एक साल बाद, मोदी सरकार के सामने अब भी हैं ये पांच चुनौतियां
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रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि पिछले वर्ष जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तो उससे काफी उम्मीदें पाल ली गई थीं, जोकि संभवतः अव्यवहारिक या अवास्तविक थीं। वह यह भी कहते हैं कि सरकार ने निवेश के लायक माहौल बनाया है और वह निवेशकों की चिंता के प्रति संवेदनशील है।
लेकिन बात सिर्फ निवेशकों और बाजार की नहीं है, पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और खुद मोदी ने जैसा माहौल बनाया था, उसमें लोगों की सरकार से अपेक्षाएं काफी बढ़ गईं। सितंबर, 2013 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने करीब तीन लाख किमी का हवाई और जमीनी सफर तय कर 450 से भी अधिक रैलियां कर डालीं और लोगों से 'अच्छे दिन' लाने का वायदा किया।
लेकिन एक वर्ष बाद हम देख सकते हैं कि मोदी सरकार के समक्ष किस तरह की चुनौतियां हैं। इनमें से कुछ उसे पिछली सरकारों से विरासत में मिली हैं, तो कुछ मोदी की अगुआई में मिली चुनावी जीत में हिंदुत्व की जीत देख रहे संघ परिवार की पैदा की हुई हैं और कुछ मोदी की अपनी छवि और चुनाव के समय बढ़-चढ़ कर किए गए दावों से उपजी हैं। ऐसी ही पांच चुनौतियों पर एक नजर।
क्या हथियार डालेंगे माओवादी?
पूर्व प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह ने माओवादी हिंसा को देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा
खतरा बताया था। मोदी सरकार के गठन के एक वर्ष बाद कुछ खास बदलाव नहीं
दिखता। मई के पहले हफ्ते में जब प्रधानमंत्री मोदी दंतेवाड़ा में थे, ठीक
उसी दिन वहां से महज 60 किमी दूर माओवादियों ने करीब तीन सौ लोगों को कई
घंटों तक बंधक बनाए रखा। 'जन अदालत' में उन्होंने एक आदिवासी की हत्या तक
कर दी!
छत्तीसगढ़ में पिछले तेरह वर्षों से रमन सिंह की अगुआई में
भाजपा की सरकार है। यदि दो रुपये किलो चावल वाली योजना को रमन सरकार की
सबसे बड़ी सफलता माना गया है, तो माओवादी हिंसा उनकी सबसे बड़ी विफलता है।
छत्तीसगढ़ में खासतौर से बस्तर में हजारों करोड़ के निवेश की बातें कई
वर्षों से हो रही हैं, कुछ परियोजनाएं शुरू भी की गई हैं, लेकिन उसके साथ
ही माओवादियों के कब्जे वाले क्षेत्र भी बढ़े हैं। यही नहीं, देश में
छत्तीसगढ़ में अर्ध सैनिक और पुलिस बलों की सबसे बड़ी तैनाती भी की गई है।
क्या
यह महज संयोग है कि प्रधानमंत्री के दंतेवाड़ा प्रवास के दौरान बस्तर में
24 हजार करोड़ रुपयों के निवेश की घोषणा से ठीक पहले महेंद्र कर्मा के
पुत्र छबीन्द्र कर्मा ने जनजागृति अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। इस
अभियान को सलवा जुड़ूम 2.0 बताया जा रहा है।
2005 में शुरू किए गए
इस विवादास्पद अभियान को सर्वोच्च अदालत के हस्तक्षेप के बाद रोकना पड़ा
था। इंदिरा गांधी के बाद दंतेवाड़ा पहुंचने वाले पहले प्रधानमंत्री मोदी ने
माओवादियों से हिंसा छोड़ने की अपील की है। इसका कितना असर होगा, यह देखना
अभी बाकी है। सच यह है कि मोदी सरकार अब तक माओवादी हिंसा को रोकने के लिए
कोई रोडमैप पेश नहीं कर सकी है।
गरीबी और कुपोषण से कैसे निपटेंगे
यूपीए सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल के दौरान गरीबी की परिभाषा मजाक बनकर ही रह गई थी। सुरेश तेंदुलकर कमेटी, सक्सेना कमेटी और योजना आयोग ने अपने-अपने ढंग से गरीबी को परिभाषित किया था। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन की अपनी परिभाषाएं हैं। मगर, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भी गरीबी की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
मोदी सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में रंगराजन कमेटी ने शहरी क्षेत्र में 47 रुपये से कम और ग्रामीण क्षेत्र में 32 रुपये से कम खर्च करने की क्षमता को गरीबी का पैमाना माना है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में आज भी 29.5 फीसदी लोग गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। यही स्थिति कुपोषण को लेकर है, बल्कि यह गरीबी का ही एक पहलू है।
चिंताजनक बात यह है कि कुपोषण के मामले में भारत कई सब-सहारा देशों के आसपास नजर आता है। इन दोनों ही मोर्चों पर मोदी सरकार की ओर से बातें तो काफी की गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। मोदी सरकार के विकास मॉडल का जोर ही शहरीकरण पर है।
अनुभव और आंकड़े बताते हैं कि शहरीकरण से विस्थापन बढ़ता है और विस्थापित लोग गरीबी से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। स्मार्ट सिटी जैसी महत्वाकांक्षी योजना को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि आने वाले समय में यह चुनौती और बढ़ेगी। सिर्फ कैश सब्सिडी के जरिये गरीबी से नहीं निबटा जा सकता, इसके लिए व्यापक आधारभूत संरचना की जरूरत है, जिसकी घनघोर कमी है।
कितना स्वच्छ हुआ भारत?
प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी जयंती 2 अक्टूबर को झाड़ू थामकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। लेकिन सात महीने बाद पता चल रहा है कि यह कितनी बडी चुनौती है। देश में साठ करोड़ से अधिक लोग अब भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं। इस अभियान के साथ ही इस सरकार ने बड़े जोर-शोर से नमामि गंगे योजना भी शुरू की है।
गंगा की हालत यह है कि इसके किनारे बसे छोटे बड़े 118 शहरों-कस्बों में गंगा की हालत सबसे खराब है। हाल ही में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में कुछ घाटों में हुए सौंदर्यीकरण जैसे काम को छोड़ दें, तो गंगा की सफाई के लिए कोई व्यापक काम नहीं हुआ है। मगर सबसे बड़ी समस्या स्वच्छता से जुड़ी है। शुरुआती तेजी के बाद यह अभियान सुस्त पड़ता दिख रहा है।
वास्तव में सीवेज की व्यवस्था बहुत विकट है। कुछ वर्ष पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि 900 शहरों और कस्बों में 70 फीसदी नालियों का गंदा पानी और गंदगी बिना ट्रीटमेंट किए नदियों में बहा दी जाता है! प्रधानमंत्री ने 2019 तक, जब महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती मनाई जाएगी, देश को पूर्ण रूप से स्वच्छ बनाने की बात की है। उसे देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वच्छ भारत सरकार के लिए कितनी बड़ी चुनौती है।
चीन और पाकिस्तान की चुनौती
मोदी सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल का सबसे उजला पक्ष उनकी विदेश नीति को माना जा रहा है, जिसकी झलक 26 मई से ही दिखनी शुरू हो गई थी, जब शपथ ग्रहण समारोह में पहली बार सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था। उसके बाद पिछले 12 महीनों में नरेंद्र मोदी ने दुनिया के नक्शे का शायद ही कोई कोना छोड़ा हो। कुल 18 देशों की यात्रा कर उन्होंने यह जताया कि विदेश नीति उनके एजेंडे पर सर्वोपरि है।
इस दौरान देश ने देखा कि वह किस तरह बराक ओबामा को उनके पहले नाम से पुकारते हैं, किस तरह वह चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला झूलते हैं और किस तरह ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के नेता प्रोटोकाल तोड़ कर उनकी अगवानी करते हैं। व्यक्तिगत तौर पर विदेश में खासतौर से भारतवंशियों के बीच मोदी ने यह संदेश जरूर दिया है कि वह एक मजबूत इरादे वाले नेता हैं। इस बीच विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय कारोबार और निवेश को लेकर करार भी हुए हैं।
नेपाल में आए भूकंप के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने तत्परता जरूर दिखाई, लेकिन उनकी सरकार की अतिसक्रियता और कुछ हद तक मीडिया के उतावलेपन के कारण नेपाल में तीखी प्रतिक्रिया तक देखने को मिली। बांग्लादेश के साथ हुआ भूमि सीमा समझौता जरूर मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। लेकिन सामरिक रूप से भारत के लिए चीन और पाकिस्तान बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह तक चीन जो आर्थिक गलियारा बना रहा है, उसे लेकर खुद प्रधानमंत्री चीन यात्रा के दौरान चिंता जता चुके हैं। यह प्रस्तावित गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से होकर चीन को ग्वादर से जोड़ेगा! विदेश मोर्चे पर मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यूरोप, अमेरिका या अफ्रीका में नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में ही है, जहां उसे चीन, पाकिस्तान के साथ ही अफगानिस्तान पर भी नजर रखनी होगी, जिसके नए निजाम अशरफ गनी अपनी भारत यात्रा में कोई खास उत्साह नहीं पैदा कर सके।
बदल सकती हैं धारणाएं
मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 44 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया थी, 'हम धारणा की लड़ाई में हार गए!' राजनीति में धारणा सरकार तक बदल देती है। यदि सितंबर, 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था, तबसे देखें तो भाजपा के पक्ष में तेजी से धारणा मजबूत हो गई।
इसकी वजह यह भी थी कि मोदी कांग्रेस और यूपीए की ऐसी छवि प्रस्तुत करने में कामयाब रहे, जिससे निजात पाना देश का सबसे बड़ा धर्म हो गया! दिग्विजय ही नहीं, अनेक कांग्रेसी दिग्गज कह चुके हैं कि यूपीए के दौरान मनरेगा, आरटीआई, आरटीई, सूचना का अधिकार, भूमि अधिग्रहण कानून जैसे न जाने कितने सशक्तीकरण के कानून लोगों को मिले, लेकिन लोगों के बीच ऐसी धारणा बन गई कि यह देश की सबसे भ्रष्ट सरकार है।
हालांकि यह भी सच है कि कोयला और टू जी स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों के कारण ऐसी धारणा बनी। यही बात दूसरे ढंग से मोदी सरकार के बारे में कही जा सकती है। अच्छे दिन के वायदे के साथ सत्ता में आई इस सरकार की एक बड़ी चुनौती यही है कि वह इस धारणा पर खरी उतरे। निवेश की बातें काफी जोर शोर से हो रही हैं, लेकिन अब तक टोस रूप में कुछ भी नहीं दिख रहा है। जिन बड़े सुधारों की बात की जा रही है, वह कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं।
इसके साथ ही सरकार को सबसे बड़ा खतरा संघ परिवार के सदस्यों से है, जो गाहे बगाहे धर्मांतरण और हिंदुत्व का मुद्दा उठाते रहते हैं। मोदी सरकार ने पिछले एक हफ्ते के दौरान जिस तरह से मीडिया में अपने एक वर्ष के कार्यकाल का आक्रामक तरीके से बखान किया है, वैसा उदाहरण भारतीय राजनीति में कहीं नहीं मिलता। क्या ऐसा इसलिए है कि सरकार को लग रहा है कि मई, 2014 में जब वह सत्ता में आई थी, उसके बाद से उसके प्रति लोगों की आम धारणा बदल रही है?