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आजमगढ़ के इस मदरसे से पढ़कर गए, बने ओबामा के सलाहकार

Fri, 23 Jan 2015 08:56 AM IST
भारतेंदु मिश्र, अबुल बशर/अमर उजाला, सरायमीर (आजमगढ़)
भारतेंदु मिश्र, अबुल बशर/अमर उजाला, सरायमीर (आजमगढ़) Updated Fri, 23 Jan 2015 08:56 AM IST
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frank islam of azamgarh.

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार और जान एफ. कैनेडी सेंटर फार परफार्मिंग आर्ट्स के बोर्ड आफ ट्रस्टीज के जनरल ट्रस्टी अप्रवासी भारतीय फैंक फखरुल इस्लाम आजमगढ़ क्षेत्र के अपने पैतृक गांव कौरा गहनी को शिद्दत से याद करते हैं। बचपन में दोस्तों के साथ की गईं शरारतें, पानी भरे धान के खेतों में पतंग के पीछे दौड़ना उन्हें आज भी याद है। मदरसा 'इसरार' में पढ़े दिन उन्हें अच्छी तरह याद हैं, जिसमें उन्होंने कक्षा पांच तक शिक्षा पाई। आज भी उनकी इच्छा होती है कि वे अपने गांव आकर बच्चा बनकर उन्हीं दोस्तों के साथ धान के खेत में पतंग लूटने के लिए दौड़ें। 'अमर उजाला' से ई-मेल के जरिये बातचीत में उन्होंने अपनी स्मृतियां साझा कीं।

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हाल में प्रतिष्ठित मार्टिन लूथर किंग जूनियर पुरस्कार से सम्मानित फ्रैंक इस्लाम 30 जनवरी को अपने जिले आजमगढ़ आ रहे हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि मदरसा इसरार से मिली सीख ने मेरी जिंदगी की बुनियाद को मजबूती दी। उसी की बदौलत एक मध्यमवर्गीय, धार्मिक परिवार का युवक अमेरिका के आभिजात्य वर्ग में सम्मानजनक जगह बना सका। कहा कि मेरे मदरसे ने मुझे सहनशीलता और दूसरे धर्मों को बराबर का सम्मान देना सिखाया। वह कहते हैं कि मुझे वह दिन नहीं भूलता जब गांव में मेरे पिता ने मुझे मोटरसाइकिल चलाना सिखाया था।
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उन्होंने ही मुझे धान के पानी भरे खेत में कैसे दौड़कर पतंग लूटी जाती है, यह बताया। वह कहते हैं कि मुझे अपने दोस्तों के साथ बिताए वे दिन नहीं भूलते जब सुबह तड़के मैं गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर मार्टिनगंज स्थित विद्यालय में परीक्षा देने जाता था।
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बहुत तेज था वह पढ़ने में: खालिदा

frank islam of azamgarh.

फ्रैंक के साथ कक्षा पांच तक पढ़ीं कौरा गहनी गांव की ही रहने वाली खालिदा (65) बचपन को याद करते हुए कहती हैं कि फखरुल पढ़ने में बहुत तेज था। हम चार लड़कियों और दो लड़कों (फखरुल और अबू साफे) की टोली थी, जो जमकर शरारतें करती थी। हम सभी फखरुल की तारीफ करते थे। हम चार लड़कियों में से दो की मौत हो गई। जबकि एक की शादी पाकिस्तान में हुई है। हमारी टोली का दूसरा लड़का अबू साफे अंबारी में किराना की दूकान चलाता है। मैं अल्लाह से दुआ करती हूं कि वह फखरुल को बरकत बख्शें।

हमारे ऊपर मिट्टी फेंकता था फखरुल: साफे
फ्रैंक के दूसरे मित्र अबू शाफे (62) कहते हैं कि फखरुल को मिट्टी से बहुत प्यार था। स्कूल से लौटते वक्त पूरे रास्ते वह हम लोगों पर मिट्टी फेंकता रहता था। जब हम मारने के लिए दौड़ाते थे, तो वह भागता था। इसी भागदौड़ में हम लोग घर पहुंच जाते थे। मुझे वह दिन भी नहीं भूलता जब हम लोगों का कक्षा पांच का परीक्षा केंद्र सुरहन (मार्टिनगंज) गया था। उन दिनों हमारी मित्रता से दूसरे लोग रश्क करते थे।

गांव में खोलूंगा टेक्निकल स्कूल: फ्रैंक
फ्रैंक इस्लाम का कहना है कि ऊंची सोच रखकर कड़ी मेहनत करने वालों के सपने जरूर पूरे होते हैं। मेरे क्षेत्र के विकास के लिए सबसे जरूरी चीज है शिक्षा। इसके लिए मैं अपनी मां की स्मृति में एक टेक्निकल स्कूल की स्थापना करने जा रहा हूं। ताकि गांव के बच्चों को एक अच्छा माहौल मिले और वे अपने सपनों को पूरा कर सकें।

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