मोदी सरकार को क्यों कहना पड़ा-हर हर जयशंकर?
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मोदी सरकार ने एस जयशंकर को रिटायरमेंट के महज तीन दिन पहले विदेश सचिव नियुक्त किया। लगभग छह महीने का कार्यकाल शेष रहने के बाद भी सुजाता सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। नौकरशाही में इतने बड़े फेरबदल की नजीर हालिया सालों में नहीं देखी गई।
जानकारों का कहना है कि इससे पहले ऐसा फेरबदल राजीव गांधी के जमाने में किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उस समय विदेश सचिव एपी वेंकटेश्वरन को हटा दिया था। हालांकि उस फैसले पर बहुत ही विवाद हुआ, राजीव को आईएफएस लॉबी के विरोध का सामना भी करना पड़ा।
एस जयशंकर 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हो रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार्दिक इच्छा थी कि उन्हें विदेश सचिव बनाया जाए। जयशंकर अगर रिटायर हो जाते तो उन्हें विदेश सचिव बनाना संभव न होता। यही कारण था कि सरकार ने एक अप्रत्याशित फैसले के तहत सुजाता सिंह का इस्तीफा ले लिया, जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त कर दिया।
विदेश सचिव बनने के बाद जयशंकर को दो साल का अतिरिक्त कार्यकाल भी मिल गया। आखिर जयशंकर में ऐसी क्या खूबी है कि सरकार ने उन्हें विदेश सचिव बनाया, पढ़िए आगे-
अमेरिका और रूस में जयशंकर का तगड़ा नेटवर्क
1977 बैच के आईएफएस अधिकारी एस जयशंकर की भारत और अमेरिका के बीच हुए परमाणु समझौते में अहम भूमिका रही है। जयशंकर भारत के ऐसे राजनयिक हैं, जिन्हें चीन, अमेरिका और रूस तीनों ही मुल्कों में काम करने का अनुभव है।
जयशंकर को नियुक्त कर केंद्र सरकार बराक ओबामा की यात्रा के बाद चीन से संबंधों में आई कड़वाहट को भी खत्म करना चाहती है। माना जा रहा है जयशंकर अमेरिका और चीन, दोनों ही मुल्कों से भारत के संबंधों को संतुलित कर सकते हैं।
जयशंकर का अमेरिका और रूस में तगड़ा नेटवर्क भी है। पिछले साल हुई प्रधानमंत्री बराक ओबामा की अमेरिका यात्रा और इसी हफ्ते खत्म ह़ई अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा को सफल बनाने में भी जयशंकर की अहम भूमिका रही है।
चीन के साथ संबंधों को संतुलित करने में होगा रोल
जयशंकर की विदेश में पहली नियुक्ति रूस में हुई थी, जहां उन्होंने 1979 से 1981 तक भारतीय दूतावास में द्वितीय, तृतीय सचिव (राजनीतिक) के रूप में कार्य किया था। 1981 से 1985 तक जयशंकर ने अमेरिका में अंडर सेक्रेटरी बतौर और विदेश मंत्रालय में पॉलिसी प्लानिंग के लिए काम किया।
1985 से 1988 तक उन्होंने अमेरिका स्थिति भारतीय दूतावास में राजनीतिक मामलों की जिम्मेदारी संभाली थी। वह श्रीलंका में भेजे गए इंडियन पीस कीपिंग फोर्सेज के राजनीतिक सलाहकार भी रह चुके हैं।
1990 में जयशंकर बुडापेस्ट में कॉमर्शियल काउंसलर नियुक्त किए गए थे। बाद के सालों में जयशंकर ने जापान और चेक गणराज्य में भी अपनी सेवाएं दी। 2007 में वह सिंगापुर में उच्चायुक्त नियुक्त किए गए थे। 2009 से 2013 तक जयशंकर चीन में भारत के राजदूत रहे।
मनमोहन भी थे जयशंकर के मुरीद
जयशंकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमफिल और पीचडी किया है। कूटनीतिक मामलों में जयशंकर की दक्षता के मुरीद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि जयशंकर यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान पिछले साल भी विदेश सचिव की दौड़ में सबसे आगे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी वह पहली पसंद थे लेकिन कांग्रेस हाईकमान के साथ सुजाता के पिता की नजदीकी के कारण उस वक्त उन्हें मायूस होना पड़ा था।
सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार जयशंकर को विदेश सचिव बनाना चाह रहे थे। प्रधानमंत्री ने जयशंकर के सामने विदेश नीति पैनल का मुखिया बनने का भी प्रस्ताव रखा था लेकिन इसे उन्होंने ठुकरा दिया था। इसके बाद प्रधानमंत्री जयशंकर को विदेश सचिव बनाने की फिराक में थे।