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आरक्षण के वो पांच आंदोलन जिनसे सुलग उठा भारत

Sun, 21 Feb 2016 08:45 AM IST
Updated Sun, 21 Feb 2016 08:45 AM IST
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five big reservation Movement

ओबीसी में आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने हरियाणा में कोहराम मचाया हुआ है। राज्य के 11 जिले सेना और पुलिस के हवाले हैं। अलग अलग शहरों में भड़की हिंसा में तीन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जबकि सौ से ज्यादा लोग अस्पतालों में घायल पड़े हैं। धीरे धीरे राज्य की पूरी व्यवस्था पटरी से उतरती नजर आ रही है।

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जाट आंदोलन का असर ऐसा है कि उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा धीरे धीरे देश के बाकी हिस्से से कटता जा रहा है। दिक्कत तब और बड़ी होती दिख रही है जब यूपी और अन्य राज्यों के जाटों ने भी हरियाणा के जाटों को समर्थन का ऐलान कर दिया है। ऐसा नहीं है कि आरक्षण को लेकर देश को पहली बार इस तरह की परेशानी से जूझना पड़ रहा है। बीते दशकभर में विभिन्न बिरादरियों ने आरक्षण की मांग को लेकर सरकारों की नाकों में दम किया है।
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राजस्थान में कुछ दिन पहले गुर्जरों ने वसुंधरा राजे सरकार को नाकों चने चबवा दिए थे तो कुछ महीने पहले गुजरात के संपन्न पाटीदार भी एक 22 वर्षीय युवक हार्दिक पटेल के नेतृत्व में आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। आइए एक निगाह डालते हैं आरक्षण के समर्थन में हुए उन आंदोलनों पर जिन्होंने सरकारों की नींद हराम करके रख दी।
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जाट आंदोलन से अस्त व्यस्त हुआ उत्तर भारत

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हरियाणा में जाट बीते एक हफ्ते से ओबीसी कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस लड़ाई की शुरूआत तब हुई जब बीते जुलाई माह में हरियाणा एवं पंजाब हाइकोर्ट ने जाटों को हरियाणा में ओबीसी कोटे में दिए जा रहे विशेष आरक्षण को समाप्त कर दिया था।

कोर्ट के इस निर्णय ने आग में घी डालने का काम किया क्योंकि इससे पहले मार्च माह में ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय अधिसूची में यूपीए सरकार द्वारा जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने के आदेश को निरस्त कर दिया था। लोकसभा चुनावों से कुछ समय पहले ही यूपीए सरकार ने जाटों को केन्द्रीय सेवाओं में आरक्षण देने का रास्ता साफ किया था लेकिन चुनावी लाभ लेने के लिए आनन-फानन में किया गया यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहली बार में ही दम तोड़ गया।

ऐसे में हरियाणा में जाटों को दोतरफा झटका लगा राज्‍य में आरक्षण का लाभ तो उनके हाथों से गया ही केन्द्र में भी ओबीसी में आरक्षण की उम्‍मीद टूट गई। इससे पहले 2003 में भी राज्य के विधानसभा चुनावों से पूर्व कांग्रेस नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने सत्ता में आने पर जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद उन्होंने ओबीसी में विशेष कोटा देकर अपने वादे को पूरा तो किया लेकिन तकनीकी खामियां दूर नहीं की। जिससे हाइकोर्ट में यह मात खा गया।

अब मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जाटों की मांगों पर विचार करने और उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का वादा कर चुके हैं लेकिन जाटों को उनकी बातों पर विश्वास नहीं है, न ही वह उनकी आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात को मानने के लिए तैयार हैं। दोनों पक्षों के बीच अब यही एक पेंच फंसा हुआ है।

पाटीदार आंदोलन ने किया गुजरात सरकार की नाक में दम

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बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब बीते अगस्त में गुजरात का संपन्न पाटीदार समुदाय एक 22 वर्षीय युवक के पीछे मुट्ठी ताने खड़ा हो गया। वह युवक थे हार्दिक पटेल। जिन्हें अभी तक गुजरात की आनंदीबेन सरकार बहुत गंभीरता से लेने के मूड में नजर नहीं आ रही थी। लेकिन अहमदाबाद में 25 अगस्त की रैली में जब 20 लाख से ज्यादा पटेल समुदाय के लोग पहुंचे तो गुजरात से लेकर देशभर के लोग की निगाहें अचानक हार्दिक पर आ टिकी।

हार्दिक ने गुजरात के पटेलों को अलग से आरक्षण देने की मांग को लेकर पूरे पटेल समुदाय को लामबंद कर दिया था। हार्दिक और अन्य पटेल नेताओं की दो टूक मांग थी कि या तो उन्हें भी ओबीसी की तरह सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए या अन्य जातियों को ओबीसी से बाहर किया जाए।

हालांकि पहली नजर में यह बात किसी के गले नहीं उतरी कि गुजरात का सबसे संपन्न और बीस फीसदी की आबादी वाला पटेल उर्फ पाटीदार समुदाय भी आरक्षण की मांग कर सकता है। लेकिन पाटीदार समुदाय सड़कों पर था और राज्य में हिंसा का दौर शुरू हो गया।

अन्य राज्यों के मुकाबले मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने इस आंदोलन को ज्यादा समझदारी और सख्ती के साथ निपटाया। आज हार्दिक पटेल देशद्रोह के मामले में जेल में बंद हैं तो पाटीदार आंदोलन की चिंगारी फिलहाल शांत है लेकिन कितने दिन तक यह नहीं कहा जा सकता।

राजस्‍थान के गुर्जर आंदोलन ने हिला दिया था पूरा देश

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आरक्षण की मांग को लेकर किस तरह पूरे देश में हलचल पैदा की जा सकती है इसकी झलकी दिखाई थी राजस्‍थान के गुर्जर आंदोलन ने। जिन्होंने एसटी कोर्ट में आरक्षण की मांग को लेकर राजस्‍थान में रेल की पटरियों पर कब्जा जमा लिया था। राजे रजवाडों वाले राजस्‍थान में गुर्जर आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं।

राजस्‍थान की आबादी में गुर्जर लगभग 11 फीसदी हैं। यूं तो राजस्‍थान में गुर्जर ओबीसी में आते हैं लेकिन सरकारी नौकरियों में इनकी संख्या नगणन्य है। इसके पीछे गुर्जर ओबीसी में मीणा और जाट जैसी संपन्न बिरादरियों की उप‌िस्थिति को मानते हैं। जो उन्हें उनके हिस्से का हक मिलने ही नहीं देती।

इसलिए आर्मी के रिटायर्ड कर्नल किरोडी सिंह बैसला के नेतृत्व में गुर्जर राजस्‍थान में कई बार आंदोलन कर चुके हैं। गुर्जरों के आंदोलन की तपिश ऐसी होती है कि इससे पूरा देश झुलसने लगता है। दिल्‍ली मुंबई रेल लाइन पर कब्जा जमाए गुर्जर अपने हर आंदोलन से सरकार को अरबों की चोट पहुंचा देते हैं लाखों की आबादी परेशान होती है वो अलग।

गुर्जर के आंदोलन की शुरूआत वैसे 2006 में हुई थी जब राज्य में एसटी कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर हजारों गुर्जरों ने दौसा से भरतपुर तक रेल की पटरियों पर डेरा जमा लिया था। पुलिस ने सख्ती दिखाई तो गुर्जर हिंसक हो गए और पुलिस फायरिंग में 40 लोगों की मौत हो गई थी।

उस समय की वसुंधरा राजे सरकार ने गुर्जरों को अलग से पांच फीसदी आरक्षण का आश्वासन देकर मामले को शांत कर‌ दिया था। लेकिन हाइकार्ट में यह आदेश धराशायी हो गया। जिसके बाद अगले साल 2007 में यह चिंगारी फिर सुलग उठी और गुर्जर फिर पटरियों पर बैठ गए। 23 मार्च 2007 में पुलिस की कार्रवाई में 26 लोगों की मौत हो गई। 2008 में भी यह आंदोलन सुलगा तो वसुंधरा सरकार की मुश्किलें बढ़ गई।

बीते साल 2015 में भी एक बार फिर यह आंदोलन उस समय तल्‍ख हो गया जब गुर्जरों ने अभी नहीं तो फिर कभी नहीं के नारे के सा‌थ पटरियों पर कब्जा जमा लिया। इस बार फिर टक्कर वसुंधरा सरकार से थी और सामने थे बुजुर्ग किरोडी सिंह बैंसला। लेकिन इस बार ‌मामला पहले की अपेक्षा कुछ शांतिपूर्वक निपटा और सरकार और गुर्जरों में समझौता हो गया। वसुंधरा सरकार ने कानून बनाकर गुर्जरों को विशेष पिछड़ा वर्ग के तौर पर अलग से 5 फीसदी आरक्षण देने का आश्वासन दिया है। इसे राज्य विधानसभा में पास करके बिल की शक्ल दी जाएगी और फिर केन्द्र को भेजा जाएगा।

आंध प्रदेश में कापू आंदोलन से सुलगा दक्षिण

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आमतौर पर जाति आधारित आरक्षण की चिंगारी उत्तर भारत के राज्यों में ही सुलगती रहती थी लेकिन कुछ दिन पहले ही आंध्र प्रदेश में कापू समुदाय ने अचानक उस समय पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा जब गोदावरी जिले में हिंसक भीड़ ने रत्नांचल एक्सप्रेस के पांच डिब्बों को आग के हवाले कर दिया। हिंसक भीड़ ने पुलिस पर भी हमला किया जिसमें 15 पुलिसकर्मी जख्मी हो गए। आंदोलनकारियों ने पूर्वी गोदावरी जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 16 को भी बाधित किया।

आंध्र प्रदेश का कापू समुदाय ओबीसी का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहा था। विधानसभा चुनावों से पूर्व तेलगूदेशम पार्टी के नेता चन्द्रबाबू नायडू ने भी कापू समुदाय से वादा किया था कि जीतने के बाद उन्हें ओबीसी का दर्जा दे दिया जाएगा। दो साल बीतने के बाद भी मांग पूरी होते न देख समुदाय के सब्र का बांध टूट गया। आंदोलनकारियों ने पूर्वी गोदावरी जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-16 पर भी यातायात को बाधित कर दिया।

पुलिस के एक अधिकारी ने देर रात बताया कि बाद में आंदोलनकारियों ने जाम हटा लिया। यह सड़क कोलकाता को चेन्नई से जोड़ती है। ट्रेन जलाने की घटना में कोई यात्री जख्मी नहीं हुआ क्योंकि आग लगाए जाने से पहले उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया था। प्रदर्शनकारियों ने तुनी में एक जनसभा भी की जिसे उनके नेता मुद्रागडा पद्मनाभ ने संबोधित किया। प्रदर्शनकारियों ने ट्रेन के इंजन पर पथराव किया और पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया।

इसके बाद उन्होंने रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ की। इस हिंसक आंदोलन में जिले के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सहित कुल 15 पुलिसकर्मी जख्मी हो गए। रेलवे के प्रवक्ता ने बताया कि आंदोलन के कारण सात ट्रेनों को रद्द कर दिया गया। इस घटना पर मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने विजयवाड़ा में कहा कि वह कापू समुदाय को आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मामला अभी ठंडे बस्ते में है लेकिन कब तक यह कहना मुश्किल है।

महाराष्ट्र में सुलग रही मराठा आंदोलन की चिंगारी

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जाति आधारित आरक्षण की आग की आग महाराष्ट्र तक भी पहुंच चुकी है। यहां भी संपन्न मराठा समुदाय ने अलग आरक्षण की मांग को लेकर सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। झगड़े की वजह ये है कि महाराष्ट्र में पिछली कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने राज्य में मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया था।

कुछ दिन पहले हाइकोर्ट ने इसे रद कर दिया। इसकी तोड़ के ‌लिए महाराष्ट्र सरकार अध्यादेश लाई तो बांबे हाइकोर्ट ने उस पर भी रोक लगा दी। वैसे मराठा कोई एक जाति नहीं कई जातियों का समूह है, जिसमें राजपूत, क्षत्रिय आदि प्रमुख समुदाय आते हैं। यह समुदाय लंबे समय से नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग कर रहा था। जिसे पिछली सरकार ने पूरा भी कर दिया।

लेकिन इसे मुंबई स्थित समाजसेवी केतन तिरोड़कर ने मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी और इसी पर यह कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। केतन तिरोड़कर ने अपनी याचिका में मराठा समाज के सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े होने के दावे को भी चुनौती दी थी। कोर्ट के आदेश के बाद मराठा समुदाय की बेचैनी बढ़ती जा रही है और वो सरकार पर जल्द से जल्द इसे लागू करने के लिए दबाव बढ़ा रहे हैं।

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