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संघ ने बढ़ाया दबाव, कश्मीर में ताक पर न रखी जाएं नीतियां

Tue, 09 Feb 2016 05:55 AM IST
Updated Tue, 09 Feb 2016 05:55 AM IST
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formation of new governement in jammu and kashmir

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार गठन के लिए भाजपा किसी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है। पार्टी पर संघ का दबाव भी बढ़ा है, जिसने नीतियों को ताक पर नहीं रखने की नसीहत दी है। दूसरी ओर पूर्व उप मुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग और पूर्व वित्त मंत्री डॉ. हसीब द्राबू के अघोषित टकराव में पीडीपी की नीतियां उलझ गईं हैं।

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भाजपा के साथ गठबंधन में द्राबू ने अहम भूमिका निभाई थी। द्राबू अब भी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के पक्ष में हैं लेकिन बदली परिस्थितियों में हाशिए पर पड़े बेग का महत्व बढ़ जाने के बाद पीडीपी के स्टैंड में भी बदलाव दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक संघ ने भाजपा नेतृत्व से कहा है कि तात्कालिक फायदे के लिए दीर्घकालिक नुकसान उठाना ठीक नहीं होगा।
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पिछली बार सरकार गठन के लिए अनुच्छेद 370 का मुद्दा ठंडे बस्ते में डाला गया था। भाजपा को गठबंधन एजेंडे पर नए सिरे से प्रतिबद्धता जाहिर करने से गुरेज नहीं है लेकिन नई शर्तें नहीं मानने की सियासी विवशता भी है। अलगाववादियों के प्रति नरम रुख भाजपा को उत्तर प्रदेश के चुनाव में नुकसान पहुंचा सकता है। नतीजतन विश्वास बहाली के उपायों के तहत पीडीपी को केंद्र सरकार से जिस तरह की पहल की उम्मीद है, वह संभव नहीं दिखता।
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पीडीपी की अंदरूनी खीचतान सतह पर आने लगी

formation of new governement in jammu and kashmir

उधर मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के चालीस दिन का शोक पूरा होने में अभी एक सप्ताह बाकी है और पीडीपी की अंदरूनी खींचतान सतह पर आने लगी है। दरअसल मुफ्ती के निधन के बाद पीडीपी को अपनी घटती लोकप्रियता का अहसास हुआ। मुफ्ती के निधन के बाद उनके गृह इलाके बिजबिहेड़ा में मातमी जुलूस में लोगों की शिरकत कम रही थी।

पीडीपी को महसूस हुआ कि दक्षिणी कश्मीर के जनाधार वाले इलाके उसके हाथ से निकल सकते हैं। इसलिए केंद्र के सामने नई शर्तें रखने की रणनीति तय हुई। पूर्व उप मुख्यमंत्री बेग शुरू से भाजपा के साथ गठबंधन के विरोध में रहे हैं। बदली परिस्थिति में उनकी सियासत को महबूबा का भी अपरोक्ष समर्थन मिलने लगा। इस क्रम में द्राबू की सलाह को कम अहमियत मिलने के संकेत हैं।

वैसे दोनों ही दल मध्यावधि चुनाव का जोखिम नहीं लेना चाहते। चुनाव की स्थिति में दोनों को भारी नुकसान का खतरा है। यही डर दोनों दलों को फिर से मिलकर सरकार बनाने के लिए जमीन तैयार कर रहा है। पीडीपी केंद्र सरकार से विश्वास बहाली के उपायों के तहत कुछ उदार घोषणाएं चाहती हैं लेकिन भाजपा फूंक-फूंक कर कदम उठाने की रणनीति पर चल रही है। पिछली बार मसर्रत आलम की रिहाई के बाद उत्पन्न स्थिति का दृष्टांत सामने है, लिहाजा भाजपा बीच का रास्ता तलाश रही है।

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