजनीतिक दलों के वादों से चुनाव प्रक्रिया दूषित होती है। इसके साथ ही पीठ ने चुनाव आयोग को इस संबंध में (दिशा-निर्देश तैयार करने) तत्काल कदम उठाने का निर्देश जारी कर दिया।

साथ ही शीर्ष अदालत ने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए अन्नाद्रमुक सरकार की ओर से मुफ्त घरेलू चीजें बांटने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है, क्योंकि मौजूदा कानून के तहत घोषणा पत्र में मुफ्त उपहार देने का वादा करना भ्रष्टाचार की गतिविधि में नहीं आता।

इस मसले में अधिवक्ता एस. सुब्रमण्यम बालाजी ने याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की लोक लुभावन घोषणाएं न सिर्फ असंवैधानिक हैं, बल्कि इससे सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है।

बालाजी ने तर्क दिया था कि तमिलनाडु सरकार की मुफ्त उपहारों की पेशकश मतदाताओं को रिश्वत देने के बराबर है। यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की संविधान की भावना के खिलाफ है।

कैसे-कैसे वादे--

कांग्रेस:
- ग्रामीण और शहरी गरीबों को किफायती दर पर कपड़े और आवास मुहैया कराएंगे। (गुजरात विस चुनाव 2012)

भाजपा:
- गरीबों को एक रुपये किलो चावल, 25 पैसे किलो नमक। (झारखंड विधानसभा चुनाव 2009)
- 50 लाख घर देने का वादा। (गुजरात विधानसभा चुनाव 2012)
- इंडक्शन हीटर, 10 लाख युवाओं को रोजगार। (हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2012)
- गरीब परिवारों को एक रुपये किलो की दर से 25 किलो चावल, ग्रेजुएट छात्रों को लैपटॉप (कर्नाटक विस चुनाव 2013)

समाजवादी पार्टी:

- युवाओं को 12वीं पास करने पर मुफ्त में लैपटॉप (यूपी विधानसभा चुनाव 2012)

डीएमके:
- छात्रों को मुफ्त लैपटॉप, वरिष्ठ लोगों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा, महिलाओं को मुफ्त मिक्सर और ग्राइंडर। (तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2011)
- मुफ्त रंगीन टीवी सेट। (तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2006)

एआईएडीएमके:
- राशन कार्ड धारकों के लिए 20 किलो मुफ्त चावल, कॉलेज छात्रों को मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त मिक्सर और ग्रांइडर के अलावा पंखा भी, गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को मिनरल वॉटर, गरीबों को मंगलसूत्र के लिए चार ग्राम सोना मुफ्त, 6,000 ग्रामीण परिवारों में 60,000 गायें। (तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2011)


शिरोमणि अकाली दल:
- किसानों को मुफ्त बिजली और पानी, कृषि ऋण माफ किया जाएगा, गरीब परिवारों को चार रुपये प्रति किलो आटा तथा 20 रुपये प्रति किलो दाल। (पंजाब विधानसभा चुनाव 2012)

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