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श्रीनगर की सड़क पर बिलखती वो औरत

Tue, 16 Sep 2014 09:16 AM IST
फैसल मोहम्मद अली/बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
फैसल मोहम्मद अली/बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर Updated Tue, 16 Sep 2014 09:16 AM IST
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flood crisis in jammu and kashmir.

पुराने शहर की भीड़ में खड़ी वह औरत। न जाने ऐसा क्या हुआ कि उनके सब्र का बांध टूट गया।

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आंसू आंखों से लगातार बह रहे थे, तेज होती हिचकियों के बीच वह कुछ कह रही थीं लेकिन मैं बस 'मोहताज' और 'खुदा के लिए मदद' जैसे लफ्ज सिसकियां मिली उनकी बोली में किसी तरह समझ पाया।

उनकी जबान नहीं समझ सकता था मैं, लेकिन किसी के सामने हाथ फैलाने की वो शर्म जो उनके चेहरे पर साफ झलक गई थी, उसे महसूस कर एक बार ऐसा लगा कि उन्हें गले से लगाकर कहूं कि सब ठीक हो जाएगा।
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या कम से कम उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें सांत्वना तो दूं ही। लेकिन मर्यादाएं आडे थीं।

दिलशाद, अपना नाम उन्होंने बाद में पूछने पर बताया, किसी सभ्य परिवार की महिला थी और जिंदगी में शायद ही किसी से कभी कुछ मांगा होगा, कम से कम किसी अंजान व्यक्ति से तो नहीं।
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मजबूरी और हालात इंसान से क्या नहीं करवा देते।

बिखर गया आशियाना

flood crisis in jammu and kashmir.

जिस दिन उफनते झेलम का पानी अपने किनारों को तोडता श्रीनगर शहर में घुसा दिलशाद अपने शौहर और दो बच्चों के साथ घर में बैठी थीं।

उनकी आंखों के सामने घर का एक हिस्सा ढह गया और घर का सारा सामान पानी के तेज रेले में दूर और दूर होता चला गया, अभी संभलने का मौका भी न मिला था कि कुछ ही क्षणों में दूसरा हिस्सा भी तिनकों की तरह बिखरने लगा।

दिलशाद और उनके दो बच्चे बाढ के तेज पानी में डूबते उतराते बहने लगे और तेज पानी उन्हें काफी दूर ले गया। मगर शायद जिंदगी की सांसें अभी बाकी थीं कुछ लोगों ने इन सबको निकाल लिया।

वो कई दिनों की मशक्कत के बाद अपने इलाके में तो पहुंच गई हैं लेकिन अब उनकी और परिवार की रातें कभी मस्जिद में और कभी किसी पडोसी के घर के किसी कोने में बीत रही हैं। और दिन अक्सर सडक के किनारे।

उनके पास कोई जवाब नहीं

flood crisis in jammu and kashmir.

जवान बेटी को उन्होंने किसी रिश्तेदार के घर रख छोड़ा है, कहती हैं उसे कैसे अपने साथ सड़कों पर लिए लिए फिरूं और 'उसकी इज्जत बचाती फिरूं।'

लेकिन उसकी फिक्र उन्हें हर वक्त सालती रहती है।

कहती हैं कि मेरे शौहर को सालों से कैंसर है और गुजारे के लिए जो दुकान खोली थी वो बह गई 'अब मैं क्या करूंगी, इन हालात से कैसे लडूंगी।'

इन सवालों का कोई जवाब नहीं था मेरे पास। मैं उनकी तरफ पानी की बोतल बढाता हूं और उन्हें खुदा हाफिज कहके सिर झुकाए आगे की तरफ बढ जाता हूं।

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